प्रियंका गांधी जिस ‘स्वराज भवन’ में ठहरीं उसके इस इतिहास से आप होंगे अनजान

प्रियंका गांधी की पहली परीक्षा पूर्वी उत्तर प्रदेश में तय हुई है जहां उनके पुरखों ने राजनीति का ककहरा सीखा और महात्मा गांधी के मार्गदर्शन में राजनीति को नई दिशा दी. ऐसे में प्रियंका प्रयागराज स्थित अपने पुराने घर पहुंचीं जिसे देश आनंदभवन के नाम से जानता है. आइए आज आपको उसी ऐतिहासिक घर 'स्वराज भवन- आनंद भवन' की वो कहानी बताते हैं जो आपको शायद किसी ने नहीं सुनाई होगी.

जब भी नेहरू-गांधी परिवार के इतिहास का कोई ज़िक्र छिड़ता है तब आनंद भवन की बात ज़रूर निकलती है. प्रयागराज (इलाहाबाद) में सवा सौ साल से मौजूद आनंद भवन अपनी चारदीवारी में एक परिवार, एक पार्टी और एक देश के संघर्ष की कहानी समेटे खड़ा है. इस कहानी के कई पन्ने अब तक अनजाने हैं. इस छोटे से लेख में आज उन्हीं में से कुछ सफहों को खोलने की कोशिश करते हैं.

 

एक जर्जर इमारत से आनंद भवन होने का सफर

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू सबसे पहले पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के मुइर सेंट्रल कॉलेज पहुंचे थे. साल 1883 में उन्होंने कैंब्रिज से वकालत की. इसके बाद हिंदुस्तान लौटकर 25 साल के मोतीलाल नेहरू की दूसरी शादी 14 साल की स्वरूप रानी से करवा दी गई. मोतीलाल नेहरू की पहली पत्नी की मौत प्रसव के दौरान हो गई थी. तीन साल की उम्र में उनका बेटा रतनलाल भी चल बसा. भविष्य में मोतीलाल की वकालत चल निकली. रशीद किदवई अपनी किताब ’24 अकबर रोड़’ में बताते हैं कि तीस की उम्र के आसपास ही मोतीलाल 2 हजार रुपए प्रति महीने से ज्यादा कमाने लगे थे. उस दौरान एक स्कूल टीचर की कमाई दस रुपए तक ही होती थी. नए नवेले अमीर मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद की 9 एल्गिन रोड़ पर एक शानदार घर लिया जिसमें सभी को सिर्फ अंग्रेज़ी बोलने का हुक्म दिया गया. साल 1900 में जब जवाहलाल नेहरू 11 साल के थे, मोतीलाल नेहरू ने अपनी प्रतिष्ठा के हिसाब से एक और नया घर खरीदा. ये घर इलाहाबाद के 1, चर्च रोड़ पर स्थित था. 19 हजार रुपए की भारी भरकम कीमत चुका कर मोतीलाल नेहरू ने जिस घर को खरीदा वही भविष्य में आनंद भवन के नाम से जाना गया. घर बेहद जर्जर हालत में था लेकिन उसके लंबे चौड़े अहाते में फलों के बगीचे और स्विमिंग पूल ने समां बांधा हुआ था.

मोतीलाल नेहरू ने बड़े मन से पूरे घर की मरम्मत कराई. हर कमरे में बिजली-पानी की सप्लाई का इंतज़ाम हुआ. बाथरूम में फ्लश टॉयलेट लगवाए गए जिसे पहले इलाहाबाद में किसी ने देखा तक नहीं था. अंग्रेज़ी स्टाइल से बेतरह प्रभावित मोतीलाल नेहरू ने उस दौर में यूरोप और चीन की यात्रा कर बेशकीमती फर्नीचर खरीदा. घर का नाम ‘आनंद भवन’ भी उन्होंने ही रखा.

मूल आनंद भवन को जब स्वराज भवन बनाकर दान दे दिया गया तो पास ही में नया आनंद भवन खड़ा किया गया

नेहरू-गांधी वंश की तीन पीढ़ियों की गवाह इमारत

नई सदी की तरफ बढ़ते भारत में सियासत बदली. महात्मा गांधी के हिंदुस्तान में पदार्पण ने तो इस बदलाव में और तेज़ी ला दी. साथ ही साथ मोतीलाल नेहरू के विचार भी बदल रहे थे. 1930 आते-आते तो उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ ऐसे तीखे तेवर अपना लिए कि बड़े शौक से तैयार किया गया पूरा आनंद भवन ही ब्रिटिश शासन से लोहा ले रही कांग्रेस के हवाले कर दिया. तब इसका नाम आनंद भवन से ‘स्वराज भवन’ हो गया. इस ऐतिहासिक स्वराज भवन के बिल्कुल नज़दीक एक नए आनंद भवन की नींव रखी गई. इसे भी 1969 में इंदिरा गांधी ने देश को ही समर्पित कर दिया था. बहरहाल, अभी बात पुराने आनंद भवन यानि स्वराज भवन की. स्वराज भवन कांग्रेस का हेडक्वार्टर बन चुका था. 1947 तक वो कांग्रेस की गतिविधियों का केंद्र बना रहा. आज़ादी के बाद ही कांग्रेस मुख्यालय दिल्ली के 7 जंतर मंतर रोड़ पर पहुंचा. इसके आगे वो 24, अकबर रोड़ में कैसे शिफ्ट हुआ इसकी कहानी कांग्रेस की अंदरुनी फूट से जुड़ी है.

जितने शौक से मोतीलाल नेहरू ने आनंद भवन सजाया-संवारा, उतने ही बड़े दिल से कांग्रेस को दान भी दे दिया

ऐतिहासिक पलों के चश्मदीद स्वराज भवन- आनंद भवन

देशभर में कांग्रेस की गतिविधि आनंदभवन से संचालित होने लगी तो राष्ट्रीय नेताओं का आना-जाना भी होने लगा. लाल बहादुर शास्त्री, सुभाषचंद्र बोस, राम मनोहर लोहिया, खान अब्दुल गफ्फार खान, महात्मा गांधी के चरण यहां पड़े. बापू तो जब कभी इलाहाबाद आते तो यहीं ठहरते. आज भी वो कमरा ज्यों का त्यों मौजूद है जहां महात्मा गांधी विश्राम करते. नन्हीं इंदिरा के साथ बापू की एक पुरानी तस्वीर अभी भी युगपुरुष महात्मा की कहानी कहती है. इसी के पास प्रथम तल पर वो ऐतिहासिक कमरा है जहां कांग्रेस कार्यकारिणी बैठती थी. साल 1931 में कांग्रेस अध्यक्ष पद पर वल्लभ भाई पटेल को बैठाने का फैसला यहीं हुआ. 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और व्यक्तिगत सत्याग्रह का निर्णय भी इसी कमरे में बैठकर लिया गया. इसी तल पर जवाहरलाल नेहरू का अध्ययन कक्ष है.

यही घर था जहां इंदिरा गांधी ने फिरोज़ गांधी को पति स्वीकारा था. 26 मार्च 1942 को शादी के संस्कार इसी घर में निभाए गए. शादी भी कोई आजकल की तरह भव्यता से नहीं, बल्कि बेहद सादगी से संपन्न हुई थी. बेटी के विवाह का निमंत्रण पत्र खुद जवाहलाल नेहरू ने अपने हाथ से लिखा. शादी के समय इंदिरा ने जो खादी की साड़ी पहनी उसका सूत जवाहरलाल नेहरू ने जेल में काता था.

इस ऐतिहासिक इमारत में मोतीलाल नेहरू का स्टडी रूम भी ज्यों का त्यों मौजूद है. कमरे में ही उनकी वो आरामकुर्सी हैं जिस पर आराम करते हुए उन्होंने आखिरी दिन गुज़ारे. उनकी पत्नी स्वरूपरानी का कमरा भी यहीं है. साल 1938 में उनका देहांत भी इसी घर में हुआ. स्वरूपरानी को बेहद प्यार करनेवाली इंदिरा इसी घर में 19 नवंबर 1917 में जन्मी थीं.

जवाहरलाल नेहरू ने अपने घर को देश की आज़ादी का गढ़ बनते देखा

इंदिरा ने वो घर तो छोड़ा मगर उस घर ने इंदिरा को नहीं छोड़ा

मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस को अपना घर दे दिया और खुद परिवार के साथ नए बनाए आनंद भवन में आ गए. तब भी उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. बिना गृहप्रवेश पूजा के वो नए घर में पहुंचे तो अगले ही दिन उनकी अमीरी पर तंज़ करता हुआ लेख अंग्रेज़ी अखबार में छपा. खैर, इंदिरा प्रियदर्शिनी को भी नए घर में नया कमरा मिला लेकिन उनके मन से कभी भी पुराना आनंद भवन नहीं निकल सका जो अब स्वराज भवन था.  जीवनी लेखक डोम मोरेस के साथ बातचीत में पुराने दिनों को याद करते हुए इंदिरा ने कहा था- ‘घर में हमेशा चहल पहल रहती थी. वहां लोग भरे रहते थे लेकिन आनंद भवन से ज़्यादा मुझे स्वराज भवन पसंद था. वो मेरे लिए ज़्यादा घर था. हम ब्रिटिश पुलिस से भागकर आए कांग्रेस कार्यकर्ताओं को वहां छिपा लेते थे. एक रात हमारे घर कोई घायल पहुंचा तो मुझ समेत घर की सारी महिलाओं ने नर्स का काम किया.’

अपने इंटरव्यू में अक्सर इंदिरा आनंद भवन की उन शामों का ज़िक्र करतीं जो उन्होंने आंगन में लुका छिपी खेलते बिताईं. उन्हें घर की छज्जेदार छत हमेशा से पसंद थी. बचपन बिताने की ही बात नहीं बल्कि सियासत का ककहरा भी इंदिरा ने इस घर में ही सीखा था.  आगे चलकर 1970 में इंदिरा गांधी ने आनंद भवन को भी देश के हवाले वैसे ही कर दिया जैसे मोतीलाल नेहरू ने स्वराज भवन को कांग्रेस के हाथों दान कर दिया था.

इंदिरा ने भले ही सियासी मजबूरियों में आनंद भवन छोड़ा लेकिन उन्हें आनंद भवन ने नहीं छोड़ा

मोतीलाल तक कैसे पहुंची आनंद भवन की चाबी

इलाहाबाद यानि प्रयागराज में खड़े आनंदभवन-स्वराजभवन के आंगन में तारीख आज तक चहलकदमी करती हैं. ये दोनों सिर्फ इमारतें नहीं हैं बल्कि हिंदुस्तान के उस दौर की दो चश्मदीद हैं जब उसने गुलामी से आज़ादी तक का सफर पूरा किया. राजीव और संजय ने तो इन इमारतों को जिया ही, बाद में सोनिया, राहुल, प्रियंका भी अपने घर जाकर ठहरते रहे हैं.

कन्हैयालाल नंदन की किताब ‘आनंदभवन-स्वराजभवन’ इन दोनों भव्य इमारतों के बारे में बहुत कुछ कहती है. अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोह में नुकसान उठाकर भी उनकी मदद करने के इनाम में शेख फैयाज़ अली को वो ज़मीन सौंपी थी जहां आज दोनों इमारतें खड़ी हैं. ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख के मुताबिक उत्तरी-पश्चिमी प्रांत की सरकार से मिली इस ज़मीन पर जो भवन बना उसके कई मालिक रहे. आखिरकार देश के नामी वकील मोतीलाल नेहरू ने इसे रहने के लिए 7 अगस्त 1899 को 20 हज़ार रुपए में खरीदा.

कई जगहों से जानकारी मिलती है कि मोतीलाल नेहरू ने इसे मुरादाबाद के रहनेवाले और शाहजहांपुर में जज रायबहादुर कुंवर परमानंद पाठक से खरीदा था मगर इस इमारत के पिछले इतिहास पर धूल पड़ी है. जो जानकारी कई जगहों से जुटाने पर मिलती है वो कुछ इस तरह है-

ये घर अलीगढ़ मुस्लिम विवि के संस्थापक सर सैयद अहमद खान के पास रहा था. उन्होंने इसे महमूद मंज़िल (सर सैयद के बेटे का नाम) नाम दिया था. साल 1871 में सर सैयद अहमद खान ने इसका निर्माण कराया. दरअसल उत्तरी-पश्चिमी प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर विलियम मुइर उन दिनों कई बातों में सर सैयद की सलाह माना करते थे. अलीगढ़ में रहनेवाले सर सैयद को कई-कई दिनों तक इलाहाबाद में रहना पड़ता. उन्होंने मुइर के आग्रह पर ही इस घर को बनवाया. गवर्नमेंट हाउस से महज़ दस मिनट की दूरी पर ही ये घर था. बाद में किरायेदार के तौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज सैयद महमूद भी यहां रहे. अपनी मौत तक यानि 1873 तक ज़मीन के मालिक फैयाज़ अली भी पास ही में रहते रहे. वो जिस बंगले मे रहे उसका नाम बंगला फतेहपुर बिस्वा कहा जाता था. फैयाज़ की मौत के बाद उनकी प्रॉपर्टी इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिकार में चली गई क्योंकि उनके बच्चे नाबालिग थे. सैयद महमूद किरायेदार के तौर पर इस भवन में लंबे समय तक बने रहे.

नेहरू लाइब्रेरी में संग्रह करके रखे गए दस्तावेज़ों में एक इंदिरा गांधी का लेख भी है. उसमें लिखा है कि, ‘जहां तक मैं जानती हूं, घर मूलत: जस्टिस महमूद के पास था जिन्होंने मुरादाबाद निवासी और शाहजहांपुर के जज राजा परमानंद के हाथों इसे बेच दिया. उनसे मेरे दादा पंडित मोतीलाल नेहरू ने साल 1900 में ये घर खरीदा.’

 

अमेरिकी इतिहासकार डेविड लेलिवेल्ड की खोजबीन

अमेरिका की विलियम पेटर्सन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रहे डेविड लेलिवेल्ड ने भारत में सर सैयद अहमद खान, मुस्लिम समाज और अलीगढ़ पर काफी काम किया है. इसी दौरान उन्हें पता चला कि सर सैयद अहमद खान और आनंद भवन का कोई कनेक्शन है. डेविड ने इस कनेक्शन की पुष्टि के लिए ही आनंद भवन पर शोध करना शुरू किया. उनकी पड़ताल कुछ रोचक जानकारियां सामने लाती है. डेविड ने अपने एक लेख ‘द मिस्ट्री मेनशन’ में कई सवाल भी खड़े किए हैं. डेविड ने अपनी खोजबीन के सिलसिले में आनंद भवन के तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर से मुलाकात की. उनकी मार्फत डेविड के हाथ मशहूर इतिहासकार विशंभरनाथ पांडे का लेख  ‘The House where India was Born: Swaraj Bhawan: An Irony of History’ लगा.

 

लेख से जानकारी मिली कि 1857 की क्रांति ठंडी होने के बाद ब्रिटिश सरकार को अहसास हुआ कि पूरी मुस्लिम आबादी को सज़ा देना गलत है. इसके बाद उन्होंने मुस्लिमों को लेकर अपनी नीति नरम कर ली. अपनी नीति के लिए उन्हें सर सैयद अहमद एकदम मुफीद लगे. NWFP के लेफ्टिनेंट गवर्नर और भारत के गवर्नर जनरल ने अहम मुद्दों पर उनकी राय लेनी शुरू कर दी. 1867 में NWFP के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम मुइर ने सर सैयद को सुझाया कि ब्रिटिश सरकार को मशविरे के लिए उनकी ज़रूरत लगातार पड़ती है इसलिए वो इलाहाबाद में एक कोठी ले लें. इसके लिए मुइर ने गवर्नमेंट हाउस से दस मिनट की दूरी पर 20 एकड़ की ज़मीन भी पसंद कर ली थी.

इस लेख में एक फुटनोट जुड़ा है जिसके मुताबिक सर सैयद ने सुझाव पर अमल करते हुए 1871 में पसंद की गई ज़मीन पर घर बनवा लिया और उसे अपने बेटे के नाम पर महमूद मंज़िल पुकारा. आगे लिखा है कि सर सैयद ने जब औपचारिक तौर पर कोठी में प्रवेश किया तो एक पार्टी हुई. सर विलियम मुइर विशेष अतिथि के तौर पर मौजूद थे. उन्होंने तब कहा कि मुझे उम्मीद है महमूद मंज़िल हिंदुस्तान में ब्रिटिश शासन की मज़बूती के लिए काम करेगी. अगले फुटनोट में पांडे लिखते हैं (द पायनियर, 18 जुलाई 1871) कि  सैयद महमूद  इलाहाबाद हाईकोर्ट जस्टिस बनने के बाद इस घर में चले आए. 1892 में उन्होंने रायबहादुर परमानंद पाठक को घर बेच दिया जिनसे होते हुए वो घर 1898 में मोतीलाल नेहरू ने 20 हजार रुपए में खरीद लिया. इसी लेख में तीसरा फुटनोट भी है-द म्यूनिसिपल बिल्डिंग रिकॉर्ड.

उस हवाले से पांडे ने एक गलती कर दी. वो NWFP (North West Frontier Province) को NWP (North Western Provinces) से कंफ्यूज़ हो गए. दूसरी बात ये कि 1867 में मुइर लेफ्टिनेंट गवर्नर नहीं बने थे.

मोतीलाल नेहरू से पहलेे आनंद भवन का मालिक सर सैयद अहमद को माना जाता था लेकिन आज भी उस पर शोध होना शेष है

इसके अलावा डेविड के हाथ कोई सबूत नहीं लगा जिससे वो मान लें कि सर सैयद को घर बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने ज़मीन दी थी. डेविड शहर की नगर महापालिका में भी कागज़ देखने पहुंचे. वहां उन्होंने दर्ज पाया कि 24 अक्टूबर 1910 में जवाहरलाल नेहरू को घर का स्वामी बताया गया है, उससे पहले का कोई रिकॉर्ड नहीं मिल सका. इसके अलावा कागज़ात में जितना क्षेत्र दर्ज़ किया गया वो पांडे के लेख में बताए गए क्षेत्र से कम था.

डेविड समझ गए कि पुराने कागज़ात उनकी उत्सुकता शांत नहीं कर सकेंगे. आखिरकार वो जस्टिस सैयद महमूद के बेटे सैयद अहमद खान से मिले जिसने उन्हें बताया कि सर सैयद से इस घर का कोई संबंध तो ज़रूर था मगर क्या था वो ज़्यादा साफ नहीं. उसके बाद डेविड ने फिर कभी खोजबीन करने का फैसला किया लेकिन कर नहीं सके. अब इस 42 कमरों वाले विशाल भवन को जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड चला रहा है. भले ही इस ऐतिहासिक घर का पूरा इतिहास आज भी साफ ना हो लेकिन इतना तो सब जानते हैं कि इस घर ने देश का इतिहास बनते देखा है.

आनंद भवन के बारे में जवाहरलाल नेहरू ने 21 जून1954 को अपनी वसीयत में लिखा – ‘ये घर हमारे लिए और अन्य बहुत से लोगों के लिए उस सब कुछ का प्रतीक बन गया जिसे हम जीवन में मूल्यवान मानते हैं. यह एक ईंट और कंक्रीट की इमारत और एक निजी संपत्ति से बहुत मूल्यवान है. ये हमारे स्वतंत्रता संग्राम से बहुत घनिष्ठता से जुड़ा है और इसकी दीवारों के अंदर महान घटनाएं घटी हैं, बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं.’

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