विजय दिवसः कहानी 16 दिसंबर की, जब भारतीय सेना के सामने सिर झुकाकर खड़ा था पाकिस्तान

वो ऐतिहासिक दिन जब भारत ने पाकिस्तान को दो हिस्सों में बांट दिया था.

आज से ठीक 48 साल पहले दो देशों के बीच हुई सबसे बड़ी जंग के बाद दुनिया को बांग्लादेश नाम का नया देश मिला था. 16 दिसंबर 1971 आखिर क्यों बांग्लादेश ही नहीं, भारत और पाकिस्तान के लिए भी खास दिन है, आइए जानते हैं.

3 दिसंबर 1971 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दिल्ली से बाहर थीं. उन्हें पाकिस्तानी जंगी जहाज़ों के भारत पर हमले की ख़बर दी गई. इंदिरा गांधी उसी दिन दिल्ली लौटीं. उन्होंने सेना के अफसरों और कैबिनेट के नेताओं के साथ रात के 11 बजे एक मीटिंग की और उसके बाद आधी रात को पाकिस्तान को सबक सिखाने का ऐलान कर दिया.

भारतीय नौसेना की तरफ से 4 दिसंबर को ऑपरेशन ट्राईडेंट शुरू कर दिया गया. पाकिस्तानी नौसेना भारत के मुकाबले बेहद कमजोर थी. जंग के लिए तैयारी भी कुछ खास नहीं थी. जिसे ध्यान में रखकर 4 दिसंबर 1971 की रात में भारत की नौसेना ने कराची में हमला बोल दिया.

नौसेना के उस ऑपरेशन का नाम त्रिशूल था. जिसके शुरू होते ही कराची बंदरगाह पर कोहराम मच गया. कुछ ही देर में भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के शाहजहां, खायबर, और PNS मुहाफिज युद्धपोतों को समंदर में दफ्न कर दिया. ऑपरेशन त्रिशूल में 720 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. पाकिस्तान का ईंधन भण्डार और कई जहाज बर्बाद हो गए.

ऑपरेशन पायथन

ऑपरेशन त्रिशूल के बाद 8 दिसंबर को भारतीय नौसेना ने अरब सागर में एक और ऑपरेशन लॉन्च किया. इसका कोडनेम पायथन था. उधर बंगाल की खाड़ी में आईएनएस विक्रांत ने जंग का मोर्चा संभाला. जहां से उड़े सी-हॉक लड़ाकू विमानों ने चटगांव और कॉक्स बाज़ार को धुआं-धुआं कर दिया.

INS विक्रांत से उड़े जंगी जहाजों के बेड़ों ने पाकिस्तानी नौ सेना के परखच्चे उड़ा दिए थे. समंदर में लड़ाई के महज चार दिनों में भारत की जीत तय हो गई थी. लेकिन तभी अमेरिका ने युद्ध में हस्तक्षेप किया. पाकिस्तान की मदद के लिए अमेरिका ने सातवां जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया. ये सबसे शक्तिशाली नौसेना बेड़ा था.

भारत को मिला रूस का साथ

इधर भारत की मदद के लिए रूस आगे आ गया. रूस ने प्रशांत महासागर में तैनात अपने जंगी बेड़े को हिन्द महासागर में भेज दिया. न्यूक्लियर पनडुब्बी और जहाजों से लैस जंगी बेडे ने अमेरिका को सोचने पर मजबूर कर दिया. भारत की सेना ने पाकिस्तान को हर मोर्चे पर पीछे हटने को मजबूर किया.

भारतीय सेना की पूर्वी कमान लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के हाथों में थी. जिनकी अगुवाई में भारत के सूरमाओं ने पाकिस्तानी सिपाहियों के होश फाक्ता कर दिए. पाकिस्तान इस भ्रम में था कि भारत-बांग्लादेश के बीच आने वाली नदियां उसकी मददगार है. इनके पार जाना सेना के लिए मुश्किल था. लेकिन जवानों के साहस के आगे नदियों ने सिर झुका दिया.

भारत की सेना के बांग्लादेश में कदम पड़ते ही पाकिस्तानी सेना के हौसले पस्त हो गए. तब पाकिस्तानी सेना ने निर्दोष जनता को मारना शुरू कर दिया. पाकिस्तान सेना ने रजाकरों, अल शम्स और अल बद्र की मदद से ढाका में बड़ा नरसंहार किया. ढाका में सामूहिक कब्रों की खदान बना दी गई. ढाका यूनिवर्सिटी में छात्रों और आम लोगों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया. जहां पाकिस्तानी सेना का विरोध हुआ लोगों को गोलियों से भून दिया गया.

पाकिस्तान पर आखिरी चोट

भारत की सेना के ढाका पहुंचने के बाद पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू हो गया. 14 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना ने एक ऐसी जगह को निशाना बनाया जिसकी पाकिस्तान को उम्मीद नहीं थी. ढाका में पाकिस्तान के गवर्नर के घर पर भारतीय सेना ने हमला कर दिया.

इस हमले के बाद पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी पस्त हो गया. उसने युद्ध विराम का प्रस्ताव भेजा. लेकिन भारतीय सेना के जनरल सैम मानेक शॉ ने जवाब दिया कि युद्ध विराम सिर्फ सरेंडर की शर्त पर होगा.

शर्म से सिर झुकाए, घुटनों के बल एक दो नहीं 93 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक खड़े थे. भारतीय जवान उनके हथियारों जब्त कर रहे थे. पाकिस्तानी सैनिक जमीन में सिर गाड़े ताकते रहे. भारतीय सेना की पूर्वी कमान के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने पाकिस्तानी सेना का जनरल नियाजी ने शाम को ठीक 4 बजकर 16 मिनट पर आत्मसमर्पण का हस्ताक्षर किया. जिसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश की आजादी का ऐलान कर दिया.

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