एक बार स्वयंसेवकों का शिविर देखने, दूसरी बार शिकायत करने संघ की सभा में गए गांधी

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि गांधी संघ की सभा में आए थे. जानिए, वो कौन सा मौका था.

2 अक्टूबर गांधी जयंती के मौके पर भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने महात्मा गांधी को लेकर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी अगर आज होते तो वे RSS में होते. उधर RSS प्रमुख मोहन भागवत ने एक लेख में कहा कि बंटवारे के बाद सितंबर 1947 को गांधी दिल्ली में अपने घर के पास लगने वाली एक शाखा में गए थे. वहां स्वयंसेवकों के अनुशासन और जाति-पाति का अभाव देखकर गांधी ने उनकी प्रशंसा की थी.

गांधी को लेकर इस बार हवा थोड़ी बदली नजर आई. राकेश सिन्हा का बयान, मोहन भागवत का बयान, ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस के पास बच रहा आखिरी आदि पुरुष भी RSS अपने काम में ले आएगी. संकट से जूझ रही कांग्रेस को एक और संकट से दो चार होना पड़ेगा. गांधी ने अपना नाम लेने का मौका RSS को एक नहीं दो बार दिया था. वो भी तेरा साल के अंतराल में.

पहला मौका

1934 में वर्धा में रह रहे जमनालाल बजाज ने महात्मा गांधी को निमंत्रण भेजा. गांधी जिस घर में रुके उसके सामने मैदान था जो जमनालाल का ही था, इस मैदान में संघ का शिविर लगता था. गांधी ने एक हफ्ते तक बारीकी से स्वयंसेवकों को देखा. वे काफी मेहनती थे और सारे काम खुद करते थे. गांधी का मन हुआ कि अंदर जाकर शिविर को देखा जाए.

गांधी ने महादेव देसाई को अपनी इच्छा बताई, महादेव देसाई ने डॉ हेडगेवार के साथी अप्पाजी जोशी से बात की. अप्पाजी ने गांधी को आमंत्रित कर लिया. 25 दिसंबर 1934 को सवेरे 6 बजे ही गांधी शिविर में पहुंच गए. रसोईघर गए, वहां की व्यवस्था के बारे में बात की.

gandhi Rashtriya Swayamsevak Sangh, एक बार स्वयंसेवकों का शिविर देखने, दूसरी बार शिकायत करने संघ की सभा में गए गांधी
गांधी और हेडगेवार

गांधी को इस बात ने प्रभावित किया कि स्वयंसेवकों को एकदूसरे की जाति पता भी नहीं थी. उस दिन वहां हेडगेवार नहीं मिले लेकिन अगले दिन वे गांधी से मिलने गए. इस अनुभव के बारे में गांधी ने 13 साल बाद बताया जब वे दोबारा शिविर में गए.

दूसरा मौका

बंटवारे के बाद सांप्रदायिक दंगों का दौर चल रहा था. चारों तरफ खून खराबा पसरा हुआ था. गांधी को शिकायत मिली की इस सबके जिम्मेदार संगठनों में RSS भी एक है. गांधी सुनी-सुनाई पर यकीन नहीं करते थे और विरोधियों से भी सीधे बात करते थे.

वो मौका 16 सितंबर 1947 को आया. स्वयंसेवकों की एक सभा दिल्ली की दलित बस्ती में लग रही थी और गांधी वहीं रह रहे थे. उन्होंने सभा में जाने का फैसला किया. सभा में गांधी ने संघ के शिविर में 13 साल पहले हुए अपने अनुभव के बारे में बताया.

वहां स्वयंसेवकों के अनुशासन, सादगी और छुआछूत की समाप्ति की तारीफ की. उसके बाद सनातन और हिंदू का मतलब समझाया. अपनी शिकायतों के बारे में बताया और सांप्रदायिक दंगों पर रोक लगाने की हिदायत दी.

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