अमेरिकी चुनाव: कमला हैरिस नहीं, ये थीं उपराष्ट्रपति पद की पहली अश्वेत महिला उम्मीदवार

साल 1952 में प्रोग्रेसिव पार्टी के टिकट पर उपराष्ट्रपति पद के लिए पहली अश्वेत महिला उम्मीदवार के रूप में चार्लोटा बास के नाम की घोषणा हुई थी, जिसके बाद उन्होंने कहा, "अमेरिका की राजनीति में यह एक ऐतिहासिक क्षण है."
US Election Charlotte Bass was first black female candidate, अमेरिकी चुनाव: कमला हैरिस नहीं, ये थीं उपराष्ट्रपति पद की पहली अश्वेत महिला उम्मीदवार

भारतीय मूल की सीनेटर कमला हैरिस को अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन ने उपराष्ट्रपति पद के लिए चुना है. उन्हें लेकर यह दावा किया जा रहा कि वे पहली अश्वेत महिला हैं, जो उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनी हैं. हालांकि ऐतिहासिक तौर पर यह सही नहीं है. कमला हैरिस से पहले भी अमेरिका में एक अश्वेत महिला उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बन चुकी हैं, जिनका नाम था चार्लोटा बास.

दरअसल साल 1952 में प्रोग्रेसिव पार्टी के टिकट पर उपराष्ट्रपति पद के लिए पहली अश्वेत महिला उम्मीदवार के रूप में चार्लोटा बास के नाम की घोषणा हुई थी. तब उस समय शिकागो के वेस्ट साइड में एक ऑडिटोरियम में करीब दो हजार डेलीगेट्स के सामने बास के नाम पर मुहर लगी, जिसके बाद अपने संबोधन में चार्लोटा बास ने कहा, “अमेरिका की राजनीति में यह एक ऐतिहासिक क्षण है.”

उन्होंने आगे कहा, “यह क्षण मेरे लिए, मेरे अपने लोगों के लिए और सभी महिलाओं के लिए ऐतिहासिक है. इस राष्ट्र के इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल ने एक नीग्रो महिला को दूसरे सर्वोच्च पद के लिए चुना है.”

हारने के बावजूद बास के कैंपन स्लोगन की चर्चा

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, उस वक्त चुनावों में रिपब्लिकन उम्मीदवार ड्वाइट डी आइजनहावर ने राष्ट्रपति पद पर और रिचर्ड एम निक्सन ने उप-राष्ट्रपति पद पर जीत हासिल की, लेकिन फिर भी उनके कैंपेन में वो बात नहीं थी, जो बास के कैंपेन में थीं. उनका स्लोगन था, “जीतें या हारें, हम मुद्दे उठाकर जीतते हैं.” (Win or Lose, We Win by Raising the Issues).

चार्लोटा बास को टिकट मिलने के एक दशक से भी ज़्यादा समय के बाद अमेरिका में मतदान अधिकार कानून पर हस्ताक्षर किए गए, लेकिन न सिर्फ एक राजनेता के रूप में, बल्कि उससे पहले वेस्ट कोस्ट के सबसे पुराने अश्वेत अखबार, द कैलिफोर्निया ईगल की संपादक और पब्लिशर रहते हुए भी बास ने इस तरह के मुद्दे हमेशा उठाए.

अश्वेत लोगों की आवाज था द कैलिफोर्निया ईगल अखबार

एक समय था, जब द कैलिफोर्निया ईगल अखबार लॉस एंजिल्स में अश्वेत लोगों की आवाज था, उसने वहां पुलिस की बर्बरता और फिल्म इंडस्ट्री में नस्लवाद के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया था. ईगल का दफ्तर, जो कभी सेंट्रल एवेन्यू पर लॉस एंजिल्स में अश्वेत समुदाय के लोगों का दिल था, अब वहां एक स्टोर है.

बास ने एक पत्रकार और एक्टिविस्ट के रूप में अपने जीवन में एक अलग पहचान बनाई और शायद यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज एक भारतीय मूल की महिला को एक प्रमुख पार्टी के टिकट पर उपराष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाने के पीछे, जो बुनियाद है वो चार्लोटा बास की मदद से ही रखी गई है.

“चुनाव जीतने पर नहीं मुद्दों पर था बास का ध्यान”

इतिहासकार और लेखक मार्था एस जोंस का कहना है कि हमारा ध्यान हमेशा जीतने या हारने वाले पर होता है, जबकि बास के लिए चुनाव में जीतना तो कभी कोई प्वाइंट रहा ही नहीं. वो तो राजनीतिक एजेंडे को ज़्यादा बड़ा रूप देने की कोशिश कर रही थीं.

बास का पूरा नाम चार्लोटा अमांडा स्पीयर्स था, माना जाता है कि उनका जन्म साउथ कैरोलिना के सम्टर में 1880 के आसपास हुआ. उनके माता-पिता केट और हीराम स्पीयर्स, गुलाम लोगों के वंशज थे, उनके पिता एक राजमिस्त्री थे.

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हाई स्कूल के बाद चार्लोटा अपने भाई एलिस के साथ रहने के लिए रोड आइलैंड चली गईं, जहां उनके भाई के अपने दो रेस्टोरेंट थे. माना जाता था कि साउथ कैरोलिना का सम्टर महिलाओं के लिए एक खतरनाक जगह थी.

ईगल अखबार में ऑफिस गर्ल से संपादक तक का सफर

इसके बाद बास ने पेम्ब्रोक वूमेन कॉलेज में दाखिला लिया, जो अब ब्राउन यूनिवर्सिटी का एक हिस्सा है. पढ़ाई के साथ-साथ चार्लोटा एक स्थानीय ब्लैक न्यूज पेपर में नौकरी भी करने लगीं. साल 1910 में बास ने ईगल न्यूज पेपर में “ऑफिस गर्ल” की नौकरी शुरू की, जहां उन्हें वेतन के रूप में पांच डॉलर मिला करते थे. पेपर का ऑफिस सेंट्रल एवेन्यू पर था, जिसे “शहर का ब्लैक बेल्ट” भी कहा जाता था.

धीरे-धीरे बास ने भी ईगल अखबार में अश्वेत लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते ईगल अखबार की कमान उन्होंने अपने हाथ में ले ली. बास ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- “पूरे शहर में इसी बात की चर्चा थी, क्योंकि इससे पहले कभी किसी ने किसी महिला को अखबार चलाते हुए नहीं देखा था.”

ईगल अखबार की स्थापना तो एक अश्वेत व्यक्ति ने की थी, लेकिन आगे चल कर इसका मालिक एक श्वेत व्यक्ति हो गया, जिसने बास के सामने शर्त रखी की वो अखबार चलाने के लिए अपना समर्थन तभी देगा, जब बास उनसे शादी करेंगी. बास ने इस प्रस्ताव के बाद उस मालिक को काफी बुरी तरह से फटकार लगाई और डीड खरीदने के लिए एक स्थानीय स्टोर के मालिक से 50 डॉलर उधार लिए.

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इसके बाद से बास का जीवन पूरी तरह से बदल गया और उन्होंने अगले 40 साल के लिए खुद को ईगल अखबार और सामाजिक मुद्दों को उठाने के लिए समर्पित कर दिया. बास ने द टोपेका प्लेनडेलर से एक अनुभवी संपादक जेबी. बास को नौकरी पर रखा और जो आगे चलकर वो उनके पति बने, लेकिन शादी के बाद भी दोनों पति-पत्नि के पास एक दूसरे के साथ वक्त बिताने का समय नहीं था.

ज्वाइंट पब्लिशर्स के रूप में उन्होंने ईगल को वेस्ट कोस्ट में सबसे ज्यादा सर्कुलेशन वाले अश्वेत अखबार के रूप में विकसित किया. साल 1934 में अपने पति की मृत्यु के बाद लगभग दो दशकों तक चार्लोटा ने अपने दम पर वो न्यूज पेपर चलाया.

रिपब्लिकन पार्टी में रहते हुए भी दिया डेमोक्रेट उम्मीदवार को वोट

1940 के दशक में चार्लोटा बास ने पूरी तरह से राजनीति में प्रवेश किया. बास की सबसे खास बात यह रही कि वे लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी में थीं, लेकिन 1936 के चुनाव में उन्होंने डेमोक्रेट के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट को वोट दिया और बाद में अश्वेत समुदाय और महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा करने के लिए उन्होंने दोनों दलों की निंदा भी की.

उन्होंने 1947 में कैलिफोर्निया की इंडिपेंडेंट प्रोग्रेसिव पार्टी की स्थापना में मदद की और 1950 में कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं. ऐनी रैप, एक इतिहासकार जिन्होंने बास पर अपने डॉक्टरेट शोध प्रबंध को लिखा था, उन्होंने बताया कि आगे चल कर चार्लोटा बास पर सरकार ने अपनी निगरानी बढ़ा दी और उनकी मौत तक उन पर सरकारी एजेंसियों की तरफ से काफी सख्त निगरानी रखी गई.

यहां तक उनकी विदेशी यात्राओं पर रोक लगा दी गई और सीआईए के एजेंट्स ने विदेशों में उनके सम्मेलनों की भी जांच की. बास ने 1951 में अश्वेत महिलाओं के ग्रुप को ईगल अखबार को बेच दिया. इसके बाद 12 अप्रैल 1969 को सेरेब्रल हेमरेज से उनकी मृत्यु हो गई.

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