Arun Jaitley थे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ‘ऑरिजनल चाणक्य’… ऐसा था BJP के संकटमोचक का तिलिस्म

अरुण जेटली (Arun Jaitley Death Anniversary) अटल-आडवाणी के दौर से लेकर नरेंद्र मोदी तक के युग में सार्थक बने रहे. पार्टी के संकटमोचक, कार्यकर्ताओं का ख्याल रखनेवाले, शानदार वक्ता, आर्थिक क्षेत्र में कई एतिहासिक कदम उठानेवाले के तौर पर देश उन्हें हमेशा याद रखेगा.
Arun Jaitley Death Anniversary, Arun Jaitley थे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ‘ऑरिजनल चाणक्य’… ऐसा था BJP के संकटमोचक का तिलिस्म

वह सिर्फ मेरे पापा नहीं थे, बल्कि भारत के बेटे थे…अरुण जेटली (Arun Jaitley) के लिए कही गई उनकी बेटी सोनाली जेटली की यह बात कई मायनों में सच है. अरुण जेटली जो पिछले साल दुनिया छोड़कर गए ((Arun Jaitley Death Anniversary) वह अटल-आडवाणी के दौर से लेकर नरेंद्र मोदी तक के युग में सार्थक बने रहे. पार्टी के संकटमोचक, कार्यकर्ताओं का ख्याल रखनेवाले, शानदार वक्ता, आर्थिक क्षेत्र में कई एतिहासिक कदम उठानेवाले के तौर पर देश उन्हें हमेशा याद रखेगा.

वाजपेयी से मोदी तक, सभी के भरोसेमंद

28 दिसंबर 1952 को जेटली (Arun Jaitley) का जन्म हुआ था. फिर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कॉमर्स और फिर लॉ की पढ़ाई की. छात्र राजनीति से अपना करियर शुरू करनेवाले अरुण जेटली बीजेपी में अटल-आडवाणी के दौर से लेकर नरेंद्र तक के युग में बड़ा नाम बने रहे. पार्टी के लिए उनका विकल्प खोजना अभी भी बड़ी चुनौती है.

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चुनाव नहीं जीते, फिर भी भरोसमंद

यह दिलचस्‍प है कि वह कभी कोई लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में नहीं पहुंचे, लेकिन सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की रही हो या नरेंद्र मोदी की, वह हमेशा प्रधानमंत्री के भरोसेमंद मंत्रियों में रहे.

पार्टी के संकटमोचक, कानूनी मामलों के मददगार

बीजेपी के कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के किसी दिग्‍गज तक से बात कर लीजिए. सब मानते थे कि अरुण जेटली पार्टी के संकटमोचक हैं. उनके पास मानों हर समस्‍या का समाधान था और हर मुद्दे की पूरी जानकारी.

नरेंद्र मोदी के ‘ऑरिजनल चाणक्य’, नीतीश को वापस लाए

नरेंद्र मोदी के भी अरुण जेटली खास रहे. कुछ लोग तो उन्हें नरेंद्र मोदी का सारथी तक कहते थे, कि कृष्ण की तरह उन्होंने ही मोदी को राह दिखाई. कहा जाता है कि 2014 में जेटली ने ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार बनाने के लिए राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान को राजी किया था. इससे पहले 2002 के गुजरात दंगों को लेकर मोदी को जब भी कानूनी पचड़े में उलझे, जेटली ने हाथ बढ़ाकर उनकी मदद की. उन्हें मोदी और अमित शाह दोनों का ‘ऑरिजनल चाणक्य’ तक कहा गया क्योंकि गुजरात दंगों के दौरान जेटली दोनों के ही मददगार बने.

प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने में भी अरुण जेटली माहिर थे. नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी की राह भी अरुण जेटली ने ही दूर की थी.

एक चर्चा के लिए खरीद डाली थीं 35 हजार की किताबें

अरुण जेटली संसद या किसी भी मंच पर अच्छे वक्ता थे. लेकिन यह मुकाम उन्होंने यूं ही हासिल नहीं किया था. बहस, चर्चा के लिए वह काफी पढ़ते भी थे. बात 18 अगस्त, 2011 की है. उस समय संसद का सत्र चल रहा था. राज्यसभा में एक बेहद जरूरी मुद्दे पर चर्चा होने वाली थी. ये मसला कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन से जुड़ा हुआ था. उनपर महाभियोग की कार्रवाई चलाने के लिए सदन में बहस होने वाली थी. इस बहस में शामिल होने के लिए जब अरुण जेटली संसद पहुंचे तो उनके पास ढेर सारी किताबें थी, जिसे देखकर वहां मौजूद पत्रकार प्रश्न पूछे बिना रह नहीं सके. इसके बाद जेटली ने पत्रकारों को बताया कि उन्होंने ये किताबें 35 हजार रुपये में जस्टिस सौमित्र सेन से जुड़े मामले में बहस की तैयारी के लिए खरीदी हैं.

फैसले जिनके लिए याद किए जाते रहेंगे जेटली

कामकाज के दौरान अरुण जेटली ने कई ऐसे सुधार किए जिनके लिए उन्हें याद किया जाता रहेगा. इसमें जीएसटी और आईबीसी जैसे बड़े सुधार, घाटे से जूझ रहे बैंकों में कंसोलिडेशन, एफडीआई के नियमों को आसान बनाना, बजट पेश करने की तारीख में बदलाव, रेल बजट को आम बजट में जोड़ना, ब्लैकमनी और बेनामी प्रॉपर्टी कानून लाना, बैंकों में एनपीए कम करने में सफलता, जनधन योजना, डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम आदि इसमें शामिल हैं.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता अरुण जेटली का 24 अगस्त को ही पिछले साल 2019 में निधन हो गया था.

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