कौन था नाथूराम गोडसे जिसमें साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर को दिखता है ‘देशभक्‍त’ ?

महात्मा गांधी की हत्या करने के बाद खुद नाथूराम गोडसे ने माना था कि उसने एक इंसान की हत्या की है, इसलिए उसे फांसी मिलनी चाहिए.

मालेगांव ब्लास्ट केस में रिहाई, फिर सियासत की लड़ाई और अब संसद में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की बड़ाई. साध्वी प्रज्ञा के विवादित बयानों की लंबी फेहरिस्त है. लेकिन जिस नाथूराम गोडसे को लेकर देश की राजनीति में नया तूफान उठा है. वो कौन हैं और क्यों गोडसे आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा विलेन है. ये जानना जरूरी है.

जब झकझोरने वाली खबर आई

30 जनवरी 1948… 72 साल पहली यही तारीख थी. जब माघ महीने महीने की हाड़ कंपा देने वाली दिल्ली की सर्द शाम से देश को झकझोरने वाली खबर आई. 168 दिन हुए थे देश को आज़ाद हुए. अभी तो आज़ादी के अहसास का आगाज भर हुआ था. लेकिन मुल्क को आज़ादी दिलाने वाला मसीहा एक सिरफिरे की साजिश का शिकार होकर चिरनिद्रा में सो चुका था.

महात्मा गांधी के शरीर में उतार दी थीं गोलियां 

30 जनवरी, 1948 को दिल्ली में सूरज नहीं निकला था. कोहरे और सर्दी की वजह से सड़कों पर दिल्ली वाले भी ज्यादा नहीं थे. देर होने की वजह से शाम पांच बजकर पंद्रह मिनट पर बापू लगभग भागते हुए बिरला हाउस के प्रार्थना स्थल की तरफ़ बढ़ रहे थे. ठीक दो मिनट बाद ही नथूराम गोडसे ने अपनी बेरेटा पिस्टल की तीन गोलियां महात्मा गांधी के शरीर में उतार दी थीं.

अभागे काम को अंजाम दिया

गांधी मरे नहीं. मार दिए गए. उनकी मौत का वो दिन मुकर्रर हुआ नहीं था. मुकर्रर किया गया था. अंग्रेज़ों की गुलामी की बेड़ियों के देश को आज़ादी वाले बापू के हिस्से की सांसें खत्म नहीं हुई थीं. किसी ने जबरन उनका दम घोंट दिया था. जिस शख्स ने इस अभागे काम को अंजाम दिया, वो शख्स था गोडसे. पूरा नाम, नाथूराम विनायक गोडसे.

जब मौत आई…

बहुत करीब से गोली मारी थी गोडसे ने बापू को. चंद घड़ियां भी नहीं मिलीं उनको कि कुछ समझ पाते. गांधी जी कहा करते थे कि मरते समय उनकी जुबां पर ‘हे राम’ होगा. लेकिन जब मौत आई, तो गांधी जी को ये इच्छा पूरी करने भर की भी मोहलत नहीं मिली.

हत्या की खबर आग की तरह फैल गई

गोली लगने के बाद महात्मा गांधी को घायल अवस्था में किसी अस्पताल नहीं ले जाया गया. बल्कि उन्हें वहीं घटनास्थल पर ही मृत घोषित कर दिया गया और उनका शव उनके आवास बिरला हाऊस में रखा गया. महात्‍मा गांधी की हत्या की खबर चंद मिनटों में आग की तरह फैल गई.

बिड़ला हाउस में ही उनके पार्थिव शरीर को ढककर रखा गया था. तभी वहां उनके सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी पहुंच गए और उन्होंने बापू के पार्थिव शरीर से कपड़े को ये कह कर हटा दिया था कि अहिंसा के पुजारी के साथ हुई हिंसा को दुनिया देखे.

8 लोगों को आरोपी बनाया गया

करीब 40 मिनट बाद बापू की हत्या की FIR दिल्ली के तुगलक रोड थाने में दर्ज की गई. FIR की कॉपी उर्दू में लिखी गई थी. जिसमें पूरी वारदात के बारे में बताया गया था. गांधीजी की हत्या के बाद इस मुकदमे में नाथूराम गोडसे समेत 8 लोगों को आरोपी बनाया गया था.

खुद कुबूला जुर्म

गांधीजी हत्या का मुकदमा 27 मई 1948 को लालकिले में नाथूराम गोडसे और अन्य सात आरोपियों के खिलाफ शुरू हुआ था. मुकदमे को रेक्स बनाम नाथूराम और अन्य के नाम से जाना गया.

ये कार्यवाही किले के मैदान पर बनी आलीशान विक्टोरियाई इमारत की ऊपरी मंजिल में चली. मुकदमे के जज आत्माचरण थे. मुकदमे में कोई ज्यूरी नहीं थी. सुनवाई के दौरान नाथूराम गोडसे ने खुद कुबूला था कि उसी ने बापू की हत्या की है.

हाथ जोड़कर प्रणाम किया…

गोडसे ने बताया था कि शाम 5.10 बजे मैंने गांधी जी को अपने कमरे से निकलकर प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए देखा. गांधीजी के अगल-बगल दो लड़कियां थीं, जिसके कंधे पर वो हाथ रखकर चल रहे थे.

मैंने अपने सामने गांधी को आते देख सबसे पहले उनके महान कामों के लिए हाथ जोड़कर प्रणाम किया और दोनों लड़कियों को उनसे अलग कर गोलियां चली दीं. दो ही गोली चलाने वाला था. लेकिन तीसरी भी चल गई और गांधी जी वहीं पर गिर पड़े.

नाथूराम गोडसे को फांसी चढ़ाया गया

गांधी की हत्या के लिए ख़ुद गोडसे ने माना था कि उसने एक इंसान की हत्या की है. इसलिए उसे फांसी मिलनी चाहिए. इसी आधार पर गोड्से ने जज आत्माचरण के फांसी देने के फ़ैसले के ख़िलाफ अपील ही नहीं की.

गांधीजी की हत्या के मामले में 10 फरवरी 1949 के दिन विशेष अदालत ने सजा सुनाई थी. नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को मारा. उस तारीख के ठीक साढ़े 22 महीने यानी 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी चढ़ाया गया था. ये आजाद देश की पहली फांसी थी.

पुणे के पास बारामती में हुआ जन्म 

नाथूराम गोडसे का जन्म 19 मई 1910 को महाराष्ट्र के पुणे के पास बारामती में हुआ था. नाथूराम गोडसे को पैदा होने के बाद नथ पहनाई गई थी, बाद में ये नथ निकाल दी गई थी. नथ पहनने के चलते उसका नाम नाथूराम पड़ा था.

बापू को आदर्श मानता था

दिलचस्प बाते ये है कि महात्मा गांधी का कातिल नाथूराम गोडसे पहले बापू को आदर्श मानता था. नाथूराम गोडसे को पहली बार महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन के सिलसिले में जेल जाना पड़ा था.

अंग्रेजों के जाने के बाद जब मुल्क के बंटवारे की तैयारी शुरू हुई तो गोडसे और उसके साथी इसके विरोध में उतर आए. 3 जुलाई 1947 को गोडसे, उसके साथियों और तमाम हिंदूवादी नेताओं ने शोक दिवस मनाया था.

हत्या की कोशिशें नाकाम हुईं थीं

देश के आजाद होने के बाद बने हालात ने गोडसे के दिमाग में भरी नफरत को और जहरीला कर दिया था. जिसका अंजाम देश को राष्ट्रपिता को खोकर चुकाना पड़ा.  30 जनवरी 1948 से पहले भी नाथूराम गोडसे ने बापू की हत्या के लिए मई 1934 और सितंबर 1944 में भी नाकाम कोशिश की थी.

लेकिन नाकाम होने पर वो अपने दोस्त नारायण आप्टे के साथ वापस मुंबई चला गया.  पिस्टल खरीदने के बाद दोनों 29 जनवरी 1948 को वापस दोनों फिर दिल्ली पहुंचे और 30 जनवरी को देश को सबसे बड़ा सदमा दे दिया.

सियासत की हांडी चढ़ती रही

नाथूराम गोडसे को फांसी पर लटके 70 साल हो चुके हैं. लेकिन देश की राजनीति अब भी देश के सबसे बड़े हत्यारे के नाम पर उबाल मारती रहती है. पिछले 6 महीने के दौरान गोडसे के नाम पर देश में कैसे सियासत की हांडी चढ़ती रही.

साउथ के सुपरस्टार और हाल ही में नेता बने कमल हासन ने विवादित बयान 13 मई को तमिलनाडु में एक चुनावी रैली के दौरान दिया था. जिसके तीन दिन बाद यानी 16, मई 2019 को साध्वी प्रज्ञा ने इसके जवाब कहा था कि गोडसे देशभक्त थे, हैं और रहेंगे. उन्हें हिंदू आतंकवादी बताने वाले अपने गिरेबान में झांककर देखें.

साध्वी प्रज्ञा ने देश के राष्ट्रपिता के हत्यारे को देशभक्त बताने वाला ये विवादित बयान भोपाल में दिया था. जिसके बाद चुनावी माहौल में देश की सियासत गरमा गई थी. शाम होते-होते साध्वी के बोल भी बदल गए थे.

मेरी भावना किसी को आहत करने की नहीं थी. न किसी के मन को कष्ट पहुंचाने की थी. अगर किसी के मन को कष्ट पहुंचा है तो मैं क्षमा चाहती हूं. गांधी जी ने जो देश के लिए किया है. उसको भुलाया नहीं जा सकता. मैं इनका बहुत सम्मान करती हूं.

साध्वी प्रज्ञा ने भले ही अपने बयान पर माफी मांग ली थी. लेकिन जुंबा से निकली बात अंजाम तक पहुंच चुकी थी. बीजेपी ने साध्वी के बयान की कड़ी निंदा की. लेकिन 6 महीने बाद एक बार फिर साध्वी ने गोडसे को देशभक्त बताकर विरोधियों को बीजेपी पर निशाना साधने का मौका दे दिया. लिहाजा इस बार साध्वी पर सख्त एक्शन हो सकता है.