कैप्टन विक्रम बत्रा की 46वीं जयंती: खौफ खाती थी पाकिस्तान की सेना, पढ़ें- क्यों दिया था ‘शेरशाह’ कोडनेम

कैप्टन विक्रम बत्रा (Vikram Batra) वो थे जिन्होंने कारगिल के 5 बेहद महत्वपूर्ण प्वॉइन्ट्स पर तिरंगा लहराने में अहम भूमिका निभाई थी. कैप्टन विक्रम बत्रा के किस्से सिर्फ हिंदुस्तान की धरती और यहां के लोग ही बयां नहीं करते बल्कि पाकिस्तान में भी उनकी बहादुरी बहुत मशहूर है.
Vikram Batra 46th birth anniversary, कैप्टन विक्रम बत्रा की 46वीं जयंती: खौफ खाती थी पाकिस्तान की सेना, पढ़ें- क्यों दिया था ‘शेरशाह’ कोडनेम

कारगिल का एक शहीद जवान जिसकी बहादुरी का किस्सा आज भी उनके कुछ शब्दों में गूंजता है तो देश के समर्पण के जज़्बे को लेकर उसकी शिद्दत मन में रोमांच भर देती है. कारगिल के शहीद विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जो किसी के दिल में देश भक्ति के जज़्बे को पैदा करने की ताक़त रखती है. एक ऐसा कैप्टन जिसने 24 साल के उम्र में ही देश के लिए शहादत दी, जो 1999 में कारगिल में पाक के खिलाफ युद्ध में शहीद हुआ. कैप्टन बत्रा वो थे जिन्होंने कारगिल के 5 बेहद महत्वपूर्ण प्वॉइन्ट्स पर भारत का तिरंगा लहराने में अहम भूमिका निभाई थी. कैप्टन विक्रम बत्रा के किस्से सिर्फ हिंदुस्तान की धरती और यहां के लोग ही बयां नहीं करते बल्कि पाकिस्तान में भी वो बहुत प्रसिद्ध हैं, पाक आर्मी उन्हें शेरशाह के नाम से बुलाया करती थी.

विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 में हुआ था, आज उनकी 46वीं जयंती है. सबके चहेते और आखिरी बार परमवीर चक्र पाने वाले आर्मी मैन बत्रा की कहानी में यूं तो बहुत किस्से हैं जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता. आज उनकी जयंती के मौके पर हम एक नए किस्से का जिक्र कर रहे हैं. हिस्ट्री मिस्ट्री में आज हम उस बात को जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्यों पाक आर्मी उनसे खौफ खाती थी और शेरशाह नाम उन्हें क्यों दिया?

Vikram Batra 46th birth anniversary, कैप्टन विक्रम बत्रा की 46वीं जयंती: खौफ खाती थी पाकिस्तान की सेना, पढ़ें- क्यों दिया था ‘शेरशाह’ कोडनेम

इसलिए पाक ने दिया था उन्हें शेरशाह कोडनेम

3 मई 1999 से लेकर 26 जुलाई तक भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल में युद्ध चला था. 13 JAK रायफल्स में 6 दिसम्बर, 1997 को लेफ्टिनेंट की पोस्ट पर विक्रम बत्रा देश सेवा के लिए शामिल हुए थे. दो साल के अंदर ही वो कैप्टन बन गए थे. कैप्टन बत्रा का खौफ पाक आर्मी में इतना था कि पड़ोसी मुल्क की सेना उन्हें करगिल में सबसे बड़ी चुनौती मानती थी. बंकर पर कब्ज़े के वक्त भी उनसे पाकिस्तीनी सेना की तरफ से कहा गया था कि वो ऊपर न आएं. ये सुनना था कि विक्रम बत्रा की रगों में खून तूफान की गति से दौड़ गया. जोश सातवें आसमान पर था. उनके लिए ये बात बहुत बड़ी थी कि आखिर पाकिस्तान ने उन्हें चुनौती कैसे दे दी. ये वही ऑपरेशन था जिसमें विक्रम बत्रा को शेरशाह की उपाधि दी गई थी.

पाक आर्मी उन्हें शेरशाह बुलाया करती थी, वहीं उनके कुछ दोस्त भी उन्हें इसी नाम से बुलाने लगे. मिशन के वक्त विक्रम बत्रा अपनी टीम के साथ चोटी पर चढ़ाई कर रहे थे. बत्रा ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए करगिल की धरती को दुश्मनों के खून सा लाल कर दिया था. 19-20 जून को उन्होंने प्वाइंट 5140 पर तिरंगा लहराया, ये बड़ा इंपॉर्टेंट और स्ट्रैटेजिक प्वांइट था… एक ऊंची, सीधी चढ़ाई पर पड़ता था.

घुसपैठिए भारतीय सैनिकों पर गोलियां बरसा रहे थे..4875 पर कब्ज़े के वक्त विक्रम बत्रा बुरी तरह घायल हो गए थे. 7 जुलाई को विक्रम बत्रा ने भारत माता की जय कहा और देश के शहीदों में अपना नाम दर्ज कराया. कारगिल के ऑपरेशन ने विक्रम बत्रा को दुश्मनों ने शेरशाह नाम दिया. वीर जवान की कहानी घर-घर तक पहुंचाने के लिए हिंदी फिल्म जगत में उनपर एक बायोपिक भी बन रही है. जिसका नाम है ‘शेरशाह’. पाकिस्तानी सेना में उनको शेरशाह के कोडनेम से बुलाया जाता था.

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‘ये दिल मांगे मोर’

जब विक्रम बत्रा ने प्वॉइन्ट 5140 को पाक के कब्जे से मुक्त कराया, इस वक्त उन्होंने अपनी कमांड पोस्ट को रेडियो पर एक मैसेज दिया- ‘ये दिल मांगे मोर.’ उनका ये मैसेज खासा फेमस हुआ. पूर्व आर्मी चीफ ने उनके बारे में कहा था कि अगर वो जिंदा वापस आता, तो 15 साल में भारतीय सेना का हेड बन गया होता.

विक्रम बत्रा प्वॉइन्ट 4875 को जीतने के लिए आगे बढ़े. 17 हजार फुट की ऊंचाई पर उन्होंने कई पाक सैनिकों को मौत के घाट उतारा. इस दौरान उनके साथी नवीन पर फायरिंग होने लगी. विक्रम नवीन को बचा रहे थे कि एक गोली आकर विक्रम के सीने में धंस गई. ये वो वक्त था जब उनके मुंह से आखिरी बार भारत माता की जय निकला. 7 जुलाई 1999 का ये सपूत शहीद हो गया. एक ऐसा कैप्टन शहीद हुआ था, जिसके किस्से हमेशा मिसालों में ज़िंदा रहेंगे.

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