23 साल बाद तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर का कुंभाभिषेकम, जानें- UNESCO के विश्व धरोहर का इतिहास और रहस्य

इस पवित्र अवसर पर लाखों श्रद्धालु कावेरी नदी के तट पर मंदिरों के नगर तंजावुर पहुंचे. तंजावुर जिला प्रशासन का दावा है कि इस कुंभाभिषेकम में दस लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए.
Brihadeeswarar Temple Thanjavur kumbhabhishekam, 23 साल बाद तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर का कुंभाभिषेकम, जानें- UNESCO के विश्व धरोहर का इतिहास और रहस्य

तमिलनाडु के तंजावुर में एक हजार वर्ष पुराने बृहदेश्वर मंदिर का कुंभाभिषेकम 23 साल बाद बुधवार को पारंपरिक विधि-विधान के साथ किया जा रहा है. इसके लिए बृहदेश्वर मंदिर के शिखर पर स्थापित विशाल विमानम का जलाभिषेक 110 विशेष पात्रों में लाये गए जल से सुबह साढ़े नौ बजे शुरू हुआ. पिछली बार साल 1997 में मंदिर का कुंभाभिषेकम किया गया था.

इस पवित्र अवसर पर लाखों श्रद्धालु कावेरी नदी के तट पर मंदिरों के नगर तंजावुर पहुंचे. तंजावुर जिला प्रशासन का दावा है कि इस कुंभाभिषेकम में दस लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए.

सफल आयोजन के लिए 21 सदस्यों की समिति

इससे पहले तंजावुर के भगवान शिव के बृहदेश्वर (पेरीय कोईल) मंदिर के कुंभाभिषेकम के आयोजन के लिए तमिलनाडु सरकार ने 21 सदस्यों की एक समिति का गठन किया गया था. इस बड़े उत्सव के आयोजन में प्रशासनिक और सुरक्षा उपायों संबंधी दिक्कतें नहीं आए इसके लिए तंजावुर जिला कलक्टर के आग्रह पर इस समिति का गठन किया गया. जिला कलक्टर को ही समिति का संयोजक भी बनाया गया था.

आयोजन समिति के चेयरमैन प्रदेश के मुख्य सचिव के. षणमुगम थे. वहीं अन्य विभागों के अपर मुख्य सचिवों के अलावा पुलिस महानिदेशक, अग्निशमन और राहत-बचाव विभाग के पुलिस महानिदेशक को इसका सदस्य बनाया गया था.

मंदिर का इतिहास और रहस्य

तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर 11वीं सदी का है. इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है. बृहदेश्‍वर मंदिर को दुनिया का सबसे पहला ग्रेनाइट मंदिर कहा जाता है. इस मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़े से बने हैं. इसका निर्माण ईस्वी सन् 1003-1010 के बीच चोल वंश के प्रमुख शासक प्रथम राजराज चोल (985-1014 ई.) ने करवाया था. उनके नाम पर इसे राजराजेश्वर मंदिर का नाम भी दिया जाता है. चोल वंश ने 400 वर्ष से भी अधिक समय तक तमिलनाडु में शासन किया था. इस दौरान तंजावुर ने बहुत तरक्की की थी.

यह मंदिर अपने समय के दुनिया भर के विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था. इसका शिखर 190 फुट ऊंचा है. शिखर पर पहुंचने के लिए 14 मंजिलें बनी हैं. यह मंदिर भारतीय स्थापत्य की अद्भुत मिसाल है. मंदिर में एक विशाल शिवलिंग और पत्थर का बनाया गया एक विशाल नंदी है. मंदिर में विशाल तोरण और मंडप हैं. मंदिर को आधार से चोटी तक नक्काशी से सजाया गया है. मंदिर का मुख्य आकर्षण इसके गुंबद की परछाई का नहीं बनना है. इसका रहस्य आज तक कोई नहीं जान सका है.

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