‘मोहम्मद की सेना’ बनाकर बरपा रहा कहर, जानें मसूद अज़हर की पूरी ए-बी-सी-डी

पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर हुए दर्दनाक हमले से पूरा देश गुस्से में भर उठा. ये पहली बार नहीं जब आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों पर सीधा हमला बोलने की हिमाकत की हो. ऐसे तमाम हमलों में जिस आतंकी संगठन का नाम सबसे ऊपर आता है, वो है- जैशे मोहम्मद. चौदह फरवरी के ताज़ा हमले की ज़िम्मेदारी […]

पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर हुए दर्दनाक हमले से पूरा देश गुस्से में भर उठा. ये पहली बार नहीं जब आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों पर सीधा हमला बोलने की हिमाकत की हो. ऐसे तमाम हमलों में जिस आतंकी संगठन का नाम सबसे ऊपर आता है, वो है- जैशे मोहम्मद. चौदह फरवरी के ताज़ा हमले की ज़िम्मेदारी भी इसी संगठन ने ली है. आइए आपको बताते हैं जैशे मोहम्मद की पूरी ए-बी-सी-डी और इसके सरगना मौलाना मसूद अज़हर का कच्चा चिट्ठा..

कैसे पनपा मसूद अज़हर

मसूद अज़हर का जन्म 1968 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बहावलपुर नाम की जगह हुआ. वो सुन्नी परिवार में जन्मा था जहां भाई-बहनों में उसका नंबर दसवां था. पिता सरकारी स्कूल में हेडमास्टर थे. डेयरी का कारोबार होने के चलते घर में पैसे को लेकर कोई तंगी नहीं थी. मसूद की इस्लामिक पढ़ाई जामिया उलूम अल इस्लामिया में हुई जिसके बाद वो इस्लाम पढ़ाने लगा. उसका रुझान देवबंदी विचारधारा की ओर था.

आतंक की पाठशाला का विद्यार्थी मसूद अज़हर

साल 1989 तक अफगानिस्तान में कई आतंकी संगठन सोवियत से लड़ रहे थे. लगभग सभी को अमेरिका ने खड़ा किया था. इनमें से एक हरकत उल मुज़ाहिद्दीन का जन्म हरकत उल जिहाद नाम के संगठन से हुआ था. इसी हरकत उल मुज़ाहिद्दीन ने अफगानिस्तान में लड़ाई खत्म होने के बाद कश्मीर में गतिविधियां करनी शुरू कीं. भारतीय सुरक्षाबलों ने जल्द ही इसका फन कुचल डाला. आतंकी सज्जाद अफगानी और संगठन का सचिव मौलाना मसूद अज़हर गिरफ्तार कर लिए गए. उनका सरगना पहले की पकड़ में आ चुका था.

1999 में सज्जाद अफगानी जेल तोड़कर भाग रहा था तब उसे गोली मार दी गई. बौखलाए हरकत उल मुजाहिद्दीन ने इंडियन एयरलाइंस 814 फ्लाइट को हाईजैक कर लिया. अपहरणकर्ताओं ने बंधकों को छोड़ने के बदले तत्कालनी वाजपेयी सरकार से तीन कुख्यात आतंकियों को रिहा करने के लिए कहा. इन तीनों में से एक मौलाना मसूद अज़हर भी था.

जैशे मोहम्मद की पैदाइश

कहा जाता है कि भारत की जेल से आज़ाद होने के बाद मसूद अज़हर अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन से मिला. भविष्य की गतिविधियों के लिए उसे लादेन ने पूरे सहयोग का भरोसा दिया. इसके बाद मौलाना पाकिस्तान पहुंचा और साल 2000 में अपना अलग संगठन जैशे मोहम्मद खड़ा कर लिया जिसका अर्थ हुआ – मोहम्मद की सेना.

अगले ही साल अक्टूबर 2001 में जैश ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आत्मघाती हमला करके 38 लोगों की जान ले ली.

उसी साल दिसंबर महीने में भारतीय संसद पर हमले के पीछे भी इसी संगठन का हाथ था. हमले में उसका साथ लश्करे तैयबा ने दिया. 8 जवान हमलले में शहीद हुए, और भारत-पाकिस्तान जंग के मुहाने पर आ खड़े हुए.

जैश की अचानक बढ़ी हरकतों की वजह से उसी महीने संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका ने जैश को आतंकी संगठन घोषित कर दिया. तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ की भारत यात्रा से पहले पाकिस्तान ने भी जनवरी 2002 में जैशे मोहम्मद पर बैन लगा दिया. गुस्से में भरे जैशे मोहम्मद का निशाना इसके बाद पाकिस्तान बना. कई शहरों में आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया गया. साल 2002 में अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या में भी इसी संगठन का नाम आया जिसने अमेरिका को बौखलाहट से भर दिया.

मसूद अज़हर की बढ़ती हरकतें

तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ पर भी 14 और 25 दिसंबर 2003 को दो हमले जैश ने कराए जिनमें उनकी जान बच गई. खुद मुशर्रफ ने माना कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को सही वक्त पर सूचना देकर भारतीय खुफिया एजेंसियों ने उनकी जान बचाई. बुरे वक्त में यानि साल 2003 में जैशे मोहम्मद दो भागों में बंट गया. एक हिस्सा बना जमात उल फुरकान जिसका नेता था अब्दुल्ला शाह मज़हर और दूसरे धड़े खुद्दाम उल इस्लाम का नेता बना मौलाना मसूद अज़हर. 2003 में इन दोनों गुटों पर भी पाकिस्तानी सरकार ने बैन लगा दिया.

अब मौलाना मसूद अज़हर ने अपने संगठन को नया नाम दिया- अल रहमत ट्रस्ट और परदे के पीछे से काम करने की रणनीति अपनाई. मौलाना मसूद अज़हर के भाई अब्दुल रऊफ असगर ने सामने से संगठन चलाना शुरु किया. वो खुद प्लेन हाईजैक के अपहरणकर्ताओं में से एक था.

पाकिस्तानी सरकार ने भी जैश समर्थकों को घेरना शुरू कर दिया और आखिरकार पस्त हुए हौसलों के साथ मौलाना मसूद अज़हर ने मुशर्रफ सरकार से समझौता करने में ही भलाई समझी. इसके बाद मौलाना मसूद अज़हर पर पाकिस्तानी एजेंसियों का रवैया नर्म होता चला गया.

कहा जाता है कि 2009 में तो इस संगठन ने पाकिस्तान के बहावलपुर में साढ़े छह एकड़ में निर्माणकार्य किया. यहां उन्होंने आतंकियों को ट्रेनिंग देने का खुलकर काम किया और पाकिस्तान सरकार ने उस ओर से आंखें मूंदे रखीं.

बढ़ती गई मसूद अज़हर की हिमाकत

ये मौलाना मसूद अज़हर था जिसने साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले धमकी दी कि अगर मोदी पीएम बने तो वो हमला बोल देगा.

2015 के अंत में मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम नवाज़ शरीफ से मुलाकात की. दोनों देशों को करीब आते देख मौलाना मसूद अज़हर बेचैन हो गया और 2016 के शुरू होते ही पठानकोट एयरबेस पर उसने अपने गुर्गों से हमला करा दिया. उसी साल सितंबर में उरी हमले में भी जैश का नाम आया था.

क्या है मसूद अज़हर का उद्देश्य

जैशे मोहम्मद भारत से कश्मीर छीनकर पाकिस्तान में मिला देने की ख्वाहिश रखता है. उसे लगता है कि सुरक्षाबलों पर बार-बार हमला करने से वो उनके हौसले पस्त कर देगा. नतीजतन भारत को कश्मीर छोड़ देना पड़ेगा. पाकिस्तान भर से नौजवानों और बच्चों को भारत के खिलाफ भड़का कर मसूद अज़हर अपने संगठन में भर्ती करता है. मसूद ने पहले भी साफ कहा है कि वो अयोध्या में बाबरी मस्जिद और दिल्ली-अमृतसर में मस्जिदों पर अपना कब्ज़ा चाहता है. इसके अलावा वो घाटी के JKLF जैसे संगठनों का आलोचक है जो उसकी अपेक्षा उदार हैं.

भारत से आगे जैश इज़राइल और अमेरिका की तबाही का उद्देश्य रखता है.

जैश के बड़े आतंकी हमले

जैशे मोहम्मद ने अपनी स्थापना के महज़ दो महीने बाद ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला बोल दिया था. उसी साल भारतीय संसद पर हमला करके उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा. अगले साल 2002 में उसके हमलों का केंद्र पाकिस्तान बन गया क्योंकि तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने उसे बैन कर दिया. दुनिया भर के दबाव में पाकिस्तान को कार्रवाई करनी पड़ रही थी लेकिन जैश इसे पाकिस्तान सरकार की कायरता मान रहा था. मुंबई में 2003 में ट्रेन धमाकों में भी उसका नाम आया. इसी साल मुशर्रफ की जान लेने की उसकी दो कोशिशें बेकार हुईं. अयोध्या परिसर में भी उसने साल 2005 में हमला किया था. उसी साल लंदन में भी बम धमाकों में जैशे मोहम्मद का हाथ माना गया. भारत में हुए पठानकोट हमले के बाद उरी और अब पुलवामा हमले में भी जैश का शामिल होना माना गया है.

मसूद अज़हर पर मेहरबान चीन

मसूद अज़हर की हरकतें लगातार बढ़ती गई हैं. उन पर रोक लगा पाने में पाकिस्तान अक्षम रहा. ऐसे में भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसके खिलाफ आवाज़ उठाई. संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्राष्ट्रीय आतंकियों की सूची में भी उसका नाम शामिल कराने की कोशिशें होती रही लेकिन पाकिस्तान उसका रक्षक बन गया. आतंक के खिलाफ लड़ने का ढोंग करनेवाली पाकिस्तानी सरकार ने इस मामले में चीन का साथ भी मांगा. चीन ने सिर्फ भारत विरोध में मसूद अज़हर का साथ देने का निश्चय किया. भारत चीन के सामने अपना पक्ष रखता रहा है लेकिन अब तक चीन का वीटो मौलाना मसूद अज़हर की ढाल बना हुआ है.