कुंभ की भगदड़ और नेहरू: मोदी ने जो कहा 1954 में जो हुआ, उसकी पूरी सच्चाई

1954 के कुंभ की भगदड़ एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है. मोदी के एक बयान ने नेहरू और उस कुंभ की याद ताज़ा कर दी. जानते हैं उस घटना से जुड़े कई पहलू.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर ऐसा बयान दे डाला कि पत्रकारों से लेकर इतिहासकारों तक को किताबों और अखबारों की पुरानी कतरनें खंगालनी पड़ गईं.

कौशांबी की जनसभा में विपक्ष पर बरसते मोदी ने देश के पहले प्रधानमंत्री को लपेटे में ले लिया. उन्होंने आरोप लगाया कि- पंडित नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, ये कुंभ के मेले में आए थे. मैं जो आज बता रहा हूं उस खबर को पांच- पांच छह-छह दशक से दबा दिया गया है. छिपाया गया है. इतना ही नहीं असंवेदनशीलता की सीमा पार की गई. पंडित नेहरू आए थे तब मेला इतना बड़ा नहीं होता था. पंचायत से संसद तक कांग्रेस की सरकार थी. नेहरू जब आए अव्यवस्था के कारण यहां भगदड़ मच गई थी. हजारों लोग मारे गए थे. कुचलकर मारे गए थे लेकिन सरकार की इज्जत बचाने के लिए, पंडित नेहरू पर कोई दोष-दाग ना मढ़ जाए इसलिए उस समय के मीडिया ने ये चीज़ें दिखाने की बहादुरी नहीं दिखाईं. एक- दो अखबारों के कोने में खबर छपी उसे भी दबा दिया गया.

अब कई लोगों के मन में प्रश्न जन्मा कि क्या वाकई ऐसे भीषण हादसे की खबर को सरकार और मीडिया ने मिलकर दबा दिया था?

दरअसल 1954 का कुंभ आज़ादी के बाद संपन्न हो रहा पहला कुंभ था. ज़ाहिर है, अंग्रेज़ जा चुके थे तो व्यवस्था बनाए रखने का ज़िम्मा यूपी सरकार का ही था. उस समय यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत थे. राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री नेहरू भी कुंभ में पहुंचे थे. नेहरू ने तो मेला व्यवस्था का जायज़ा भी कई दफे लिया. फिर 3 फरवरी 1954 का दुर्भाग्यपूर्ण दिन आया. करीब 800 लोगों को प्रशासनिक लापरवाही ने लील लिया. कहा गया कि आंकड़ा इससे ज़्यादा ही था. चश्मदीद और मीडिया रिपोर्ट्स हादसे की अलग अलग वजहें बताती हैं. The Kumbh Mela in Allahabad from 1776-1954 नाम की किताब में कामा मैकलीन बताती हैं कि कुछ तीर्थयात्री गंगा किनारे बैठकर निकल पेशवाई जुलूस देख रहे थे. भीड़ बढ़ने लगी. लोगों के पास आने-जाने की जगह नहीं थी. नतीजतन कुछ लोग नागा साधुओं की चली आ रही भीड़ में ही मजबूरन घुस गए. कुछ उग्र साधुओं ने उन्हें त्रिशूलों से मारा तो भगदड़ शुरू हो गई.

पीएम मोदी ने कहा कि सरकार की इज्जत बचाने और नेहरू पर दोष-दाग ना लगे इसलिए मीडिया ने खबर दबा दी लेकिन जो प्रमाण मिलते हैं वो उनकी इस बात को खारिज करते हैं.

पहला जवाब तो कोई और नहीं खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू देते हैं. नेहरू: मिथक और सत्य नाम की चर्चित किताब के लेखक पीयूष बबेले ने अपनी फेसबुक वॉल पर नेहरू वांग्मय खंड 25 से संसद की कार्यवाही का ब्यौरा चस्पां किया है. इसमें नेहरू का भाषण लिखा है. नेहरू भगदड़ की घटना का ज़िक्र कर रहे हैं. वो सदन में मृतकों के प्रति संवेदना जता रहे हैं. सांसदों को मुद्दा उठाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. वो खुद घटना से संबंधित कई बातों को अखबारों में पढ़े जाने की बात बोल रहे हैं.
ध्यान देने लायक बात है कि जब कई अहम बातें खुद नेहरू अखबारों से पढ़ रहे हैं तो कैसे कहा जा सकता है कि तत्कालीन मीडिया ने खबर को दबा दिया?

एक और बात जोड़ते चलें कि नेहरू अपने भाषण में हादसे पर गठित एक जांच समिति के बारे में विस्तार से बता रहे हैं. वो उसकी निष्पक्षता को लेकर भी पक्ष रख रहे हैं. ऐसे में ये तो नहीं कहा जा सकता कि सरकार घटना को दबा रही थी क्योंकि संसद में मुद्दा उठ जाए तो फिर घटना दबी कैसे रह गई? और जिस मुद्दे पर पीएम को सफाई देनी पड़ी हो तो अखबार उसे रिपोर्ट करेंगे ही.

इसी सिलसिले में पत्रकार अभय अवस्थी, जिनके पिता हादसे के चश्मदीद थे, बीबीसी को बताते हैं कि – अख़बारों में इस घटना की बहुत दिन तक चर्चा होती रही. उस समय मुख्य रूप से लीडर, भारत, अमृत बाज़ार पत्रिका और आज अख़बार होते थे और इन सभी जगहों पर काफ़ी दिनों तक ख़बरें छपती रहीं. अख़बारों में ये बात प्रमुखता से लिखी गई कि वीआईपी का ध्यान तो रखा गया लेकिन आम श्रद्धालुओं का ध्यान नहीं रखा गया.

ज़ाहिर है, जिस घटना की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति बनी हो और उसे संसद में उठाया गया हो वो दबी कैसे रह सकती है? जिस घटना के कुछ अहम बिंदु खुद प्रधानमंत्री को अखबार से ही पता चले हों उसे दबाने का आरोप प्रेस पर कैसे सही साबित हो सकता है?

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