बीजेपी के मास्टर स्ट्रेटेजिस्ट रहे अरुण शौरी आज सरकार के मास्टर स्पॉइलर कैसे बन गए?

किसी वक्त बीजेपी को तर्क मुहैया कराने वाले अरुण शौरी आज अपने तर्कों से उसे सुप्रीम कोर्ट में घेर रहे हैं. पार्टी के रणनीतिकार की भूमिका से आज करप्शन के क्रूसेडर की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे शौरी की दिलचस्प यात्रा.

राफेल इस मुल्क में सिर्फ विमान का ही नहीं बल्कि एक राजनैतिक मुद्दे का नाम बन चुका है. वो विपक्ष का हथियार तो है ही लेकिन मोदी विरोधियों का भी फेवरेट सब्जेक्ट है. मोदी सरकार खुद को राफेल पर पाक साफ दिखाने की भरसक कोशिश करती रही मगर सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही लीक हुए गोपनीय कागज़ातों पर गौर करने की बात मानी वैसे ही बनता हुआ माहौल बिगड़ता दिखा.
विजयी याचिकाकर्ताओं की तिकड़ी में वो अरुण शौरी भी थे जिनकी कलम से निकले तथ्य कभी भाजपा को विरोधियों पर टूट पड़ने का आधार देते थे. आज वही कलम भाजपा के मुंह पर कालिख पोतने पर आमादा है. ये तो वक्त बताएगा कि शौरी इस लड़ाई में अपनी पुरानी पार्टी को पराजित करते हैं या फिर खुद ही धराशायी होते हैं लेकिन आज आपको बताते हैं कि आखिर अरुण शौरी भाजपा के मास्टर स्ट्रेटेजिस्ट से मास्टर स्पॉइलर तक कैसे पहुंचे.

पत्रकारिता के वक्त से ही बीजेपी समर्थक होने के लक्षण
दरअसल बीजेपी के साथ जुड़ने से पहले ही नब्बे के दशक के पूर्वार्ध में ही शौरी पर बीजेपी समर्थक होने के आरोप लगने लगे थे. तवलीन सिंह ने एक साक्षात्कार में उनसे सवाल भी किया था लेकिन शौरी उसे टैगिंग का खेल बताकर निकल गए. भविष्य में वो उसी पार्टी से जुड़ गए जिसके साथ ना होने का दावा करते रहे. वो मंडल आयोग के विरोधी थे और उस पर बाकायदा सीरीज़ में लेख लिखते रहे. इसके अलावा बाबरी विध्वंस पर भी उनके विचार बीजेपी की राजनीति के मुफीद पड़ते थे. उन्होंने  The World of Fatwas or the Sharia in Action, Hinduism: Essence and Consequence, Missionaries in India लिखकर हिंदू दक्षिणपंथ को अपने चातुर्य से प्रभावित कर रखा था.

राजनीति में जाने से कई साल पहले ही वो राज्यसभा में जाने की मंशा जताते रहे थे. आखिरकार वाजपेयी ने उनके मन की बात सुन ली. 1998-2004 और 2004-2010 में वो राज्यसभा पहुंचे. इतना ही नहीं वाजपेयी तो शौरी की बुद्धिमानी से इतने प्रभावित थे कि अपनी सरकार में विनिवेश और सूचना प्रसारण मंत्री तक बना दिया. सब कुछ सही था लेकिन शायद शौरी नेता बनकर भी पत्रकारिता भूले नहीं थे. उन्होंने अपने से पहले टेलीकॉम मंत्री रहे प्रमोद महाजन पर एक टेलीकॉम कंपनी को गलत ढंग से फायदा पहुंचाने का आरोप लगा दिया. सभी को पता था कि महाजन वाजपेयी के बेहद करीबी और पसंदीदा थे.
बावजूद इसके शौरी बीजेपी में बने रहे. हालांकि बीजेपी नेतृत्व की तब्दीली के दौर में उनका प्रभाव भी कम होता गया. आडवाणी के पृष्ठभूमि में जाते-जाते उनका असर पार्टी से खत्म ही हो गया.

बीजेपी से अरुण शौरी की धीमे-धीमे विदाई
पार्टी से उनके असर के खत्म होने के पीछे एक बड़ा कारण ये भी था कि बुद्धिजीवी तबके में अपनी बात रखने के लिए तत्कालीन बीजेपी को अरुण शौरी की ज़रूरत थी, मगर धीरे-धीरे पार्टी बढ़ती रही और उसकी स्वीकार्यता चारों ओर बनती गई. ऐसे में पार्टी को एक ऐसे शख्स की खास ज़रूरत नहीं थी जो पार्टी की लाइन लेंथ का बहुत ख्याल ना रखता हो. हालात ये हो गई कि जो अरुण जेटली उनके तर्कों को अकाट्य बताते थे वो उन्हें मंत्री ना बनने के कारण कुंठित हुआ व्यक्ति ठहराने लगे. ऐसा होना स्वाभाविक भी है. कभी शौरी के तर्कों और तथ्यों को उधार लेकर सार्वजनिक विमर्श में उतरनेवाली बीजेपी के नेता आज उनके निशाने पर हैं. शौरी ने तथ्यों के आधार पर ही मोदी सरकार के नोटबंदी वाले निर्णय को खूब कोसा है. यहां तक कि वो इसे घोटाला बताने से बाज नहीं आए. इसके बाद उन्होंने राफेल के मुद्दे को लपका और बीजेपी के दूसरे असंतुष्ट यशवंत सिन्हा के साथ अदालत जा पहुंचे.

शौरी ने सरकार पर एजेंसियों के गलत इस्तेमाल तक के आरोप लगाए हैं. जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं. घोटाले भी गिनाए हैं. बीबीसी के पत्रकार राजेश जोशी अपने लेख में लिखते हैं- ‘संघ परिवार से गर्भनाल का संबंध आडवाणी-जोशी का मुंह बंद रखने पर मजबूर करता है पर शौरी ने निक्कर-टोपी पहनकर संघ की शाखा में कभी ध्वज प्रणाम नहीं किया. वो अगर अपनी पर उतारू हो गए तो हर फोरम पर बोलने, लिखने और मोदी और उनके मंत्रियों का मखौल उड़ाने से उन्हें कौन रोकेगा?’

कभी शौरी की भी धूम थी
आज कम ही लोगों को याद रह गया होगा कि मशहूर पत्रकार और बाद में नेता रहे अरुण शौरी हमेशा से पत्रकारिता में नहीं थे. उन्होंने वर्ल्ड बैंक की शानदार नौकरी छोड़कर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा था. 1976 में उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से पत्रकारिता की शुरूआत की. 1982 में वो खबरों के ही चलते निकाल भी दिए गए. उसी साल उन्हें अपने काम के लिए मैग्सेसे पुरस्कार मिला. खुद शौरी बताते हैं कि इंदिरा के सत्ता में लौटने के बाद जब उन्होंने विवादित ‘कुओ तेल सौदे’ पर खबरें कीं तो हंगामा मच गया. गोयनका तब तक आपातकाल के दमन से अपने अखबार को उबार भी नहीं सके कि फिर शौरी ने सरकार से टकराव मोल ले लिया. नतीजतन परेशानियों से निजात पाने के लिए उन्हें विदा कर दिया गया.

किताबें लिखते-लिखते शौरी को 1986 में फिर टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी मिली लेकिन इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका ने अपनी गलती मानते हुए उन्हें लौट आने को कहा. छह महीने में ही शौरी फिर इंडियन एक्सप्रेस में चले गए और तब तक काम करते रहे जब तक 1990 में उन्हें फिर से नहीं निकाल दिया गया. उसी साल वो पद्मभूषण से सम्मानित किए गए. उस दौर में गोयनका की सेहत गिर रही थी, साथ-साथ अखबार के बदलते नेतृत्व में शौरी का प्रभाव कम हो रहा था. इस बीच वो मंडल कमीशन के खिलाफ जमकर लिख भी रहे थे. शौरी पर इंडियन एक्सप्रेस के कर्मचारियों ने मंडल विरोधी स्टैंड लेने की वजह से काम बंद कर दिया. आरोप लगा कि अरुण शौरी ने अखबार चलाए रखने के लिए एबीवीपी तक की मदद ली और बाद में उनकी तारीफ भी की. राजीव शुक्ला ने शौरी का जो टीवी इंटरव्यू लिया उसमें एक्सप्रेस एम्प्लॉई यूनियन के अध्यक्ष टीएम नागराजन ने शौरी को हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबल्स से भी गया गुज़रा बताया है. बावजूद इसके अधिकांश लोगों को शौरी की प्रेस स्वतंत्रता के लिए लड़ जानेवाले संपादक की छवि ही याद है. बहुत दिन नहीं बीते जब वो दिल्ली के प्रेस क्लब में एनडीटीवी के प्रमोटर प्रणय रॉय के साथ तब खड़े थे जब एजेंसियों ने प्रणय के घर पर छापा मारा.

शौरी जिन दिनों पत्रकार थे तब राजीव शुक्ला ने उनके लिए कहा था –  ‘शौरी के बारे में मशहूर है कि वो अपनी कलम से सरकारें बनाते और गिराते हैं.’
वहीं एक दौर में अरुण शौरी के साथी रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला उनके बारे में कहते हैं, ‘अरुण शौरी के लक्ष्य हमेशा सही थे मगर उन तक पहुंचने के लिए वो क्या रास्ते चुन रहे हैं, उसकी वो फिक्र नहीं करते थे.’

चावला की बात ठीक भी लगती है. बोफोर्स के दिनों में शौरी चंद्रास्वामी के आगे-पीछे रहते थे लेकिन बाद में छिटक गए. एक वक्त मित्र रहे वीपी सिंह से भी उनके रिश्ते खराब हुए. देवीलाल की करीबी का आनंद भी उन्होंने उठाया मगर फिर उनके खिलाफ लिखकर घुटने टिकवा दिए. ऐसे में आखिरकार बीजेपी के साथ उनकी दोस्ती का अगर यही हश्र हुआ तो क्या अचंभा है?

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