नागरिकता कानून पर AASU की 1980 दोहराने की धमकी, तब माहौल ठीक करने उतरे थे राजीव गांधी

नागरिकता सुधार विधेयक ( citizenship amendment bill ) को लेकर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (All Assam students union) की ओर से 1980 के हालात की वापसी की धमकी से स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है.

Rajiv Gandhi in history about assam accord, नागरिकता कानून पर AASU की 1980 दोहराने की धमकी, तब माहौल ठीक करने उतरे थे राजीव गांधी

नागरिकता सुधार विधेयक ( citizenship amendment bill ) को लेकर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (All Assam students union) की ओर से 1980 के हालात की वापसी की धमकी से स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है. 1980 के दशक में असम के बिगड़ते हालात को ठीक करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को सामने आना पड़ा था.

आसू से जुड़े छात्रों ने मंगलवार को असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के घर का घेराव करने के दौरान यह धमकी दी थी. उस समय सोनोवाल घर में ही थे, विरोध को देखते हुए उनको अपने घर से हेलीकॉप्टर से बाहर निकलना पड़ा. आसू का कहना है कि यह बिल असम अकोर्ड ( Assam Accord) के अनुसार संविधान के सेक्यूलर चरित्र का हनन करता है. इसके पहले आसू ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of citizens) को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी.

क्या है स्थानीय नागरिकों की शिकायत

देश के आजाद होने के तुरंत बाद 1950 के दशक से ही बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनैतिक मुद्दा बनने लगा था. ब्रिटिश काल में चायबागानों में काम करने के लिए बड़ी तादाद में मजदूर बिहार और बंगाल से असम पहुंचे. आजादी के साथ मिले विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम में बड़ी संख्या में बंगाली लोग आये. तब से वहां स्थानीय बनाम बाहरी की चिंगारी सुलगती रही.

साल 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान मुसलमान बंगालियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना ने हिंसक कार्रवाई की. उससे बचने के लिए सरहद पार से लगभग 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली. इनमें से अधिकतर लौट गए, लेकिन लगभग एक लाख बांग्लादेशी असम में ही रह गए.

1980 के दशक में क्या थे हालात

साल 1971 में बांग्लादेश के बाद भी वहां के लोग असम आते रहे. इससे स्थानीय लोगों के मन में संसाधनों को लेकर असुरक्षा बढ़ी. वहीं आबादी में हो रहे बदलावों से स्थानी भाषा, सांस्कृति और राजनीति को लेकर खतरे की आहटों ने 1978 के एक शक्तिशाली आन्दोलन को पैदा किया. इसका नेतृत्व युवाओं और छात्रों ने किया. इसी बीच ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असमगण संग्राम परिषद ने विधानसभा चुनाव कराने से पहले विदेशी घुसपैठियों की समस्या का हल निकालने की मांग की.

बांग्लादेशियों को वापस भेजने के साथ ही साल 1961 के बाद असम में आए लोगों को वापस भेजे जाने या दूसरी बसाने की मांग ने भी जोर पकड़ ली. आंदोलन के उग्र होने से राजनीतिक माहौल अस्थिर हो गया. असम की बड़ी आबादी ने इन्हीं मांगो के साथ 1983 के विधान सभा चुनाव में मतदान का बहिष्कार किया. इसके साथ ही पूरे असम में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. 1984 के आम चुनावों में राज्य के 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव ही नहीं हो पाए.

क्या है असम समझौता, 1985

साल 1983 के हिंसा के बाद समझौते के लिए बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई. आखिरकार 15 अगस्त 1985 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ. इसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है.

समझौते के तहत साल 1951 से 1961 के बीच असम आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फैसला हुआ. 1971 के बाद असम में आये लोगों को वापस भेजने पर सहमति बनी. 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को नागरिकता और दूसरे अधिकार दिए गए लेकिन उन्हें वोट का अधिकार नहीं दिया गया.

असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गई. वहां ऑयल रिफाइनरी और पेपर मिल सहित कई तकनीकी संस्थान स्थापित करने का फैसला किया गया. केंद्र सरकार ने यह भी फैसला किया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए जाएंगे.

कैसे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा एनआरसी का मामला

असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया. विधान सभा को भंग करके 1985 में चुनाव कराये गए. इसमें नवगठित असम गणपरिषद को बहुमत मिला और आसू अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत मुख्यमंत्री बनाए गए. समझौते के बाद शांति बहाली तो हुई, लेकिन यह असल में लागू नहीं हो पाया. इस बीच बोड़ोलैंड आंदोलन (Bodoland movement) उभरा. साथ ही उल्फा (United Liberation Front of Assam) ने हिंसक आंदोलन शुरू कर दिया.

साल 2005 में एक बार फिर असम में आंदोलन तेज हो गया. राज्य में कांग्रेस सरकार ने दबाव में आकर काम शुरू किया लेकिन कार्रवाई बेहद सुस्त रही. इस बीच पूर्वी बंगाल के मूल लोगों को संदिग्ध वोटर होने के आरोप में प्रताड़ित किये जाने की खबरें आती रही. इनमें बंगाली हिंदू और मुसलमान दोनों ही शामिल हैं. आखिरकार 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

नागरिकता सुधार विधेयक ( सीएबी ) पर क्यों है नाराजगी

सिटीजनशिप अमेंडमेंट बिल में 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है. इसी को लेकर असम में कई छात्र संगठनों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक पार्टियों की ओर से इसका विरोध किया जा रहा है.

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