सिकंदर की विरासत पर भिड़े दो देश

दुनिया को जीतने वाले सिकंदर ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसके नाम पर दो मुल्क आपस में भिड़ जाएंगे. ये दो देश हैं मेसेडोनिया और ग्रीस. आपस में दशकों से तकरार कर रहे इन दोनों मुल्कों की दलीलों को जानिए..
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दुनिया को जीतने वाले सिकंदर ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसके नाम पर दो मुल्क आपस में भिड़ जाएंगे. ये दो देश हैं मेसेडोनिया और दूसरा है ग्रीस.

ऐसे शुरू हुआ झगड़ा

सिकंदर का जन्म ग्रीस के एक प्रांत मेसेडोनिया में ही हुआ था, और ज़ाहिर है कि इस विरासत पर वहां के लोगों को काफी गर्व है. उत्तरी भाग में स्थित इस प्रांत से लगा देश यूगोस्लाविया साल 1991 में टूट गया. छह भागों में टूटे इस मुल्क से एक नया मुल्क खड़ा हुआ जिसने अपना नाम रखा-    रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया. इस इलाके की सीमा ग्रीस के प्रांत मेसेडोनिया से मिलती थी. अब विवाद शुरू होना ही था क्योंकि ग्रीस ये बर्दाश्त कैसे करता कि उसके एक प्रांत के नाम पर ही पड़ोसी देश अपना नाम रख ले!!

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बढ़ती गई खींचतान

मेसेडोनिया ने मेसेडोनिया साम्राज्य के उस राजचिह्न का प्रयोग करना शुरू कर दिया जिसकी अपनी ऐतिहासिक पहचान थी. ग्रीस संसद ने भी उसी निशान को अपना आधिकारिक निशान बनाने के लिए प्रस्ताव पास कर दिया. 

1993 में रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया ने संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश किया लेकिन ग्रीस का ज़ोरदार विरोध जारी था, नतीजतन मेसेडोनिया को the former Yugoslav Republic of Macedonia के भारी भरकम नाम से एंट्री करनी पड़ी और उसका झंडा तक नहीं फहराने दिया गया. कड़वाहट बढ़ रही थी जिसके फलस्वरूप 1994 में ग्रीस ने अपने उत्तरी पड़ोसी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए.

संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों देशों के बीच समझौते की कोशिशें कर रहा था. इसी के चलते रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया आखिरकार राजचिह्न को हटाने के लिए तैयार हो गया और अपने संविधान में भी कुछ बदलाव कर डाले जिससे ग्रीस को समस्या थी। बदले में ग्रीस भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विरोध प्रदर्शन रोकने को इस शर्त पर राजी हुआ कि रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया the former Yugoslav Republic of Macedonia के नाम से ही अपना कामकाज करे।

लड़लड़कर थके नहीं दोनों देश

दो दशकों तक दोनों देश नाम को ले कर चल रहे लफड़े को सुलझाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद लेते रहे. कई देशों ने भी मध्यस्थता का प्रयास किया. बहुत से नाम प्रस्तावित हुए और एक-एक कर खारिज होते गए. ग्रीस किसी ऐसे नाम को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं दिख रहा था जिसमें मेसेडोनिया लगा हो.

साल 2008 में नाटो ने रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया को न्यौता दिया मगर वहां भी ग्रीस का विरोध आड़े आ गया. तमतमाई हुई मेसेडोनिया सरकार ने ग्रीस पर 1995 के समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया जिसमें साफ लिखा था कि ग्रीस अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसका विरोध नहीं करेगा.  मेसेडोनिया की सरकार अंतर्राष्ट्रीय अदालत में जा पहुंची और फैसला उसके हक में ही आया. यूरोपियन यूनियन में भी ग्रीस उसका रास्ता रोके खड़ा था. 

 

मेसेडोनिया ने ग्रीस को खूब तड़पाया

2011 में मेसेडोनिया की सरकार ने राजधानी स्कोप्ये में सिकंदर की 22 मीटर ऊंची प्रतिमा लगवा दी जिसने ग्रीस को भड़का दिया. यूरोपियन यूनियन ने भी इस कदम को भड़काऊ करार दिया, लेकिन बात इतनी ही नहीं थी.

मेसेडोनिया अपने हवाई अड्डे का नाम भी सिकंदर के नाम पर रख चुका था. ग्रीस की तरफ जा रहे हाईवे का नामकरण भी सिकंदर पर ही किया गया था. यहां तक कि मेसेडोन साम्राज्य के राजा फिलिप-2 के नाम पर राजधानी के सबसे बड़े स्टेडियम का नाम रख दिया. उससे भी बढ़कर तो ये कि शहर के मुख्य चौराहे को पेला स्क्वॉयर नाम दे दिया (जो मेसेडोन साम्राज्य की राजधानी का नाम था) जो कि आज भी ग्रीस की सीमा में है.

ज़ाहिर हो रहा था कि मेसेडोनिया की सरकार जानबूझकर अपने देश को मेसेडोन साम्राज्य से जोड़कर दिखा रही थी जबकि अभी भी वो पूरा इलाका ग्रीस में ही है.

 

दोनों देशों के लिए क्यों ज़रूरी मेसेडोनिया

असल में रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया में रहनेवाली 65% आबादी खुद को एक सदी से मेसोडोनियन कहती थी, हालांकि ऐतिहासिक तौर पर वो नस्ल से स्लाविक हैं.

मेसेडोनिया नाम यूगोस्लाविया ने चुना था ताकि पड़ोसी बुल्गारिया के लोगों (नस्ल और भाषा में मिलते-जुलते) से अपने लोगों को अलग पहचान मिल सके. इसके अलावा ये मार्शल टीटो की रणनीति भी कही जाती है जिसके तहत वो भविष्य में ग्रीस के मेसेडोनिया पर दावा ठोकना चाहते थे.

आज the former Yugoslav Republic of Macedonia के लोग अपने देश के नाम परिवर्तन के कतई समर्थन में नहीं हैं. उनका तर्क है कि वो जिस इलाके में रहते हैं वो रोमन काल से ही प्राचीन मेसेडोनिया के इलाके का अंग माना जाता है. वो ग्रीस के इस तर्क को भी नकारते हैं कि भविष्य में ये लोग ग्रीस के मेसोडोनिया पर भी दावा करेंगे.

वहीं ग्रीस में रहनेवाले मेसोडोनियन्स खुद को सिकंदर का असल वारिस मानते हैं और वो किसी दूसरे देश के साथ इस विरासत को साझा नहीं करना चाहते. हां कुछ तबके इस बात के हामी थे कि अगर रिपब्लिक ऑफ मेसेडोनिया अपने नाम के साथ मेसेडोनिया रखना चाहता है तो वो थोड़ा परिवर्तन कर ले.

 

हल तो हुआ लेकिन अधूरा

आखिरकार इस साल मेसेडोनिया का हल निकल आया. 2017 में मेसेडोनिया में आई नई सरकार ग्रीस के साथ समझौते पर पहुंच गई. 

दोनों देशों ने 2018 में खूबसूरत प्रेस्पा झील के किनारे मुलाकात करके एक संधि पर हस्ताक्षर किए. इसमें लिखा था कि मेसेडोनिया अपना नाम रिपब्लिक ऑफ नॉर्थ मेसेडोनिया कर ले और फिर ग्रीस उसकी एंट्री नाटो और ईयू में नहीं रोकेगा. अब इस देश की भाषा को मेसेडोनियन कहा जाएगा और लोगों को मेसेडोनियन्स.

समझौता तो हुआ लेकिन फिर भी ग्रीस और मेसेडोनिया में विवाद थमा नहीं। लोग नाराज़ होकर सड़कों पर उतर आए हैं। हिंसक झड़पें शुरू हो गई हैं। दोनों तरफ के कट्टर राष्ट्रवादियों ने अपनी सरकारों के खिलाफ जंग छेड़ दी है. अब तक एक-दूसरे से लड़ रही दोनों मुल्क की सरकारों को अब अपने-अपने लोगों से भी लड़ना पड़ रहा है।  

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