मिलिए इस महिला राजनेता से जो अकेले दम पर लड़ रही है मोदी की ‘डिजिटल जासूसी’ से

नयी दिल्ली। सोशल मीडिया के जामने में आप हम सब खुली किताब बन चुके हैं. जाने-अनजाने में हम अपनी निजी जानकारी को सार्वजनिक कर देते है. इतना ही नहीं सोशल मीडिया में सेंधमारी कर ये राजनीतिक दल अपनी सियासी रोटियां भी खूब अच्छे से सेंकने लगे हैं. ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि संयुक्त […]

नयी दिल्ली।

सोशल मीडिया के जामने में आप हम सब खुली किताब बन चुके हैं. जाने-अनजाने में हम अपनी निजी जानकारी को सार्वजनिक कर देते है. इतना ही नहीं सोशल मीडिया में सेंधमारी कर ये राजनीतिक दल अपनी सियासी रोटियां भी खूब अच्छे से सेंकने लगे हैं. ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका में भी देखने को मिला था. हालांकि अब एक महिला राजनेता ने इससे लड़ने का फैसला लिया है. वो महिला राजनेता पूरे देश को इस जंजाल से निजात दिलाना चाहती हैं. पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की एक राजनीतिज्ञ महुआ मोइत्रा इसके खिलाफ लड़ रही हैं. मोइत्रा पं बंगाल की करीमपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं. ऑनलाइन मीडिया  रिपोर्ट के अनुसार, मोइत्रा ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने इसके लिए तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं हैं.

पहली याचिका यूआईडीएआई से जुड़ा हुआ है, याचिका में आरोप है कि आधार प्राधिकरण सोशल मीडिया की निगरानी करना चाहता है. यूआईडीएआई सोशल मीडिया प्लेटफार्मों जैसे ट्विटर,फेसबुक,यूट्यूब,इंस्टाग्राम,यूट्यूब आदि पर आधार से संबंधित गतिविधियों की निगरानी के लिए एक एजेंसी की सेवाएं ले रहा है. दूसरी याचिका गृह मंत्रालय के हालिया फैसले के खिलाफ है कि जिसमें तकरीबन 10 एजेंसियों को ​कंप्यूटरों की निगरानी करने की शक्ति देती हैं और तीसरी याचिका उन्होंने पश्चिम बंगाल में सरकार को कंप्यूटर बाधित करने से रोकने के लिए भी मामला दायर की है.

 

कैसे शुरु हुई ये लड़ाई

42 वर्षीय मोइत्रा पिछले साल छुट्टी पर थीं. उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्रालय के नोटिस के बारे में पता चला. उसमें लिखा था कि वे निजी एजेंसियों से प्रस्ताव लेकर सोशल मीडिया खातों की निगरानी में मदद करती हैं. मोइत्रा ने बताया “जिस तरह से उन्होंने ऐसा किया वह बहुत ही बुरा था!”. अगस्त में, मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर की. इसके कुछ ही महीने बाद भारत के अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि वे सोशल मीडिया खातों की निगरानी के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रस्ताव को वापस ले रहे हैं. फिलहाल ये मुद्दा देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है.

अब इस मुद्दे को आसान भाषा में समझे हैं

भारत मोबाइल फोन और इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला अग्रणी देश है. 13 जुलाई 2017 को एक ऑनलाइन रिपोर्ट में सामने आया था कि भारत विश्व में नंबर एक देश है जहां सबसे ज्यादा फेसबुक यूजर्स हैं. इसका आंकड़ा भी पेश किया गया. भारत में लगभग 25 करोड़ यूजर्स है जबकि अमेरिका में लगभग 24 करोड़. इससे साफ होता है कि यहां सोशल मीडिया किस तरह पैर पसार रहा है.  राजनीतिक पार्टियां यही से आपका डेटा चोरी कर लेती हैं. ध्यान होगा आपको जब आप फेसबुक की प्रोफाइल बनाते हैं तो आपसे पूछा जाता है कि आप को कौन सी पॉलिटिकल पार्टी पसंद है. आप वहां अपनी पसंदीदा पार्टी भर देते है. ये डाटा किसी कंपनी के मार्फत निकलवा लिया जाता है. ऐसे ही आप जब अपने स्मार्ट फोन पर कोई भी ऐप डाउनलोड करते हैं तो वहां लॉग इन या साइनअप करने को बोलता है वहां भी आपको अपनी निजी जानकारी भरनी पड़ती है. वहीं जानकारी ये राजनीतिक पार्टियां किसी थर्ड पार्टी से निकलवा लेती है और फिर अपने सोशल मीडिया कैंपन में इसका सहारा लेती है.

अमेरिकी चुनावों में हुआ था जिक्र

आपको ध्यान होगा पिछले वर्ष अमेरिका में एक बड़े अखबार ने खुलासा किया था कि डाटा विश्लेषण करने वाली फर्म कैंब्रिज एनाल्यटिका  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ट ट्रंप के 2016 चुनाव प्रचार में समर्थन तकनीक तैयार करने के लिए पांच करोड़ यूजरों की निजी जानकारी चुराई थी. इसके बाद अमेरिका की राजनीति में भूचाल आ गया था. फेसबुक ने आरोपों को माना था और फेसबुक पर मुकदमा भी दर्ज किया गया था. ऐसा ही आरोप 2012 में बराक ओबामा के ऊपर भी लगे थे.

मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद 

फिलहाल मोइत्रा इस लड़ाई में अकेले ही दम भर रही हैं. उनको विश्वास है कि देश की सर्वोच्च अदालत इसमें ऐतिहासिक फैसला सुनाएगी. इस काम के लिए मोइत्रा अपना ही पैसा खर्च कर रही है. पूरी कानूनी कार्रवाई वो और उनके वकील देख रहे हैं. उनका कहना है कि ये एक ऐसी लड़ाई है जो आंदोलनों से नहीं लड़ी जा सकती, इसका हल कानून से ही संभव है. आगे वो कहती हैं कि इसके जरिए न तो मैं चुनाव जीतना चाहती हूं न हि अपना नाम कमाना.