‘मां आनंद शीला’ ने कर दिया था US सरकार की नाक में दम, जानिए क्यों प्रियंका चोपड़ा को भेजा नोटिस

शीला की लाइफ पर बेस्ड एक फिल्म आने वाली थी जिसमें प्रियंका चोपड़ा उनका किरदार निभाने वाली थीं, लेकिन 23 दिसंबर को शीला ने प्रियंका चोपड़ा को कानूनी नोटिस भेज दिया.
life journey of Ma Anand Sheela, ‘मां आनंद शीला’ ने कर दिया था US सरकार की नाक में दम, जानिए क्यों प्रियंका चोपड़ा को भेजा नोटिस

80 के दशक के विवादित गुरु ओशो के सबसे नजदीक रही शीला की लाइफ पर बेस्ड एक फिल्म आने वाली थी जिसमें प्रियंका चोपड़ा उनका किरदार निभाने वाली थीं. लेकिन 23 दिसंबर को शीला ने प्रियंका चोपड़ा को कानूनी नोटिस भेजा और उन्हें अपना किरदार निभाने से रोक दिया. उन्होंने कहा कि प्रियंका में वो बात नहीं जो मेरे व्यक्तित्व में थी. बेहतर होगा कि आलिया भट्ट यह रोल करें.

दशकों तक विवादों का दामन थाम चुकी शीला ने एक बार फिर विवाद को हवा दी है. लोग उनके बहाने एक बार फिर ओशो के रहस्यमयी साम्राज्य को खोजने में लग चुके हैं. वड़ोदरा के एक साधारण से पटेल परिवार में जन्म लेने वाली शीला अंबालाल पटेल कैसे ओशो की करीबी मां आनंद शीला बन गईं, आइए जानते हैं.

अमेरिका में पढ़ाई और आश्रम निर्माण

वड़ोदरा से निकलकर 18 साल की उम्र में शीला पढ़ाई करने अमेरिका चली गईं. वहीं पर शादी की और 1972 में पति के साथ वापस भारत आ गई. आध्यात्मिक अध्ययन की तलाश में दोनों ओशो के आश्रम में पहुंचे और उनके शिष्य बन गए. शीला बताती हैं कि जब वह पहली बार भगवान रजनीश(ओशो) से मिलीं तो उन्होंने उनके सिर पर हाथ रखा. शीला को लगा कि उनकी जिंदगी का मकसद पूरा हो गया.

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इसी बीच शीला के पति का देहांत हो गया और वे ओशो के और करीब आ गईं. 1981 में शीला रजनीश की निजी सचिव बन गईं. सचिव बनने के बाद शीला ने ओशो को इस बात के लिए मनाया कि भारत से वह अपना आश्रम अमेरिका में शिफ्ट कर लें. शीला की सलाह पर अमेरिका के ओरेगन प्रांत में 64 हजार एकड़ की वीरान जमीन पर भव्य आश्रम ‘रजनीशपुरम’ बसाया गया.

वाइल्ड वाइल्ड कंट्री में आश्रम बनने की रोमांचक यात्रा दिखाई गई है. शीला बताती हैं कि पूरे आश्रम का संचालन उनके जिम्मे था, ओशो उसमें कोई दखल नहीं देते थे. फिर एक समय ऐसा आया जब आश्रम में बढ़ते संन्यासियों की वजह से अमेरिकी सरकार के माथे पर बल पड़ने शुरू हो गए.

साजिश के आरोप और गिरफ्तारी

कहते हैं कि शीला के अंदर महत्वाकांक्षा चरम पर थी और वे आश्रम को पूर्णतया अपने प्रभाव में लेना चाहती थीं. सरकार ने आरोप लगाया कि वे 1984 के वास्को काउंटी चुनाव में दो सीटों पर कब्जा करना चाहती थीं इसलिए आश्रम के प्रभाव से वहां बाहरी लोगों को बसाया गया.

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शीला पर आरोप लगा कि स्थानीय लोगों को वहां से भगाने के लिए पेड़-पौधों पर जहरीले बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया. लोग बहुत बीमार पड़ गए और वोट करने नहीं जा सके. इतना ही नहीं, शीला पर चुनाव में हेराफेरी के इरादे से हत्याएं कराने के आरोप भी लगे. कहा गया कि ये सब शीला ने वोट परसेंटेज अपने पक्ष में करने के लिए किया.

इस बीच ओशो से उनके रिश्ते बेहद खराब हो चले थे और ओशो ने उन पर खुलेआम गंभीर आरोप लगाए थे. लगातार दबाव के बाद 1985 में शीला को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर मुकदमा चलाया गया और कोर्ट ने उन्हें 20 साल जेल की सजा सुनाई. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में शीला बताती हैं कि उन्हें अच्छे व्यवहार की वजह से 39 महीने में ही छोड़ दिया गया.

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दूसरी जिंदगी

जेल से रिहा होने के बाद शीला ने ओशो आश्रम में मिले एक स्विस नागरिक से शादी कर ली, कुछ समय बाद उस पति की भी मौत हो गई. फिलहाल शीला स्विटजरलैंड में रहती हैं और वहां बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए दो नर्सिंग केयर होम चलाती हैं. शीला बताती हैं कि उन्हें अपनी जिंदगी को लेकर कोई पछतावा नहीं है, वे खुद को विनर के रूप में देखती हैं.

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