जलियांवाला बाग नरसंहार के 101 साल, आखिर क्यों माफी नहीं मांग रहा अफसोस और शर्म से भरा ब्रिटेन

जलियांवाला बाग नरसंहार दुनियाभर के लोगों को बर्बर ब्रिटिश उपनिवेशवादी काल की याद दिलाता है. वहीं भारतीय लोगों को हमेशा इसका ध्यान दिलाता रहेगा कि हमने कितने ही बलिदानों की कीमत चुकाकर अपनी आजादी हासिल की है.

जलियांवाला बाग नरसंहार के आज 101 साल पूरे हो गए. यह नरसंहार दुनियाभर के लोगों को बर्बर ब्रिटिश उपनिवेशवादी काल की याद दिलाता है. वहीं भारतीय लोगों को इसका ध्यान दिलाता रहेगा कि हमने कितने ही बलिदानों की कीमत चुकाकर अपनी आजादी हासिल की है.

अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास स्थित जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को कर्नल रेजीनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर ने ब्रिटिश सैनिकों के साथ पहुंचकर पंजाबी नववर्ष के मौके पर शांतिपूर्ण इकट्ठे हुए लोगों पर गोलीबारी कर दी थी. जनरल डायर ने अपने सैनिकों के साथ अंदर आने के बाद एक मात्र निकास को बंद कर दिया था. इसक बाद बिना किसी चेतावनी के पुरुषों, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी. बताते हैं कि डायर के 6 बार फायर कहने पर 1650 राउंड गोलियां चलाई गई थी.

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गोलीबारी, भगदड़ और घुटन से मरने वालों की सही संख्या?

जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सरकार के दमनकारी रॉलट एक्ट के विरोध में बुलाई गई सभा में करीब 20-25 हजार लोग जमा हुए थे. शांतिपूर्वक विरोध जता रहे निहत्थे लोगों पर अचानक पहुंची ब्रिटिश सैनिकों ने बिना कुछ कहे गोलियां चला दीं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 379 लोग मारे गए थे और 1100 लोग घायल हुए थे, जबकि अनाधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, करीब 1000 लोगों की मौत हुई थी और 1500 लोग घायल हुए थे. वहां गोलीबारी, भगदड़ और घुटन से मरने वालों की सही संख्या अभी तक आंकी नहीं जा सकी है.

इस 6.8 एकड़ परिसर में वैसाखी त्योहार के पवित्र दिन पर हुए नरसंहार से भारत के आजादी के आंदोलन की चिंगारी को और हवा लगी थी. नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्र नाथ टैगोर ने भी इसके विरोध में अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी. वहां लगी एक पट्टिका पर लिखा है, “यह स्थान भारत को ब्रिटिश शासन से आजाद कराने के लिए अहिंसक संघर्ष में बलिदान हुए हजारों भारतीय देशभक्तों के खून से नम है.”

डायर को दी गई हैवानियत भरे अपराध की सजा

तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने शुरू में इस घटना का संज्ञान लेने से भी इनकार कर दिया, लेकिन बाद में ‘हंटर कमेटी’ बनाकर जांच का आदेश दिया गया. आखिरकार उन्हें अपने उस हैवानियत से भरे अपराध की गंभीरता महसूस करनी पड़ी. ब्रिटिश सरकार को जनरल डायर को ब्रिटिश आर्मी से समय से पहले ही रिटायर करना पड़ा था. उसे भारत से भी वापस भेज दिया गया था. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश राज के अंत में डायर के इस कदम की निर्णायक भूमिका थी.

ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर की तो 1927 में मौत हो गई, लेकिन नरसंहार का दूसरा सबसे बड़ा अपराधी लेफ़्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर भागकर लंदन में बस गया था. साल 1934 में लंदन पहुंचकर क्रांतिकारी उधम सिंह ने उसे भरी सभा में भाषण देने के दौरान गोली मार दी. इस तरह उसको वह सजा मिली जिसका वह हकदार था. डायर इतना घृणित था कि वह कहा करता था, ‘अगर उसे दोबारा जलियांवाला बाग हत्याकांड करने का मौका मिले तो वह करेगा.’

अफसोस जताने और श्रद्धांजलि तक ही ब्रिटेन की संवेदना

ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन ने 20 फरवरी, 2013 को जलियांवाला बाग में श्रद्धांजलि अर्पित की थी. वहीं साल 2019 में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ब्रिटिश संसद में 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार पर खेद जताया था. थेरेसा मे ने कहा था कि हमें गहरा अफसोस है कि यह घटना हुई. इस पर विपक्ष की तरफ से जेरेमी कॉर्बिन ने थेरेसा से माफी मांगने के लिए भी कहा था.

साल 2019 में ही अपनी पत्नी कैरोलीन के साथ जलियांवाला बाग पहुंचे कैंटरबरी के आर्कबिशप जस्टिन पोर्टल वेल्बी ने दंडवत लेकर बलिदानियों को श्रद्धांजलि दी. ब्रिटिश काल में हुए इस नृशंस हत्याकांड पर दुख ज़ाहिर किया. उन्होंने यहां पर प्रार्थना करते हुए कहा, ‘इतिहास में जो हुआ वो आप सब की यादों में है और यह जीवनपर्यंत रहेगा. मैं इस ख़ौफनाक कृत्य को लेकर बेहद दुखी और शर्मिंदा हूं.

Archbishop Justin Welby visits Jallianwala Bagh
Archbishop Justin Welby visits Jallianwala Bagh

जलियांवाला बाग हत्याकांड की 100वीं बरसी पर नेशनल मेमोरियल दिल्ली पहुंचे ब्रिटिश उच्चायुक्त ने भी इस नरसंहार को शर्मनाक बताते हुए अफसोस जाहिर किया था. ब्रिटिश उच्चायुक्त डोमिनिक एस्क्विथ ने विज़िटर्स बुक में लिखा, ‘आज से 100 साल पहले जो कुछ भी हुआ वो ब्रिटिश-इंडियन हिस्ट्री के लिए बेहद शर्मनाक है. हमलोग इस घटना को लेकर अफसोस जाहिर करते हैं.’

ब्रिटेन से आधिकारिक माफी की मांग का प्रस्ताव

जलियांवाला बाग नरसंहार के 100वें वर्ष में यानी बीते साल पंजाब विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित हुआ था जिसके तहत केंद्र सरकार पर दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में शामिल इस कांड के लिए ब्रिटिश सरकार से माफी की मांग करने के लिए दवाब डाला जाने की बात कही गई थी. मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की अगुआई में एक वॉइस नोट के जरिए कहा गया था कि नरसंहार के लिए माफी शहीदों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

लाशों और बेहोश लोगों को एक साथ किया था इकट्ठा

पंजाबी उपन्यास के पितामह के नाम से प्रसिद्ध नानक सिंह की खोई पांडुलिपी ‘खूनी वैसाखी’ का बीते साल आए अंग्रेजी एडिशन में इस दर्दनाक यादों का फर्स्ट हैंड अकाउंट है. नानक सिंह 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में उस कार्यक्रम में मौजूद थे जहां नरसंहार हुआ था. तब वह 22 साल के थे. उन्होंने बताया है कि अंग्रेज सैनिकों ने ‘रॉलट अधिनियम’ के विरोध में वहां प्रदर्शन कर रहे हजारों निहत्थे लोगों पर गोलीबारी शुरू कर दी. भगदड़ में नानक सिंह बेहोश हो गए और उसी हालत में उनके शरीर को मारे गए सैकड़ों लोगों के शवों के साथ इकट्ठा कर दिया गया था.”

इन अनुभवों को पढ़ने के बाद किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं. उस घटना से संभलने के बाद नानक सिंह ने ‘खूनी वैसाखी’ नामक एक लंबी कविता लिखना शुरू किया था. जो नरसंहार और इसके तत्काल बाद की राजनीतिक घटनाओं का वर्णन करती है. कविता में ब्रिटिश सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी. 1920 में इसके प्रकाशित होने के बाद बहुत जल्द इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था.

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