अमित शाह ने राज्यसभा से सुनाई टीएमसी-शिवसेना को खरी-खरी, पूछा ठाकरे ने क्यों बदला रंग?

अमित शाह ने सवाल किया कि ‘जब इंदिरा जी ने 1971 में बांग्लादेश के शरणार्थियों को स्वीकारा, तब श्रीलंका के शरणार्थियों को क्यों नहीं स्वीकारा?’

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  • Publish Date - 7:59 pm, Wed, 11 December 19

अमित शाह ने कहा, “ये बिल कभी न लाना पड़ता, ये कभी संसद में न आता, अगर भारत का बंटवारा न हुआ होता. बंटवारे के बाद जो परिस्थितियां आईं, उनके समाधान के लिए मैं ये बिल आज लाया हूं. पिछली सरकारें समाधान लाईं होती तो भी ये बिल न लाना होता.”

उन्होंने कहा कि ‘नेहरू-लियाकत समझौते के तहत दोनों पक्षों ने स्वीकृति दी कि अल्पसंख्यक समाज के लोगों को बहुसंख्यकों की तरह समानता दी जाएगी. उनके व्यवसाय, अभिव्यक्ति और पूजा करने की आजादी भी सुनिश्चित की जाएगी, ये वादा अल्पसंख्यकों के साथ किया गया. लेकिन वहां लोगों को चुनाव लड़ने से भी रोका गया, उनकी संख्या लगातार कम होती रही.’

शाह ने कहा, “शिवसेना ने कल लोकसभा में इस बिल का समर्थन किया था. महाराष्ट्र की जनता जानना चाहती है कि रात में ही ऐसे क्या हुआ कि उन्होंने आज अपना स्टैंड बदल दिया?”


गृहमंत्री ने कहा, “राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, चीफ जस्टिस जैसे कई उच्च पदों पर अल्पसंख्यक रहे. यहां अल्पसंख्यकों का संरक्षण हुआ. मैं पहली बार नागरिकता के अंदर संशोधन लेकर नहीं आया हूं, कई बार हुआ है.”

अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का जिक्र करते हुए कहा कि बांग्लादेशी घुसपैठ का जिक्र ममता बनर्जी ने 2005 में किया था. उनके इस बयान के बाद टीएमसी के सासंदों ने हंगामा किया. शाह ने कहा कि मैंने ममता बनर्जी के लिए अपशब्द नहीं किया. उन्होंने जो कहा था कि वो मैंने कहा. मैंने सदन को गुमराह नहीं किया.

गृहमंत्री ने कहा कि दो साथी संसद को डरा रहे हैं कि संसद के दायरे में सुप्रीम कोर्ट आ जाएगी. कोर्ट ओपन है. कोई भी व्यक्ति कोर्ट में जा सकता है. हमें इससे डरना नहीं चाहिए. हमारा काम अपने विवेक से कानून बनाना है, जो हमने किया है और ये कानून कोर्ट में भी सही पाया जाएगा.’

उन्होंने सवाल किया कि जब श्रीलंका के लोगों को नागरिकता दी तो उस समय बांग्लादेशियों को क्यों नहीं दी? जब युगांड़ा से लोगों को नागरिकता दी तो बांग्लादेश और पाकिस्तान के लोगों को क्यों नहीं दी?

अमित शाह ने कहा, “जब इंदिरा जी ने 1971 में बांग्लादेश के शरणार्थियों को स्वीकारा, तब श्रीलंका के शरणार्थियों को क्यों नहीं स्वीकारा. समस्याओं को उचित समय पर ही सुलझाया जाता है. इसे राजनीतिक रंग नहीं देना चाहिए.”


शाह ने कहा, “कांग्रेस पार्टी अजीब प्रकार की पार्टी है. सत्ता में होती है तो अलग-अलग भूमिका में अलग-अलग सिद्धांत होते हैं. हम तो 1950 से कहते हैं कि अनुच्छेद 370 नहीं होना चाहिए. कपिल सिब्बल साहब कह रहे थे कि मुसलमान हमसे डरते हैं, हम तो नहीं कहते कि डरना चाहिए. डर होना ही नहीं चाहिए.”

उन्होंने कहा कि ‘डॉ मनमोहन सिंह ने भी पहले इसी सदन में कहा था कि वहां के अल्पसंख्यकों को बांग्लादेश जैसे देशों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. अलग उनको हालात मजबूर करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि उन अभागे लोगों को नागरिकता दी जाए.’

उन्होंने कहा कि इतिहास तय करेगा कि 70 साल से लोगों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया था. इसको न्याय नरेन्द्र मोदी जी ने दिया, इतिहास इसको स्वर्ण अक्षरों से लिखेगा. लाखों-करोड़ों लोग नर्क की यातना में जी रहे थे. क्योंकि वोट बैंक के लालच के अंदर आंखे अंधी हुई थी, कान बहरे हुए थे, उनकी चीखें नहीं सुनाई पड़ती थी.

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