यहां एक साथ रहते हैं 60 देशों के खास लोग, पढ़ें- फ्रांस से आकर पाांडिचेरी में किसने बनाया ऑरोविल

पांडिचेरी में मीरा अल्फांसा और उनके पति पॉल रिचर्ड ने श्रीअरविंद के साथ मिलकर आर्य नामक एक पत्रिका की शुरूआत भी की. साल 1920 में वह दोबारा पांडिचेरी आईं और हमेशा के लिए भारत में रहीं.
birth anniversary of the mother celebrated, यहां एक साथ रहते हैं 60 देशों के खास लोग, पढ़ें- फ्रांस से आकर पाांडिचेरी में किसने बनाया ऑरोविल

दक्षिण भारत में पांडिचेरी (पुदुचेरी) के पास बने ऑरोविल में इन दिनों 60 देशों के लोग एक साथ रहते हैं. वहां कई दुनिया भर के अपने क्षेत्रों में काफी सफल और मशहूर लोग भी आम जीवन जीते और खुश रहते हैं. वहां एक आध्यात्मिक सपना साकार होता हुआ दिखता है. मानवता को समर्पित इस स्वप्न को जमीन पर उतारने वाली श्रीमां का वास्तविक नाम मीरा अलफांसा था.

श्रीअरविंद आश्रम दिल्ली में बीते 21 फरवरी (शुक्रवार) को श्रीमां की 144वीं जयंती को समारोह की तरह मनाया गया. श्रद्धालुओं के बीच दर्शन दिवस के रूप में मशूहर इस मौके पर ध्यान, पाठ, परेड, मार्च और पेंटिंग प्रदर्शनी के अलावा कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन हुआ. कार्यक्रमों को दिल्ली आश्रम की प्रमुख तारा जौहर, विजय भारती, अपर्णा रॉय, प्रभजोत कुलकर्णी ने गाइड किया.

फ्रांस की राजधानी पेरिस में जन्म

फ्रांस की राजधानी पेरिस में जन्म लेने वाली श्री मां का जन्म 21 फरवरी 1878 को हुआ था. बैंकर मोरिस अल्फांसा और मतिल्डा के घर पर जन्म लेने वाली मीरा बचपन से ही गंभीर बनी रहती थी. इस दौरान जब उनसे सवाल पूछा जाता कि क्या तुम्हें सारी दुनिया की चिंता है? तो वो जवाब में कहती कि हां मुझे सारी दुनिया की चिंता है. श्रीमां को पेंटिंग के अलावा कला और संगीत में भी काफी रूचि थी.

स्वामी विवेकानंद से जाना भारतीय अध्यात्म

स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक राज योग का फ्रेंच अनुवाद पढ़ने के बाद उन्हें भारतीय अध्यात्म को जानने का मौका मिला. इसी कड़ी में 1910 में उनके पति पॉल रिचर्ड की श्रीअरविंद से पांडिचेरी में मुलाकात हुई. इस मुलाकात के बाद वापस लौटने पर पॉल रिचर्ड ने मीरा अल्फांसा को श्रीअरविंद के बारे में बताया. 29 मार्च 1914 को श्रीअरविंद से मीरा अल्फांसा की पहली मुलाकात हुई. तब से उन्होंने श्रीअरविंद को अपना गुरू भी मान लिया.

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पांडिचेरी में पत्रकारिता की शुरुआत

पांडिचेरी में इस दौरान मीरा अल्फांसा और उनके पति पॉल रिचर्ड ने श्रीअरविंद के साथ मिलकर आर्य नामक एक पत्रिका की शुरूआत भी की. साल 1920 में उनका पांडिचेरी में दोबारा आना हुआ. जिसके बाद उन्होंने हमेशा के लिए पांडिचेरी में रहकर श्रीअरविंद के आध्यात्मिक कार्य को विस्तार दिया. विदेश में जन्म लेने के बावजूद भारत की आध्यात्मिकता के लिए काम करने वालों में से इनका महत्वपूर्ण योगदान है. श्रीमां को भगिनी निवेदिता और एनी बेसेंट के साथ पवित्र बेलपत्र के तीन पत्तियों की तरह बताया जाता है.

मानवता को समर्पित ऑरोवील की स्थापना

श्रीमां का एक स्वप्न ऑरोवील के रुप में चरितार्थ हो रहा है. तमिलनाडु के विल्लापुरम जिले में स्थित इस बनते हुए शहर को दुनिया का सबसे बड़ा प्रायोगिक शहर भी बताया जाता है. श्री मां ने 1968 में इसकी स्थापना की थी. बताया जाता है कि ऑरोवील में दुनिया के लगभग 60 देशों के लोग अभी रहते हैं. ऑरोवील की स्थापना का मकसद एक ऐसी जगह की स्थापना की थी जहां किसी राष्ट्र, धर्म, सरकार या जाति नहीं बल्कि पूरी तरह से मानवता को समर्पित लोग साथ रहते हों.

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