कृषि बिल पर क्यों खड़ा किया जा रहा इतना बखेड़ा? क्या है सरकार, विपक्ष और किसानों का पक्ष

वो किसान, जो राजनीति को हमेशा से प्रिय रहे हैं. उनके भले की बात तो हुई, लेकिन उनका भला कभी नहीं हुआ है और एक बार फिर उन्हीं किसानों को लेकर संसद से लेकर सड़क तक जमकर एक्शन और रिएक्शन हो रहा है.

देश की 70 प्रतिशत आबादी, जो हमारे और आपके अन्नदाता हैं…वो किसान, जो राजनीति को हमेशा से प्रिय रहे हैं. उनके भले की बात तो हुई, लेकिन उनका भला कभी नहीं हुआ है और एक बार फिर उन्हीं किसानों को लेकर संसद से लेकर सड़क तक जमकर एक्शन और रिएक्शन हो रहा है.

किसानों की भलाई के लिए मोदी सरकार, जो कृषि विधेयक लाई है, उन्हें पास कराने के दौरान राज्यसभा में विपक्ष ने रविवार को सदन की मर्यादा को तार-तार कर दिया. वेल में जाकर हंगामा किया गया. हाथापाई तक की नौबत आ गई थी. उप-सभापति के पास जाकर दस्तावेज फाड़े गए और माइक तक टूट गया.

ऐसा करने वाले आठ सांसदों को आज 7 दिन के लिए सस्पेंड कर दिया गया, जिनमें TMC के डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन हैं. कांग्रेस के राजू साटव, रिपुण बोरा, सैयद नसीर हुसैन भी शामिल हैं. आम आदमी पार्टी के संजय सिंह. सीपीएम के एलमाराम करीम और केके रागेश के खिलाफ भी एक्शन लिया गया है.

विपक्ष और किसान संगठन कर रहे विरोध

इस बीच देश के कई हिस्सों में लोकसभा और राज्यसभा से दो कृषि विधेयक पास होने का विरोध सड़कों पर भी जारी है. बिलों को किसान विरोधी करार देते हुए कई शहरों में किसान संगठन और विपक्षी पार्टियों ने प्रदर्शन किए.

अब सवाल ये है कि सरकार किसानों के लिए जिन बिलों को क्रांतिकारी बता रही है. उन पर हंगामा क्यों मचा है? क्या वाकई में इससे किसान नाराज हैं या फिर वो बिचौलिए और आढ़तिये, जो किसानों का हक मारते आए हैं. सवाल ये भी है कि जो आंदोलन हो रहा है, ये किसान हैं या बिचौलिए? क्योंकि APMC में ही सबसे बड़ा घोटाला ये है कि किसान को मजबूर किया जाता है.

क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े?

याद हो वो कलावती, जिनके घर 2008 में राहुल गांधी पहुंचे थे और संसद में उनका जिक्र करके उन्हें गरीब किसान विधवाओं की ‘पोस्टर वुमन’ बना दिया था, लेकिन उसके बाद कलावती की सुध किसी ने नहीं ली. कर्ज के चलते ही कलावती के पति ने आत्महत्या की थी और 2010 में कलावती के दामाद ने भी खुदकुशी कर ली थी. उनकी तरह ही हर साल हजारों किसान सुसाइड कर रहे हैं.

NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में 10,281 किसानों ने आत्महत्या की और ज्यादातर किसानों की आत्महत्या की वजह कर्ज का बोझ थी. वहीं मोदी सरकार का दावा है कि कर्ज के इसी कुचक्र से किसानों को निकालने के लिए केंद्र सरकार कृषि बिल लाई है.

कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए लाए गए तीन में से दो बिल संसद में पास हो चुके हैं.

  • पहला बिल है कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) बिल 2020. इसके तहत APMC मंडियों के बाहर भी किसान अपनी उपज बेच सकते हैं, यानी वन नेशन वन मार्केट. किसानों को छूट देता है कि वो अपनी फसल जहां चाहें, वहां बेचें.
  • दूसरा है कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल, 2020. ये कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग के बारे में है, जो किसानों को छूट देता है कि वो कंपनियों से कॉन्ट्रैक्ट करके अपनी कीमत पर फसल बेच सकेंगे.
  • सबसे ज्यादा विरोध कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020 का हो रहा है, जिसके तहत किसान APMC मंडी के बाहर भी फसल बेच सकेंगे.

सरकार APMC यानी एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी मंडी के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है, लेकिन क्यों अब ये समझिए. राज्यों में APMC के गठन का सबसे बड़ा मकसद बिचौलियों के हाथों किसानों का शोषण रोकना था, लेकिन यहां पर आढ़तियों का ही सिक्का चलता है.

इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि सरकारी खरीद में भी 2.5 फीसदी का आढ़तिया चार्ज फिक्स है. सरकार को गेहूं या धान खरीदना हो तो पहले किसानों से आढ़तिये खरीदेंगे, उसके बाद उनसे एफसीआई. इसी एकाधिकार के चलते ज्यादातर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है. नए बिल में इन्हीं कमियों को दूर करने की कोशिश की गई है.

APMC मंडियां चलती रहेंगी

नए बिल के मुताबिक APMC मंडियां चलती रहेंगी, लेकिन इसके बाहर भी उपज को बेचा जा सकता है यानी ये किसानों के ऊपर है कि वो अनाज या गल्ला मंडी में जाकर फसल बेचना चाहते हैं या फिर मंडी के बाहर कंपनियों को बेच सकते हैं. दोनों विकल्प रहेंगे.

मोदी सरकार ने इसी गठजोड़ को खत्म करने का फैसला किया है न कि APMC मंडियों को, लेकिन फिर भी विरोध हो रहा है और उसका एक प्वाइंट और भी है और वो है MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य.

MSP को लेकर क्या दलीलें दी जा रही हैं और क्या सवाल उठाए जा रहे हैं? वो आपको बताएं, उससे पहले ये बता दें कि केंद्रीय कैबिनेट ने रबी की 6 फसलों पर MSP को बढ़ा दिया है.

  • अब गेहूं के MSP में 50 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है.
  • जौ के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 75 रुपये का इजाफा हुआ है.
  • सरसों और चने के लिए MSP 225 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है.
  • कुसुम की फसल के लिए MSP 112 रुपये और मसूर के लिए 300 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है.

एमएसपी वह न्यूनतम समर्थन मूल्य है, जो किसानों को उनकी फसल पर मिलता है. भले ही बाजार में उस फसल की कीमतें कम हो, ताकि कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर न पड़े, उन्हें न्यूनतम कीमत मिलती रहे.

नए बिल को विपक्ष और कुछ किसान संगठन MSP को खत्म करने की शुरुआत बता रहे हैं. इन तमाम आशंकाओं को खारिज करने के लिए खुद प्रधानमंत्री को सामने आना पड़ा है.

पीएम मोदी ने कहा कि इतने बड़े व्यवस्था परिवर्तन के बाद, कुछ लोगों को अपने हाथ से नियंत्रण जाता हुआ दिखाई दे रहा है. इसलिए अब ये लोग एमएसपी पर किसानों को गुमराह करने में जुटे हैं. मैं देश के प्रत्येक किसान को इस बात का भरोसा देता हूं कि एमएसपी की व्यवस्था जैसे पहले चलती आ रही थी, वैसे ही चलती रहने वाली है.

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के फॉर्मूले पर भी विरोध

कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल, 2020 के तहत बड़ी-बड़ी कंपनियां किसी खास उत्पाद के लिए किसान से कॉन्ट्रैक्ट करेंगी. सवाल उठाने वाले कह रहे हैं कि किसान अपने ही खेत में मजदूर बनकर रह जाएंगे, जबकि प्रावधान ये है कि करार करना है या नहीं. ये किसान पर निर्भर करेगा.

इस मांग को अगर 2015 में आई शांता कुमार समिति की रिपोर्ट के रोशनी में देखें, तो सारी तस्वीर साफ हो जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक 94 फीसदी किसान पहले से ही निजी कंपनियों और व्यापारियों को अपने उत्पाद बेच रहे हैं. APMC मंडियों में केवल 6 फीसदी किसान MSP पर सरकारी खरीद एजेंसियों को अपने उत्पाद बेचते हैं.

मतलब ये कि जो हौव्वा खड़ा किया जा रहा है. उसकी हकीकत कुछ और ही है. माना जा रहा है कि अब तक अन्नदाता की थाली में छेद करने वालों को अब अपनी वोट और नोट की थाली खाली होती नजर आ रही है.

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