NRC पीड़ितों का चुनाव… महज संयोग है या केजरीवाल का प्रयोग?

असम में NRC की लिस्ट में 19 लाख 6 हजार 657 लोगों का नाम नहीं था. दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इन लाखों लोगों में से कुछ नामों को चुना. सही भी है. विधानसभा में चर्चा के दौरान केजरीवाल लाखों लोगों का नाम कैसे ले सकते थे? लेकिन केजरीवाल ने जिन नामों को चुना वो संयोग था या प्रयोग? ये बड़ा सवाल है.
Arvind Kejriwal on NRC, NRC पीड़ितों का चुनाव… महज संयोग है या केजरीवाल का प्रयोग?

NPR और NRC के खिलाफ प्रस्ताव पास करने वाले राज्यों की लिस्ट में दिल्ली भी शुमार हो गया है. दिल्ली विधानसभा में प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सीएम केजरीवाल ने केंद्र सरकार के इस फैसले की भरपूर मुखालफत की. लेकिन ऐसा करते हुए केजरीवाल की बातों में वोट की चिंता और दिल्ली की स्थानीय राजनीति का एजेंडा बार-बार दिखा.

असम में NRC की लिस्ट आई. लिस्ट में 19 लाख 6 हजार 657 लोगों का नाम नहीं था. NRC के विरोध के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इन लाखों लोगों में से कुछ नामों को चुना. सही भी है. विधानसभा में चर्चा के दौरान केजरीवाल लाखों लोगों का नाम कैसे ले सकते थे? लेकिन केजरीवाल ने जिन नामों को चुना वो संयोग था या प्रयोग? ये बड़ा सवाल है.

एनआरसी के बहाने बीजेपी के राष्ट्रवाद पर चोट?

लाखों लोगों में से चुनकर रिटायर फ्लाइट लेफ्टिनेंट छवींद्र शर्मा और आर्मी ऑफिसर सनाउल्लाह खान को विदेशी घोषित करने का उदाहरण दिल्ली के सीएम ने ढूंढा. देश के लिए उनकी उपलब्धियां बताईं और उनके साथ हुए अन्याय पर हैरान-परेशान हुए. केंद्र को कोसा. ऐसा कर केजरीवाल ने कहीं-न-कहीं ये जताने की कोशिश की कि ये NRC और NPR कैसे देशभक्त सपूतों को भी परेशान कर रहा है!

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आर्मी ऑफिसर सनाउल्लाह खान

सवाल जरूर रहेगा कि क्या केजरीवाल की ये सीधी चोट बीजेपी के राष्ट्रवाद पर थी? 32 साल देश की हिफाजत करने वाले सनाउल्लाह के साथ जो हुआ, उसकी सिर्फ निंदा ही की जा सकती है. कोई बचाव नहीं कर सकता. लेकिन देश को ये जानने का भी हक है कि इस भारी भूल को कैसे खुद सनाउल्लाह ने राजनीति का मुद्दा न बनाने की बात कही थी.

NRC के बहाने दलित-आदिवासी और हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति!

NRC को बुरा बताते हुए केजरीवाल ने नरेश कोच का जिक्र किया और कहा कि ये उस आदिवासी समूह से हैं, जो लंबे अरसे से वहां रह रहा है. जबकि रतन चंद विश्वास का नाम लेते हुए केजरीवाल ने उन्हें बाकायदा दलित हिंदू कहा. संयोग देखिए. दो दिन पहले ही दिल्ली दंगे पर चर्चा के दौरान देश की संसद में जब जान गंवाने वालों का धर्म पूछा गया, तो गृहमंत्री का जवाब था- वे सब भारतीय थे.

बीजेपी के राम के मुकाबले हनुमान को दिल्ली के चुनावी मैदान में उतारने वाले केजरीवाल ये बताना भी नहीं भूले कि असम में जिन 19 लाख लोगों का नाम NRC की लिस्ट से गायब है, उनमें कितने हिंदू हैं और कितने मुस्लिम. केजरीवाल ने अपने आंकड़े में 14 लाख हिंदुओं को और 5 लाख मुसलमानों को पीड़ित बताया. कोई भी समझ सकता है कि ऐसा कर केजरीवाल NRC के नाम पर बड़े ही सलीके से दलितों-आदिवासियों और हिंदू-मुस्लिम की राजनीति कर गए.

पूर्वांचलियों को भी खींच लाए केजरीवाल!

NRC के खिलाफ अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए केजरीवाल दिल्ली के एक और वोट बैंक के पास पहुंचे. दिल्ली में रह रहे पूर्वांचलियों को NRC से होने वाली पीड़ा का भय दिखाया. पूछा कि, “राजधानी में बसे 40 लाख पूर्वांचली क्या करेंगे? अफसर मांगेंगे तो कहां से जुटाएंगे अपने कागजात? क्या ये सारे लोग अपने-अपने घर कागज बनवाने जाएंगे? कौन बनाकर देगा? मैं भी जाऊं, तो मेरे लिए भी आसान नहीं होगा.”

इसके बाद सवाल जरूर रहेगा कि NRC के जिस फॉर्म का भय केजरीवाल दिखा रहे हैं, क्या वैसा है? प्रधानमंत्री ने बार-बार कहा है कि किसी की नागरिकता नहीं जाएगी. उच्च सदन में गृहमंत्री से विपक्ष के नेता गुलाम नबी ने इसी बात की गारंटी मांगी, तो उन्होंने दी भी. दो दिन पहले की ही तो बात है. फिर भी केजरीवाल दिल्ली के पूर्वांचलियों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं, तो इसकी वजह समझी जा सकती है.

Arvind Kejriwal on NRC, NRC पीड़ितों का चुनाव… महज संयोग है या केजरीवाल का प्रयोग?
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया

दिल्ली से पहले देश के 11 राज्य NRC/NPR के खिलाफ प्रस्ताव  पास कर चुके हैं. इनमें कुछ NDA की सरकारें भी हैं. इन सरकारों को अगर लगता है कि केंद्र के इन कानूनों में  कुछ बातें ठीक नहीं है, तो ऐसा सोचने का उनका अधिकार है. अधिकार विरोध का भी है. उनकी सुनने की केंद्र की जवाबदारी भी बनती है. लेकिन विरोध की वजहें अगर कुछ और नजर आए, तो सवाल मंशा पर उठता है और कही गई गंभीर बातें भी कमजोर पड़ने लगती हैं.

केजरीवाल ने जब NRC की पीड़ा बयां करने के लिए फौजियों, दलितों, दिल्ली के पूर्वांचलियों और हिंदू-मुस्लिम की बात की, तो दिल्ली के सीएम के मकसद और मंशा पर सवाल जरूर खड़े हुए.

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