वो चुनाव जिसके बाद एक नेता बन गया आतंकी!

वो चुनाव जिसके बाद एक नेता बन गया आतंकी!, वो चुनाव जिसके बाद एक नेता बन गया आतंकी!

हिज्बुल मुजाहिद्दीन का सरगना सैयद सलाहुद्दीन अगर मंत्री बन कर फीता काट रहा हो, या यासीन मलिक बतौर विधायक किसी बिल पर बहस कर रहा हो तो आपको कैसा लगेगा? ये कल्पना अजीब लगती है, लेकिन सच तो ये है कि ऐसा हो भी सकता था. तीन दशक पहले कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव अगर उस तरह ना होते जैसे हुए, तो शायद सलाहुद्दीन और यासीन मलिक ने जिन हाथों में बंदूक थामी उन्हीं हाथों को जोड़कर घाटी की गलियों में वोट मांग रहे होते.

आइए आज आपको ले चलते हैं कश्मीर के उस चुनाव की तरफ जिसने कश्मीर में सियासी नारों के शोर को बम और गोलियों की गूंज के नीचे दबा दिया.

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P.S. हेराल्ड

चुनाव लड़ने का जोश, जुनून और तिकड़में

ये साल था 1987 . फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस और राजीव गांधी की सरपरस्ती में कांग्रेस एक बार फिर हमजोली हो गए थे. राजीव को जम्मूकश्मीर में कांग्रेस का झंडा बुलंद करना था तो फारुक के सामने षड्यंत्रकारी मुफ्ती मोहम्मद सईद से बदला चुकाना था. मुफ्ती साहब तब कांग्रेस में थे लेकिन गठबंधन की मजबूरी में प्रचार भी फारुक के लिए करना था.

कारवां पत्रिका में प्रवीण डोंथी ने इस चुनाव प्रचार का एक दिलचस्प वाकया लिखा है.

अपने क्षेत्र अनंतनाग के खनबल में मुफ्ती एक सभा में भाषण दे रहे थे. उनके साथ कांग्रेस की नज़मा हेपतुल्ला भी थीं. अचानक मुफ्ती ने जेब से कलम निकाली और उसे दाएं से बाएं तो कभी बाएं से दाएं हाथ में घुमाने लगे. साथसाथ वो अपनी काल्पनिक दाढ़ी पर भी हाथ फिरा रहे थे। वो कह रहे थे– ‘मेरे कांग्रेसी साथियों, आपको ये बताने की ज़रूत नहीं कि किसे वोट देना है.

बेचारी नज़मा को कश्मीरी नहीं आती थी तो समझ नहीं पाईं लेकिन वहां खड़े लोग मुफ्ती साहब का संदेश साफ समझ रहे थे. वो कांग्रेस की सभा में विरोधी दल मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के लिए वोट मांग रहे थे, जिसका चुनाव चिह्न कलमदवात था और उसका उम्मीदवार एक लंबी दाढ़ी वाला था.

मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) 1987 में ही बनी एक ऐसी पार्टी थी जिसमें घाटी के कई संगठन जुड़े थे. ये सारे फारुक से नाराज़ थे. इनमें कट्टरपंथी धड़ों से लेकर प्लेबिसाइट समर्थक तक शामिल थे. कश्मीरी आवाम जिस तरह MUF का समर्थन कर रही थी उससे अंदाज़ा लग रहा था कि वो पुरानी पार्टियों को कड़ी टक्कर ज़रूर देगी.

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PS- कारवां

उस चुनाव में धांधलियों ने हद पार कर दी

अशोक कुमार पांडेय ने अपनी किताब कश्मीरनामा में 1987 के चुनाव की धांधली का वर्णन करते हुए एक उदाहरण लिखा है.

श्रीनगर के अमीराकदल से MUF के प्रत्याशी के तौर पर मोहम्मद युसुफ शाह ने चुनाव लड़ा जो आगे चलकर हिज्बुल मुजाहिद्दीन का सरगना सैयद सलाहुद्दीन बना. उस वक्त युसुफ शाह ने भारतीय लोकतंत्र में भरोसा जताते हुए चुनावी राजनीति की राह पकड़ी थी.

बेमिना डिग्री कॉलेज में मतगणना शुरू हो चुकी थी. इससे पहले दो चुनावों में मात खा चुका युसुफ शाह लगातार आगे चल रहा था. रुझान उसकी बड़ी जीत स्पष्ट दिखा रहे थे. नेशनल कॉन्फ्रेंस के मोइनुद्दीन शाह बुरी तरह निराश होकर मतगणना केंद्र से बीच में ही उठकर चल दिए. थोड़ी ही देर में मतगणना अधिकारी ने उन्हें वापस बुलाकर विजयी घोषित कर दिया. लोग इस फैसले के बाद सड़कों पर उतर आए. पुलिस ने युसुफ शाह और उसके एजेंट यासीन मलिक (जिसने बाद में आतंक का रास्ता पकड़ा और फिर  उससे भी लौट आया) को गिरफ्तार कर लिया. दोनों को बीस महीनों तक बिना केस के जेल में रहना पड़ा. 

उर्मिलेश अपनी किताब कश्मीरविरासत और सियासत में बताते हैं कि यासीन मलिक को मतगणना केंद्र में पीट पीटकर लहूलुहान कर दिया गया था. युसुफ शाह के एक और समर्थक एजाज डार को भी पीटा गया.

 

उस चुनाव को घाटी ने नहीं स्वीकारा

नेशनल कॉन्फ्रेंसकांग्रेस ने उस विधानसभा चुनाव में 63 सीटें जीतीं, MUF को 4 सीटें हासिल हुईं, बीजेपी ने 2 सीट कब्ज़ाईं और निर्दलीय प्रत्याशियों को भी 4 सीटें मिल गईं. आज तक ठीक अनुमान नहीं लग सका कि अगर धांधली ना होती तो MUF कितनी सीटें हासिल करती लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक वो 15-20 सीटें हासिल कर सकती थी. नेशनल कॉन्फ्रेंसकांग्रेस की सरकार बिना धांधली के बन भी सकती थी लेकिन गड़बड़ियों ने कश्मीरी जनता का मोहभंग कर दिया. बड़ी तादाद में कश्मीरी नौजवानों का असंतोष आतंकवाद में तब्दील हो गया.

1993 में इंडिया टुडे के पत्रकार हरिंदर बावेजा ने जब फारुक अब्दुल्ला से पूछा कि क्या चुनाव में धांधली नहीं हुई थी तो खीझे हुए फारुक ने जवाब दिया था– ‘मैं यह नहीं कह रहा कि धांधली नहीं हुई थी, लेकिन मैंने नहीं करवाई थी.

बहरहाल, भले ही राज्य में फारुक अब्दुल्ला सरकार बनाने में कामयाब रहे हों लेकिन विरोध प्रदर्शनों पर पत्थरबाज़ी का सिलसिला जो चला तो वो आज तक किसा ना किसी बहाने जारी है.

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और आतंकी बन गया सैयद सलाहुद्दीन

अपने घर से अचानक गायब हुए युसुफ शाह के सैयद सलाहुद्दीन बनने के बारे में पूरी कहानी तो आज तक खुली नहीं लेकिन हिज्बुल मुजाहिद्दीन में उसके प्रवेश करते ही हंगामा खड़ा हो गया. घाटी के लोग पहली बार सीमा पार करके आतंकी संगठनों में शामिल होने लगे. पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई को भारत से बदला लेने का मौका हाथ लग गया. वो बांग्लादेश विभाजन के बाद से ऐसे मौके की तलाश में ही थी.

वैसे माना तो जाता है कि चुनाव में धांधलियों से हारा युसुफ शाह आक्रोश में सैयद सलाहुद्दीन बना लेकिन नंदिता हक्सर की किताब The many faces of kashmiri nationalism इस बारे में काफी कुछ कहती है.

ग्रेटर कश्मीर के पत्रकार हिलाल अहमद से बातचीत में सलाहुद्दीन ने कहा कि MUF जीतता या हारता लेकिन कश्मीर में विद्रोह भड़कना ही था. सलाहुद्दीन ने कहा

चुनाव में धांधलियों की वजह से मेरे हथियार थामने वाली बात बिल्कुल गलत है. मुफ्तियों ने चुनावी नतीजों को गलत मोड़ दिया. मैं चुनाव लड़ने से बहुत पहले स्वतंत्रता सेनानी था. ये मुझे पुरखों से विरासत में मिला था. बडगाम में मेरा भाई सईद गुलाम मोहम्मद प्लेबिसाइट फ्रंट का जिला अध्यक्ष था. मेरे दादा हाजी गुलाम मोइनुद्दीन को एक बदनाम पुलिस अफसर ने टॉर्चर किया था क्योंकि वो भारत के स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस के रूप में मनाते थे. हमने चुनाव लड़ा ताकि हम एसेंबली में कश्मीर की आजादी का प्रस्ताव पास कर पाते. भारत ये जानता था, इसीलिए उन्होंने चुनाव में धांधली की. 

 

वापस सकता था सैयद सलाहुद्दीन

सैयद सलाहुद्दीन के आतंकी बनने की वजहों पर अलगअलग जानकार अलगअलग राय रखते हैं. 1990 के बाद वो दहशतगर्दी की राह चला तो फिर एक के बाद एक हिंसक वारदातों को अंजाम देता चला गया.

एस दुलत ने अपनी किताब कश्मीर वाजपेयी ईयर्स में बताया है कि सलाहुद्दीन मुख्यधारा में लौटने का इच्छुक था. वो अपने बेटे की पढ़ाई को लेकर फिक्रमंद था. उसका बेटा जम्मू में मेडिकल कॉलेज के दाखिले के लिए तो योग्य था लेकिन सलाहुद्दीन चाहता था कि उसका दाखिला श्रीनगर में हो जाए. इस काम के लिए सलाहुद्दीन ने कई लोगों से संपर्क किया. उनमें से एक थे गुप्तचर ब्यूरो में दुलत के सहकर्मी के एम सिंह.

के एम सिंह के फारुक अब्दुल्ला से अच्छे संबंध थे. उन्होंने फारुक के ज़रिए सलाहुद्दीन का काम करवा दिया. बेहद कृतज्ञ सैयद सलाहुद्दीन ने फोन करके के एम सिंह का शुक्रिया अदा किया. दुलत लिखते हैं कि हम सलाहुद्दीन की वापसी करा सकते थे, क्योंकि वो खुद भी ऐसा चाहता था मगर हमने वक्त बहुत खराब कर दिया. दरअसल पीएमओ के लिए साल 2002 में सलाहुद्दीन की वापसी से बड़ा मुद्दा अगला लोकसभा चुनाव थे.

दुलत कहते हैं कि बाद में भी उनके पास सलाहुद्दीन के संदेश आते रहे और वो सरकार को उन्हें भेजते रहे मगर किसी ने भी शायद गंभीरता से फॉलो अप लिया ही नहीं.

 

भारत का दुश्मन नंबर एक है सलाहुद्दीन

सैयद सलाहुद्दीन और उसका हिज्बुल मुजाहिद्दीन बदस्तूर हिंदुस्तान के खिलाफ वारदातों को अंजाम देते रहे. वो भारत में हुए कई बड़े आतंकी हमलों में शामिल था. जनवरी 2016 के पठानकोट एयरबेस पर हमले में उसके संगठन यूनाइटेड जिहाद काउंसिल का हाथ रहा जो 13 आतंकी संगठनों का संयुक्त संगठन है. 2012 से ही वो NIA की वॉन्टेड लिस्ट में है. साल 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट में हुए बम धमाकों में 15 लोगों की जान चली गई जिसके लिए उसे ही ज़िम्मेदार माना गया. कश्मीर में भी साल 2014 में हुए ब्लास्ट ने 17 लोगों की जान ले ली जिसका जिम्मा खुद हिज्बुल मुजाहिद्दीन ने लिया. 26 जून 2017 को पाकिस्तान और चीन की कड़ी मशक्कत के बावजूद भारत को बड़ी कामयाबी तब मिली जब अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने उसे वैश्विक आतंकियों की सूची में डाल दिया.

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