जानें, असम की अहोम आर्मी और मुगलों की लड़ाई का नागरिकता कानून से क्या है कनेक्शन ?

आइए, जानते हैं कि कौन थे लचित बड़फूकन, क्या थी अहोम सेना, कैसा था मुगलों के खिलाफ उनका सरायघाट युद्ध और क्यों उसे नागरिकता संशोधन बिल से जोड़ा जा रहा है.
battle of saraighati and Citizenship amendment bill, जानें, असम की अहोम आर्मी और मुगलों की लड़ाई का नागरिकता कानून से क्या है कनेक्शन ?

पहले नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस ( National register of citizens) और अब नागरिकता सुधार बिल (Citizenship amendment bill) को लेकर पूर्वोत्तर और खासकर असम में स्थानीय लोगों ने तेज विरोध किया है. तमाम प्रदर्शनों के बीच सोमवार को गौहाटी यूनिवर्सिटी के छात्रों ने खून से खत लिखकर सरायघाटी युद्ध और अहोम सेना की चर्चा की . उन्होंने कहा कि असम में मुगल हमलावरों के खिलाफ लड़े लचित बड़फूकन की सेना की तरह हम लड़ेंगे.

आइए, जानते हैं कि कौन थे लचित बड़फूकन, क्या थी अहोम सेना, कैसा था मुगलों के खिलाफ उनका सरायघाट युद्ध और क्यों उसे नागरिकता संशोधन बिल से जोड़ा जा रहा है.

लचित बड़फूकन

लचित बड़फूकन, लचित बोरफुकन, लचित बरफुकन, लाचित बरफूकन जैसे नामों से भी जाने वाले और पूर्वोत्तर के शिवाजी कहे जानेवाले शानदार सैनिक का मूल नाम चाउ लासित फुकनलुंग है. उनकी वीरता के बाद बड़फूकन सबसे अच्छे सैनिक की पदवी हो गई थी. औरंगजेब और मुगलों की सेना को उन्हें पूर्वोत्तर की सीमा से बाहर खडेड़ दिया था. मुगलों को हराने के लिए उन्होंने अपने मामा को मारने में भी हिचक नहीं दिखाई. अपनी संस्कृति और स्वाभिमान के लिए संघर्ष के लिए उनका उदाहरण दिया जाता है.

सेंग-लॉन्ग मोंग, चराइडो में 24 नवंबर 1622 को उनका जन्म हुआ था. उन्होंने मानविकी, शास्त्र और सैन्य कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी. हर साल 24 नवंबर को असम में वीर “लचित बड़फूकन” की बहादुरी का उत्सव मनाया जाता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि लचित के नाम पर ही नेशनल डिफेंस एकेडमी में बेस्ट कैडेट गोल्ड मेडल दिया जाता है.

ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट युद्ध (1671) पर मिली ऐतिहासिक विजय के लगभग एक साल बाद उसी युद्ध में काफी घायल होने और लगातार बीमार रहने के कारण ही लचित बड़फुकन का निधन हो गया. उनका पार्थिव शरीर जोरहाट से 16 किमी दूर हूलुंगपारा में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह की ओर से सन 1672 में निर्मित लचित स्मारक में रखा हुआ है.

अहोम सेना

आज के असम और उसके आसपास के क्षेत्र को ही इतिहास में अहोम या आहोम साम्राज्य कहा जाता था. साथ ही उनकी सेना को अहोम सेना (Ahom Army) कहा जाता था. अपनी वीरता के लिए यह सेना आज भी याद की जाती है. मुगल बादशाह औरंगजेब पूर्वोत्तर पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन कभी कर नहीं पाया. कुछ इतिहासकार भले ही इस पर अलग विचार रखते हैं. असम में औरंगजेब के मंसूबों को नाकाम करनेवाले राजा का नाम था चक्रध्वज सिंघा. लचित इनके ही सेनापति थे.

प्रसिद्ध सरायघाट युद्ध ( 1671)

अपनी महत्वकांक्षा के चलते औरंगज़ेब ने अहोम राज से लड़ने के लिए राजपूत राजा राजाराम सिंह के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी. औरंगज़ेब के साम्राज्य को विस्तार देने के लिए रामसिंह अपने साथ चार हजार महाकौशल लड़ाके, 30 हजार पैदल सेना, 21 राजपूत सेनापतियों का दल, 18 हजार घुड़सवार सैनिक, दो हजार धनुषधारी सैनिक और 40 पानी के जहाजों की विशाल सेना लेकर चल पड़ा.

मुगलों ने गौहाटी पर आक्रमण किया तो ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे उसका रास्ता रोक दिया गया. इस लड़ाई में अहोम राज्य के 10 हजार सैनिक मारे गए और लचित बड़फूकन बुरी तरह जख्मी होने से बीमार पड़ गये. अहोम सेना का बुरी तरह नुकसान हुआ. राम सिंह ने अहोम के राजा को आत्मसमर्पण ने लिए कहा. राजा चक्रध्वज ने ‘आखिरी जीवित अहोमी भी मुगल सेना से लड़ेगा’ कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया.

इसके बाद ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया. लचित बड़फुकन ने सीमित संसाधनों के होते हुए भी मुगल सेना को रौंद डाला. मुगल कमांडर मारे गए और उसकी सेना भाग खड़ी हुई. जिसका पीछा करके लचित बड़फुकन की सेना ने मुगल सेना को अहोम राज के सीमाओं से काफी दूर खदेड़ दिया. इस युद्ध के बाद कभी मुगल सेना की पूर्वोत्तर पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई. इसलिए ये क्षेत्र कभी गुलाम नहीं बन सका.

नागरिकता संशोधन बिल से कनेक्शन

नागरिकता संशोधन बिल और इससे पहले एनआरसी को लेकर कुछ स्थानीय संगठन विरोध कर रहे हैं. उन संगठनों का कहना है कि बाहरी लोगों की वजह से उनकी संस्कृति और आजीविका का खतरा है. लोगों को इसके विरोध के लिए वहां सबसे ज्यादा चर्चित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक किरदार को अपने हक में इस्तेमाल करते हैं. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का कहना है कि बिल पर उन्होंने पूर्वोत्तर के संगठनों और लोगों के साथ काफी बैठक और चर्चा की है.

ये भी पढ़ें –

जानिए, क्या है नेहरू-लियाकत समझौता जिसके विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिया था इस्तीफा

नागरिकता कानून पर AASU की 1980 दोहराने की धमकी, तब माहौल ठीक करने उतरे थे राजीव गांधी

Related Posts