जिसकी बंदूक से थर्राया अमेरिका उसने गांधी और भारतीय दर्शन को किया था नमन

जिसने अमेरिका से संघर्ष में जीवन बिता दिया और अंत में उनकी गोलियों का ही शिकार हुआ उसने भारतीय दर्शन और गांधी को नमन किया. जानिए उस शख्स के बारे में.

Che Guvera, जिसकी बंदूक से थर्राया अमेरिका उसने गांधी और भारतीय दर्शन को किया था नमन

बेतरतीब दाढ़ी, सितारे लगी टोपी, मुंह में सिगार और पांव में ऊंचे जूते.. ये आदमी कई पीढ़ियों के ज़हन में है. भले नाम तुरंत याद ना आए तो भी कोई नहीं कह सकता कि मैंने इस आदमी को नहीं देखा. किसी का अंदाज़ा है कि ये कोई पॉप स्टार है तो किसी ने इसे अमेरिकी हीरो बताया. अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिकी यूथ में आज खूब पसंद किया जाता है. टीशर्ट, जूते, हेलेमेट, लाइटर.. किसी भी चीज़ पर आप उसके चेहरे का दीदार कर सकते हैं. जाने-अनजाने कई पीढ़ियां उससे वाकिफ रही हैं. ये चे है.. अर्नेस्तो चे ग्वेरा.

Che Guvera, जिसकी बंदूक से थर्राया अमेरिका उसने गांधी और भारतीय दर्शन को किया था नमन
अपने साथियों संग मार्च करते चे ग्वेरा

अर्नेस्तो ‘चे’ ग्वेरा ने क्यूबा का ना होकर भी वहां हुई सशस्त्र क्रांति में अहम रोल निभाया था. फिदेल कास्त्रो ने सरकार बनाई तो दूसरे देशों से संबंध स्थापित करने का ज़िम्मा उन्हें ही सौंपा. भारत सरकार ने फिदेल सरकार को तुरंत मान्यता दी. जब नेहरू सरकार ने चे को विशेष आमंत्रण भेजा तो वो मिस्र होते हुए 30 जून 1959 को दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचे. पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत की ज़मीन पर उतरे चे किसी रॉकस्टार सरीखे दिख रहे थे. सुनहरे तारे वाली टोपी, मुंह में सिगार, ऊंचे जूते उनकी खास पहचान थे. चे की अगवानी उस दिन प्रोटोकॉल ऑफिसर डी एस खोसला ने की.अगले दिन 1 जुलाई 1959 को चे और नेहरू की मुलाकात हुई और उन्होंने साथ ही खाना खाया. खाने की मेज पर उनके साथ इंदिरा, राजीव और संजय भी थे.

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अपनी प्रेरणा पं नेहरू से मुलाकात करते चे
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पीएम नेहरू को सिगार का बॉक्स भेंट करता क्यूबाई प्रतिनिधिमंडल

खाने के बाद चे ओखला इंडस्ट्रियल एरिया में लकड़ी को आकार देनेवाली मशीनों के कारखाने में पहुंचे. शाम को उनकी मुलाकात वाणिज्यमंत्री नित्यानंद कानूनगो से हुई. अगले दिन चे और उनके साथी योजना आयोग और कृषि अनुसंधान परिषद गए.

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मशीनों के निरीक्षण में व्यस्त क्यूबाई दल

चे ने दिल्ली के पास पिलाना गांव भी देखा. वहां सामुदायिक परियोजनाओं का मुआयना किया. चे और उनके साथी सहकारिता मंत्री, खाद्य व कृषि मंत्री से मिले. कमाल ये है कि चे की इस दौरे की जानकारी उन्हें चाहनेवालों को भी नहीं है. लोगों को ये बात हैरान करती है कि वो कभी भारत आए थे.

यहां फाइल्स में उनका नाम अर्नेस्ट गेवारा दर्ज है. दिल्ली ही नहीं चे कलकत्ता भी गए और उसके अलावा कई और शहरों में भी. उनके इस दौरे की जानकारियां संजोने का काम किसी ने भी ठीक से नहीं किया. चे के संग्रह में वो तस्वीरें भी हैं जो उन्होंने कलकत्ता की सड़कों पर खींची. वो बंगाल के मुख्यमंत्री से भी मिले थे लेकिन ये बात फिर हैरान करती है कि वामपंथियों तक ने चे के दौरे पर कभी विस्तार से लिखना ज़रूरी नहीं समझा.

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चे ग्वेरा की भारतीय नेताओं से मुलाकात

खैर जब चे क्यूबा लौटे तो अपनी रिपोर्ट कास्त्रो को सौंपी. उसमें उन्होंने भारत के बारे में काफी कुछ लिखा है. सबसे अहम ये है कि खुद हथियार लेकर क्रांति करनेवाले चे ने गांधी के सत्याग्रह के प्रति आदर का भाव प्रकट किया. ओम थानवी के एक लेख के मुताबिक चे ने रिपोर्ट में लिखा- ‘‘जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद को आखिरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों से कर रहा था.’’
के पी भानुमति ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए उनका साक्षात्कार दिल्ली के अशोका होटल में लिया था जहां वो ठहरे थे. चे ने तब उनसे कहा था – आपके यहां गांधी हैं, दर्शन की एक पुरानी परंपरा है। हमारे लैटिन अमेरिका में दोनों नहीं हैं. इसलिए हमारी मन:स्थिति ही अलग ढंग से विकसित हुई है.’

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क्यूबा में यही सादा मकान मंत्री बनने के बाद चे ने मंज़ूर किया. फोटो मशहूर पत्रकार ओम थानवी ने खींची

कमाल देखिए कि चे ग्वेरा भारतीयों को युद्ध से दूर रहनेवाला मानते थे. उन्होंने रिपोर्ट में लिखा था – ‘भारत में युद्ध शब्‍द वहां के जनमानस की आत्‍मा से इतना दूर है कि वह स्‍वतंत्रता आंदोलन के तनावपूर्ण दौर में भी उसके मन पर नहीं छाया.’  शायद चे आज भारत का दौरा करते तो उनकी बहुत सी राय बदल जाती. चे का जन्म 14 जून 1928 को अ्रर्जेंटीना में हुआ था.  मानव को बंधन से आज़ाद कराने के लिए उन्होंने घर, पेशा और देश तक छोड़ दिए थे. आखिरकार अपने हिस्से की नौ गोलियां झेलकर वो मुक्त हो गए.

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