इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस ने भेजी पीएम को चिट्ठी, लिखा- चाय की दावत में हो जाता है जजों का चयन

हाईकोर्ट के जस्टिस रंगनाथ पांडे ने पीएम मोदी को एक खत भेजा है जिसमें न्यायापालिका में होनेवाली नियुक्तियों पर सवाल खड़े किए गए हैं. इस खत के सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर कॉलेजियम सिस्टम का विवाद लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है.

जजों की नियुक्ति फिर से विवादों में है. इस बार इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रंगनाथ पांडेय की ओर से मामले को छेड़ा गया. उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को बाकायदा चिट्ठी लिखकर अपनी व्यथा दर्ज की. जस्टिस पांडेय की चिट्ठी का लब्बोलुआब था कि जजों की नियुक्तियां का निश्चित मापदंड नहीं है. चयन की प्रचलित कसौटी बस परिवारवाद और जातिवाद हो गया है.

उन्होंने विस्तार से अपनी पूरी बात लिखी है. आगे उन्होंने लिखा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों का चयन बंद कमरों में चाय की दावत पर किया जाता है जिसका मुख्य आधार जजों की पैरवी और उनका पसंदीदा होना ही है. पिछले दिनों माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीशों का विवाद बंद कमरों से सार्वजनिक होने का प्रकरण हो, हितों के टकराव का विषय हो, अथवा सुनने की बजाय चुनने के अधिकार का विषय हो, न्यायपालिका की गुणवत्ता और अक्षुण्णता लगातार संकट में पड़ने की स्थिति रहती है. आपके स्वयं के प्रकरण में री-ट्रायल का आदेश सभी के लिए अचंभित करने जैसा रहा.

court, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस ने भेजी पीएम को चिट्ठी, लिखा- चाय की दावत में हो जाता है जजों का चयन

जस्टिस पांडेय ने पीएम मोदी को लिखे पत्र में न्यायपालिका की गरिमा फिर से बहाल करने की मांग की है. वो लिखते हैं कि- आपसे अनुरोध करता हूं कि उपरोक्त विषय को विचार करते हुए आवश्यकता अनुसार न्याय संगत तथा कठोर निर्णल लेकर न्यायपालिका की गरिमा पुनर्स्थापित करने का प्रयास करेंगे. जिससे किसी दिन हम यह सुनकर संतुष्ट होंगे कि एक साधारण पृष्ठभूमि से आया हुआ व्यक्ति अपनी योग्यता परिश्रम और निष्ठा के कारण भारत का मुख्य न्यायाधीश बन पाया.

दरअसल अभी देश में न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए जो कॉलेजियम काम करता है उस पर विवाद चल रहा है. पहले जान लीजिए कि

कॉलेजियम सिस्टम क्या है और काम कैसे करता है
कॉलेजियम सिस्टम का भारतीय संविधान में प्रावधान नहीं है. 28 अक्टूबर 1983 को 3 जजों के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से ये प्रभाव में आया. तय हुआ कि कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों का एक पैनल होगा. ये मिलकर जजों की नियुक्ति और तबादलों की सिफारिश करेंगे जिसे सरकार मानेगी. कॉलेजियम के हाथों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति, प्रमोशन और तबादले होते हैं.

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कॉलेजियम वकीलों या जजों के नाम की सिफारिश केंद्र को भेजता है. कुछ नाम केंद्र भी कॉलेजियम को भेजता है. कॉलेजियम से आए नामों की जांच और आपत्तियों की छानबीन केंद्र की ओर से होती है जिसके बाद एक बार फिर नाम कॉलेजियम के सुपुर्द किए जाते हैं. अब कॉलेजियम भी केंद्र के सुझाए नामों पर विचार करता है, साथ ही अपने द्वारा भेजे गए नामों पर जताई गई केंद्र की आपत्ति पर विचार करता है. अब फाइल केंद्र को भेजी जाती है. अगर कोई नाम दो बार केंद्र को भेजा गया है तो उसे स्वीकृति देनी होती है. इस तरह कॉलेजियम का वर्चस्व कायम रहता है.

विवादों में क्यों घिरा कॉलेजियम विवाद?
एनडीए सरकार ने 15 अगस्त 2014 को कॉलेजियम सिस्टम की जगह NJAC (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) का गठन किया था. सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को इसे असंवैधानिक करार दे दिया.

NJAC का गठन 6 सदस्यों की सहायता से किया जाना था जिसका प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को बनाया जाना था. इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2 वरिष्ठ जजों, कानून मंत्री और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं 2 जानी-मानी हस्तियों को सदस्य के रूप में शामिल करने की बात थी.

NJAC में जिन 2 हस्तियों को शामिल किए जाने की बात कही गई थी उनका चयन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता या विपक्ष का नेता नहीं होने की स्थिति में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता वाली कमिटी करती. इसी पर सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा आपत्ति थी.