बीजेपी के 11वें राष्ट्रीय अध्यक्ष बने जगत प्रकाश नड्डा, सामने रहेंगी ये 10 बड़ी चुनौतियां

जगत प्रकाश नड्डा मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्री भी रहे हैं. इसके अलावा वह पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी ईकाई यानी संसदीय बोर्ड के सदस्य भी रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी (BJP) में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जगह नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जगत प्रकाश नड्डा ने सोमवार को कमान संभाल ली है. बीते आठ महीने से पार्टी में बतौर कार्यकारी अध्यक्ष काम देख रहे नड्डा इस पद पर निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं. अध्यक्ष पद पर नड्डा की ताजपोशी के साथ ही पार्टी की उनसे उम्मीदें बढ़ गई हैं.

बीजेपी के 11वें अध्यक्ष पद के लिए जगत प्रकाश नड्डा लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पसंद बताए जाते रहे हैं. छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करनेवाले नड्डा इस पद के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पसंद भी माने जाते हैं. बीजेपी में ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की परंपरा के मुताबिक अमित शाह के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद ही नड्डा का नाम आगे किया गया था.

संघ से नजदीकी, स्वच्छ छवि और संगठन में दशकों का लगातार अनुभव हिमाचल से आने वाले नड्डा की खासियत है. बीजेपी में आम सहमति से और बिना किसी मुकाबले के अध्यक्ष चुने जाने की परंपरा रही है. बीजेपी अध्यक्ष बनने के साथ ही जगत प्रकाश नड्डा के सामने कई बड़े चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. आइए, हम जानते हैं कि नड्डा के लिए 10 सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हो सकती है?

1. अमित शाह की सफलता को जारी रखना

सबसे पहले तो नड्डा को जिस चुनौती से जूझना होगा वह है पूर्व अध्यक्ष अमित शाह की सफलता का दर. शाह की छवि और उनकी लगातार सफलता से नड्डा की तुलना बहुत स्वाभाविक तौर पर होगी. अमित शाह का कार्यकाल बीजेपी के लिए काफी सुनहरा माना जाता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में नड्डा राजनीतिक रूप से बेहद अहम राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान के प्रभारी थे. अध्यक्ष बनने से पहले अमित शाह साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां के प्रभारी थे. अमित शाह ने जहां 80 में 71 सीटों पर पार्टी को जीत दिलाई थी, वहीं नड्डा के समय 62 सीटों पर पार्टी ने जीत हासिल की. तुलना यहीं से शुरू हो जाती है.

अमित शाह ने अपने कार्यकाल में बीजेपी को जिस मुकाम पर पहुंचाया उसे बनाए रखना अगले अध्यक्ष के लिए चुनौती भरा रहेगा. जगत प्रकाश नड्डा मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्री भी रहे हैं. इसके अलावा वह पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी ईकाई यानी संसदीय बोर्ड के सदस्य भी रहे हैं.

2. सबसे पहले दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव

बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश को सबसे पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणामों से जोड़कर देखा जाएगा. दिल्ली में 08 फरवरी को मतदान और 11 फरवरी को मतगणना होनेवाली है. इसके कुछ ही महीनों के बाद बिहार जैसे अहम राज्य में विधानसभा का चुनाव होनेवाला है. इन दोनों ही राज्यों में पार्टी को बड़ी जीत दिलाने की जिम्मेदारी और चुनौती दोनों उनके कंधे पर रहेगी. दिल्ली में लंबे समय से पार्टी सत्ता से बाहर है, वहीं बिहार में गठबंधन के जरिए वह सरकार में शामिल है.

दिल्ली में इस समय आम आदमी पार्टी (आप) सत्ता में है. पिछले विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल करते हुए आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल दूसरी बार सत्ता पर काबिज हुए थे. साल 2014 और 2019 दोनों ही बार लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सभी सातों की सातों सीट पर कब्जा जमा लिया था. नए अध्यक्ष के लिए यह तय करना होगा कि 2015 विधानसभा चुनाव जैसी हालत 2020 में न बने. चुनाव पूर्व सर्वे में साफ बताया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को चुनौती देना आसान नहीं होगा.

3. बिहार में गठबंधन की राजनीति

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन में कथित राजनीतिक ठगी की शिकार बीजेपी को बिहार में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के साथ सत्ता पर काबिज गठबंधन को बनाए रखने की चुनौती है. नड्डा के सामने लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को मिली जोरदार जीत को विधानसभा चुनाव में दोहराने की चुनौती भी होगी. तीन तलाक बिल पर नीतीश के अलग रुख और नए नागरिकता कानून और एनआरसी को लेकर जेडीयू से आ रही अलग-अलग आवाजों को साधने और सीटों के बंटवारे को सम्मानजनक तरीके से अंजाम देने में भी नड्डा के राजनीतिक हुनर की परख होगी.

एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू और एलजेपी ने पड़ोसी राज्य झारखंड में अलग चुनाव लड़ा था और बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई. इसके बाद बिहार में इन दोनों सहयोगियों को साथ रखना और सत्ता में दोबारा आना बड़ा टास्क होगा. बिहार में कई मोर्चों पर नीतीश सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. वहीं दोनों दलों के नेताओं के एक-दूसरे के खिलाफ बयानों पर अमित शाह ने लगाम लगाने की कोशिश की है. साल 2015 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और इस महागठबंधन ने जीत हासिल की थी. बाद में नीतीश ने लालू प्रसाद यादव की आरजेडी के नाता तोड़ लिया और बीजेपी के साथ फिर से नई सरकार बना ली.

Giriraj Singh Nitish Kumar

4. दक्षिण के राज्यों के लिए नई प्रभावी रणनीति

बीजेपी के नए अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के सामने दक्षिण भारत के राज्यों में सीटें जीतने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी. कर्नाटक में भले ही बीजेपी की सत्ता में वापसी हो गई हो, लेकिन लेकिन तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में बीजेपी की स्थिति काफी खराब रही है. आंध्र और तमिलनाडु विधानसभा में बीजेपी को एक भी सीट नहीं मिली है. वहीं केरल में बीजेपी के हाथ में एक सीट है. तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव 2021 में होने वाले हैं. इन राज्यों में जीत के लिए बीजेपी को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा. कर्नाटक में बेलगाम विवाद हो या केरल में शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा नड्डा के सामने बीजेपी की रणनीति को प्रभावशाली तरीके से सामने लाने की चुनौती होगी.

5. पश्चिम बंगाल में जीत और पूर्वोत्तर राज्यों में वापसी

बीजेपी के नए अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी से जीतने की होगी. इसके अलावा नागरिकता कानून को लेकर असम में बदलते राजनीतिक समीकरण को भी साधना होगा. साल 2021 में पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव होने वाला है. असम में बीजेपी के ही सर्वानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सुधरती हालत से काफी उम्मीदें है.

6. बड़बोले नेताओं पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी

अध्यक्ष बनने वाले जगत प्रकाश नड्डा के सामने एक बड़ी चुनौती अपने कई बड़बोले नेताओं पर लगाम लगाने की भी होगी. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और साक्षी महाराज जैसे कुछ नेता अक्सर अपने बयानों को लेकर पार्टी की जवाबदेही बढ़ाते रहते हैं. वहीं विपक्ष ऐसे बयानों पर पार्टी को लगातार घेरता रहता है. इन नेताओं के बयानों से विपक्ष के बिखरे हुए दलों को भी एक साथ आने और बीजेपी के साथ मोदी सरकार पर हमला बोलने का मौका मिल जाता है. ऐसे गैरजरूरी विवादों से बचने के लिए अपने नेताओं की बयानबाजी को संयमित करना भी नड्डा के लिए बड़ी चुनौती होगी.

7. कार्यकर्ताओं में जान फूंकने वाले नए राष्ट्रीय मुद्दों की तलाश

पार्टी की शुरुआत के समय से ही मैनिफेस्टो में शामिल श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण, जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाना और समान नागरिक संहिता लागू करना जैसे तीन बड़े मुद्दों में दो का समादान बीजेपी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पूरा हो चुका है. वहीं तीसरे मुद्दे पर तुरंत और एक साथ तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित करने के साथ कदम बढ़ाया जा चुका है. अब बीजेपी को विकास के नारे के अलावा नए मुद्दे तलाशने की जरूरत होगी जो उसके देशभर के कार्यकर्ताओं में जान फूंक सके. इसके अलावा जनसंख्या नियंत्रण कानून जैसे संवेदनशील मुद्दे पर संभलकर आगे बढ़ने की चुनौती भी सामने होगी. क्योंकि नागरिकता कानून और एनआरसी को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन जारी है.

8. संघ और उससे जुड़े संगठनों से बेहतर तालमेल

बीजेपी के मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े समान विचार के संगठनों के बीच बेहतर तालमेल भी नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने बड़ी चुनौती साबित होगी. बीते दिनों मानव संसाधन मंत्रालय के साथ एबीवीपी का संघर्ष हो या तस्करों के साथ गौरक्षकों की लड़ाई की घटना को लेकर बढ़ा तनाव बीजेपी को संभालने में काफी मेहनत करनी पड़ी. जातीय झड़पों को लेकर बढ़ी सियासत हो या अल्पसंख्यकों की तरफ से भीड़ की हिंसा का आरोप, संघ के संगठनों के साथ सरकार को काफी संभलकर आगे बढ़ना पड़ा. इसके अलावा किसानों का आंदोलन हो या भाषा को लेकर सामने आई चुनौती संघ से जुड़े संगठनों ने सरकार और बीजेपी की कार्यशैली पर सवाल उठाए. बीजेपी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को ऐसे ढेर सारे जरूरी मुद्दों पर संघ और उससे जुड़े संगठनों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर चलना होगा.

9. नेतृत्व के लिए पार्टी में नई पंक्ति तैयार करना

बीजेपी में हमेशा मौजूदा नेतृत्व को नई पंक्ति तैयार करने की चुनौती से जूझना होता है. इस सिलसिले में मोदी सरकार और अध्यक्ष अमित शाह पर वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी का आरोप भी लगता रहा है. इस परिस्थिति में जगत प्रकाश नड्डा को बहुत बारीकी से आगे बढ़ना होगा. बीजेपी के संविधान के मुताबिक लगातार दोबारा अध्यक्ष बना जा सकता है. इसके लिए इन सब चुनौतियों से पार पाना होगा. वहीं सदस्यों के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी को सक्षम नेताओं की नई पंक्ति से लैस करने की जिम्मेदारी भी नड्डा को निभानी पड़ेगी. इसके साथ ही बौद्धिक मोर्चे पर अध्यक्ष को पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं की संख्या और उनकी गतिविधियां बढ़ानी होगी.

10. जम्मू-कश्मीर और लेह-लद्दाख के चुनाव

सबसे आखिर में, लेकिन बीजेपी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के सामने सबसे अहम चुनौती पेश करनेवाली बात होगी जम्मू कश्मीर में विधानसभा और लेह-लद्दाख में निकाय चुनाव में सफलता हासिल करने की जंग. जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने और दो नए केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के साथ ही यह कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में विधानसबा कायम रहेगी और लेह-लद्दाख में निकाय के चुनाव होंगे. राष्ट्रपति शासन हटने, हालात सामान्य होने और जम्मू-कश्मीर में नए सिरे से परिसीमन करवाए जाने के बाद वहां चुनाव होने तय हैं. इसके लिए समय-सीमा भी नड्डा के बीजेपी अध्यक्ष रहते ही पूरा हो जाएगा. इन चुनावों में पार्टी का परफॉर्मेंस काफी निर्णायक साबित होगा. इसलिए इन दोनों नए केंद्र शासित प्रदेशों पर फोकस करना नड्डा के लिए सबसे अहम चुनौती साबित हो सकती है.

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