‘कश्‍मीर में इंटरनेट चला तो बॉर्डर पार से आएगी फेक न्‍यूज की बाढ़’, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा

ये याचिकाएं कश्मीर घाटी में आवाजाही पर रोक और इंटरनेट पर प्रतिबंध सहित विभिन्न मुद्दों से संबंधित हैं.

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर दूसरी संविधान पीठ ने मंगलवार को सुनवाई की. मुख्य मामले पर संविधान पीठ 14 नवंबर को सुनवाई करेगी. 370 हटने के बाद सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट 16 अक्टूबर को सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दो भागों में बांट दिया है.

कश्मीर के हालात को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा कि वहां दिन में हालात सामान्‍य हैं. नागरिकों के दिन में आने-जाने पर कोई रोक नहीं है. केंद्र ने कोर्ट को भरोसा दिलाते हुए कहा कि वह दो हफ्ते में इस पर हलफनामा भी दाखिल करेगा.

केंद्र ने घाटी में इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर रोक लगाने का बचाव किया. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसा देशभर में फेक न्‍यूज फैलने से रोकने के लिए किया गया है. उन्‍होंने कहा, “अगर कश्‍मीर में इंटरनेट बहाल किया जाता है तो देश में सीमापार से फेक न्‍यूज की बाढ़ जा जाएगी.”

केंद्र और जम्मू कश्मीर ने जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते मांगे. अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में कहा कि दस याचिकाओं पर एक-एक कर जवाब देना है. सुप्रीम कोर्ट 14 नवंबर को अगली सुनवाई करेगा. तब तक सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करना है. पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ का नेतृत्व न्यायमूर्ति एनवी रमन्‍ना कर रहे हैं. ये याचिकाएं कश्मीर घाटी में आवाजाही पर रोक और इंटरनेट पर प्रतिबंध सहित विभिन्न मुद्दों से संबंधित हैं.

आर्टिकल 370: याचिकाओं में क्‍या की गई है मांग

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता सीताराम येचुरी, बाल अधिकार कार्यकर्ता एनाक्षी गांगुली, कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन, डॉ. समीर कौल और मलेशिया के एनआरआई कारोबारी की पत्नी आसिफा मुबीन की ओर से याचिकाएं दायर की गई हैं.

आजाद की याचिका में उनके रिश्तेदारों से मिलने और उनका हालचाल लेने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया है, जबकि येचुरी ने अपनी पार्टी के सहयोगी और माकपा नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी की नजरबंदी को चुनौती दी है. बाल अधिकार कार्यकर्ता गांगुली और प्रोफेसर शांता सिन्हा द्वारा दायर याचिका में जम्मू-कश्मीर में बच्चों की नजरबंदी से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं.

इसके साथ ही मुबीन अहमद शाह की पत्नी आसिफा मुबीन ने जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट-1978 की धारा 8 (1) (ए) के तहत सात अगस्त को नजरबंदी के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की है. इसमें कहा गया है कि उनके पति फिलहाल आगरा सेंट्रल जेल में बंद हैं और उन्हें उनकी स्वतंत्रता से गलत तरीके से वंचित किया गया है.

समीर कौल ने जम्मू-कश्मीर के अस्पतालों में इंटरनेट सुविधाओं की बहाली के लिए याचिका दायर की है, जबकि पत्रकार भसीन ने घाटी में मीडिया की आवाजाही की अनुमति मांगी है. इसके साथ ही तारिगामी द्वारा दायर ताजा याचिकाओं को भी टैग किया गया है. इन याचिकाओं में राज्य का विभाजन करते हुए इन्हें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फैसले को भी चुनौती दी गई है.

ये भी पढ़ें

किस डर की वजह से कश्मीर मामले को यूएन लेकर गए थे नेहरू?

कश्‍मीर में हालात शांतिपूर्ण, 24 अक्टूबर को होंगे ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल के चुनाव