राम जन्मभूमि पर कोई बंटवारा नहीं, कोई समझौता नहीं: रामलला विराजमान

मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़ के तहत याचिकाकर्ता कोर्ट से कहते हैं कि अगर हमारे पहले वाले दावे को नहीं माना जाता है तो नए वाले दावे (मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़) पर विचार किया जाए.

रामलला विराजमान और हिन्दू महासभा ने मुस्लिम पक्ष के “मोल्ड़िंग ऑफ रिलीफ़ पर” सील कवर में लिखित जवाब देने पर आपत्ति जताई है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सेकेट्री जरनल को पत्र लिखकर शिकायत की है. जिसमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने अपने आदेश में कहीं नहीं कहा कि “मोल्ड़िंग ऑफ रिलीफ़ पर” जवाब सील कवर में दाखिल किया जाए. ऐसे में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के जवाब को स्वीकार न किया जाए और न ही इसे पांच सदस्यीय पीठ के समक्ष रखा जाए.

रामलला विराजमान की ओर से दाखिल मोल्डिंग ऑफ रिलीफ यानी लिखित जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर कहा है कि सारा क्षेत्र राम मंदिर के लिए उसे दिया जाए. निर्मोही अखाड़ा या मुस्लिम पार्टियों को जमीन का कोई हिस्सा नहीं मिलना चाहिए. कोई समझौता राम के जन्मस्थान पर नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट में सुन्नी वक्फ बोर्ड और शिया वक्फ बोर्ड को छोड़कर शेष मुस्लिम पक्षों ने सील कवर में मॉड्यूल ऑफ रिलीफ दाखिल किया.

निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट में ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़’ दाखिल किया है. उन्होंने रामलला या किसी भी हिन्दू पक्षकार के पक्ष में डिक्री होने पर अपने सेवायत अधिकार के बरकरार रखे जाने की बात कही है. इसके अलावा उन्होंने विवादित भूमि पर मन्दिर बनाने के साथ ही रामलला की सेवा पूजा और व्यवस्था की जिम्मेदारी का अधिकार भी मांगा है.

बता दें कि इस मामले में कुल 14 पक्ष हैं जिनमें से 6 मुस्लिम पक्ष, 4 हिंदू पक्ष ने ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़’ दाखिल कर दिया है.

शिया वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित जवाब दाखिल किया है.
– शिया वक्फ बोर्ड ने कहा विवादित ज़मीन पर भगवान श्री राम का मंदिर बने.
– बोर्ड ने कहा कि ज़मीन पर मालिकाना हक़ सुन्नी वक्फ बोर्ड का नहीं, बल्कि शिया वक़्फ़ बोर्ड का है.
-ऐसे में हाईकोर्ट ने एक हिस्सा जो सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया है उसे हिन्दू पक्ष को दिया जाए.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखने और मुस्लिम पक्ष की ओर से वहां कोई निर्माण ना करने के इरादे जता दिए जाने के बाद कोर्ट मुस्लिम पक्ष को निर्देश दे कि वो अपने हिस्से की भूमि अखाड़े को लंबी अवधि के पट्टे पर दे ताकि वहां रामलला का भव्य मन्दिर बन सके.

इस सूरत में कोर्ट मुस्लिम पक्ष को 77 एकड़ अधिग्रहित भूमि से बाहर मस्जिद के लिए समुचित भूमि उपलब्ध कराने का आदेश सरकार को दे.

वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से वकील शाहिद रिजवी ने बताया कि मोल्डिंग ऑफ रिलीफ को लेकर उनकी ओर से जवाब दाखिल किया गया है. हमने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट को पूरा अधिकार है कि वो चाहे तो रिलीफ को मोल्ड कर सकता है. अपने आप में ये उपयुक्त केस है, जहां कोर्ट ”देशहित’ में अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, जो उपयुक्त लगे, उस लिहाज से हमारी रिलीफ को मोल्ड कर सकता है. हमने पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के उदाहरण दिये हैं, जहां कोर्ट ने इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया है.

कौन हैं पक्षकार

पक्षकार..
1. हासिम अंसारी/ इकबाल अंसारी
2. एम सिद्दीक
3. मिसबाहुद्दीन
4 फ़ारुख अहमद ( मृत).
5.मौलाना मेहफुजूरह्मान
6. मोहम्मद हाशिम ( मृत)

इससे पहले अयोध्‍या केस में मुस्लिम पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त रूप से ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़’ पर अपनी वैकल्पिक मांग सीलबंद लिफाफे में पेश की है.

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ने भी मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़ पर अपनी वैकल्पिक मांग सुप्रीम कोर्ट में पेश की हैं.

मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़ के तहत याचिकाकर्ता कोर्ट से कहते हैं कि अगर हमारे पहले वाले दावे को नहीं माना जाता है तो नए वाले दावे (मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़) पर विचार किया जाए.

दरअसल, कोर्ट ने अयोध्या मामले में फैसला सुरक्षित रखते समय सभी पक्षकारों को मोल्डिंग ऑफ रिलीफ़ को लेकर तीन दिन में लिखित नोट जमा करने को कहा था.

हिन्दू महासभा ने ‘मोल्ड़िंग ऑफ रिलीफ़’ को लेकर दायर नोट में कहा है मंदिर के रखरखाव और प्रशासन के लिए कोर्ट ‘स्किम ऑफ़ एडमिस्ट्रेशन’ बनाए. कोर्ट एक ट्रस्ट का गठन करे जो राम मंदिर के निर्माण के बाद पूरी व्यवस्था देखे. सुप्रीम कोर्ट इसके लिए एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करे.