आंध्र में पहली बार नहीं है विधान परिषद को खत्म करने की कोशिश, पढे़ं- क्यों भिड़े जगन मोहन और नायडू

वाईएसआर कांग्रेस ने कहा कि वे एकमत से इस फैसले पर पहुंचे हैं कि विधान परिषद भंग होकर ही रहेगा. इसमें चाहे जो वक्त लग जाए.

आंध्र प्रदेश में विधान मंडल के उच्च सदन यानी विधान परिषद को खत्म करने को लेकर राजनीति चरम पर है. प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस पार्टी विधान परिषद को खत्म करने के प्रस्ताव के साथ है. वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और टीडीपी प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू इसके विरोध में हैं. आंध्र प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव को लेकर बीते एक सप्ताह से इन दोनों बड़े नेताओं के बीच रस्साकशी बढ़ गई है.

कब – क्या हुआ ?

सोमवार 27 जनवरी – सबसे ताजा घटनाक्रम में आंध्र प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में विधान परिषद खत्म करने का प्रस्ताव फिर से पास हो गया. मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने प्रस्ताव पेश किया. प्रस्ताव के पक्ष में 133 वोट पड़े. इसके बाद सदन को स्थगित कर दिया गया. विपक्ष के नेता चंद्रबाबू नायडू और उनकी पार्टी टीडीपी के विधायकों ने विधानसभा सत्र के बहिष्कार का फैसला किया.

रविवार 26 जनवरी – एन. चंद्रबाबू नायडू ने अपने विधायकों की बैठक में तय किया कि टीडीपी के 21 विधायक विधानसभा के विशेष सत्र का बहिष्कार करेंगे. इससे पहले सुबह हुई आंध्र प्रदेश कैबिनेट की बैठक में विधान परिषद खत्म करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई.

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विधान परिषद खत्म करने को लेकर मुख्यमंत्री की दलील

मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने विधानसभा के विशेष सत्र में प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि अगर संविधान बनाने वाली सभा को लगा होता कि विधान परिषद जरूरी है, तो सभी राज्यों के लिए इसे वैधानिक बनाया गया होता, लेकिन अनुच्छेद 169 के अनुसार विधान परिषद को भंग करने का अधिकार विधानसभा को दिया गया. जब साक्षरता बहुत कम थी, तो बुद्धिजीवियों और शिक्षाविदों को परिषद में नामित करने का प्रावधान किया गया था. आज हालात बदल गए हैं.

उन्होंने कहा कि तब हम सबके सामने एक महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ विधान परिषद का भविष्य नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का भी था. इसके अलावा, यह एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के उचित कामकाज का भी सवाल था. संविधान के अनुच्छेद 164-2 के अनुसार, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाला मंत्रिमंडल सीधे विधानसभा के लिए जवाबदेह होता है. क्योंकि उसे सीधे वोटर चुनते हैं.

विधान परिषद को क्यों खत्म करना चाहते हैं जगन मोहन

बताया जा रहा है कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस पार्ट के नेता जगनमोहन रेड्डी विधान परिषद को खत्म करने पर अडिग हैं. क्योंकि उनकी महात्वाकांक्षी परियोजना को विधान परिषद में मुंह की खानी पड़ी है. जगन आंध्र प्रदेश में पांच उप मुख्यमंत्री के बाद अब प्रदेश की तीन राजधनियां बनाना चाहते हैं. विधानसभा में 20 जनवरी को इससे जुड़ा प्रस्ताव बहुमत से पास भी हो गया, लेकिन विधान परिषद ने इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया.

इसके चलते जगन मोहन की परियोजना अटक गई. बाद में वाईएसआर कांग्रेस ने कहा कि वे एकमत से इस फैसले पर पहुंचे हैं कि विधान परिषद भंग होकर ही रहेगा. इसमें चाहे जो वक्त लग जाए.

चंद्रबाबू और उनकी पार्टी ने इसे आंध्र के लिए काला दिन बताते हुए फैसले का विरोध किया. उन्होंने कहा कि तीन राजधानी होने से आंध्र का कोई फायदा नहीं होने वाला है. उनके विधायकों ने सदन के बाहर विधेयक के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां दी.

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क्या है विधान परिषद की मौजूदा हालत

आंध्र प्रदेश विधान परिषद में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी को बहुमत हासिल है. यहां पर टीडीपी के 27 विधायक और वाईएसआर कांग्रेस के मात्र 9 विधायक हैं. सदस्यों की कुल संख्या 58 है. दूसरी ओर विधानसभा में वाईएसआर कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीतकर सरकार चला रही है.

पहले कब हुई विधान परिषद हटाने की कोशिश

साल 1958 में 1 जुलाई को आंध्र प्रदेश विधान परिषद का गठन किया गया है. साल 1983 में भी विधान परिषद को रद्द की पहल की गई थी. तब टीडीपी के संस्थापक रामोजीराव ने उसका समर्थन किया था. उस बार भी राजनीति की वजह से ही यह प्रस्ताव अपने मंजिल तक नहीं पहुंच सकी थी.

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