जब लालू ने चुनाव आयुक्त शेषन को कहा था ‘भैंसिया पर चढ़ा करके गंगा जी में हेला देंगे’

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा रोकने के लिए चुनाव आयोग ने समय से 19 घंटे पहले प्रचार पर बैन लगा दिया. बिहार विधानसभा चुनाव में तो 4 बार तारीख रद्द कर दी गई थी.

पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण की वोटिंग से पहले जमकर हिंसा हुई. बीजेपी और टीएमसी आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं. चुनाव आयोग ने बड़ा फैसला लेते हुए गुरुवार की शाम से चुनाव प्रचार पर बैन लगा दिया है. कांग्रेस ने इस पर चुनाव आयोग की मुखर आलोचना की है. बताया कि ये पक्षपाती रवैया है, मोदी की रैली हो जाने के बाद बैन लगाने का कोई मतलब नहीं है.

ये बंगाल है जहां 19 घंटे पहले प्रचार बैन हुआ. 90 के दशक में बिहार के साथ इससे भी बुरा हुआ था. वहां विधानसभा चुनाव इतनी बार स्थगित हुए, इतने ज्यादा समय तक चले कि चुनाव अधिकारियों से लेकर उम्मीदवार और वोटर सब थक गए. उस पूरे घटनाक्रम को संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘ब्रदर्स बिहारी’ में समेटा है.

1995 के विधानसभा चुनावों की अधिसूचना 8 दिसंबर 1994 को जारी कर दी गई थी. टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उनके सामने बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराने की बड़ी चुनौती थी. फर्जी वोटिंग, बूथ कैप्चरिंग और हिंसा, ये सब बिहार चुनाव का स्थाई भाव बन चुके थे. 1984 के लोकसभा चुनाव में 24 और 1989 में 40 लोग मारे गए थे. 1985 विधानसभा चुनाव में 63 और 1990 में 87 लोग मारे गए थे. टीएन शेषन ने ठान लिया था कि इस स्थिति को बदलना है.

साफ सुथरे चुनाव कराने के लिए टीएन शेषन ने पूरी जान लगा दी. राज्य से पैरामिलिट्री फोर्सेज की 650 टुकड़ियों को सुरक्षा में लगाया. चार चरणों में चुनाव कराने का निर्णय किया. सीधा धमकीनुमा आदेश जारी कर दिया कि आचार संहिता उल्लंघन के जरा भी संकेत मिले तो पूरा चुनाव रद्द कर दिया जाएगा. ऐसा हुआ भी. चार बार चुनाव रद्द किया गया. तीन महीनों तक ये चुनाव चला और जनता से लेकर नेता तक सब व्याकुल हो गए. 28 मार्च 1995 को ये चुनाव संपन्न हुए. कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन भी लगाना पड़ा.

चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी थी. इसीलिए टीएन शेषन के निशाने पर लालू और लालू के निशाने पर शेषन थे. अपनी रैलियों और भाषणों में लालू प्रसाद यादव ने शेषन के लिए कड़ी भाषा का प्रयोग किया. एक बार तो ये भी कह दिया कि ‘भैंसिया पर चढ़ा करके गंगा जी में हेला देंगे.’

लालू भले ऊपरी मन से शेषन को कोसते रहते थे लेकिन इस पूरी कसरत का सबसे ज्यादा फायदा उन्हें ही मिला. भारी बहुमत से उनकी पार्टी जीती. उन्हें इस बात का पहले से अहसास था कि जीत उनकी ही होने वाली है. क्योंकि इस थका देने वाले चुनाव में उम्मीदवार पहले ही घर बैठ गए थे. जबकि लालू यादव प्रदेश के सुदूर इलाकों में प्रचार कर रहे थे. इन्हीं सब वजहों से चार बार टलने के बाद भी जीत लालू की ही हुई.

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