आचार्य फिरोज खान पर हमला, संस्कृत और संस्कृति दोनों पर चोट

संस्कृत के बहाने निजी खुन्नस निकालने की ऐसी ही कट्टर सोच बनारस में साल 1655 के आसपास दिखी थी. उस दौर में जब औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का फरमान सिर्फ इसलिए जारी किया था कि उसका सगा भाई दाराशिकोह वहां संस्कृत पढ़ता था.
BHU firoj khan controversy, आचार्य फिरोज खान पर हमला, संस्कृत और संस्कृति दोनों पर चोट

ये बनारस को क्या हो गया है? फिरोज खान का प्रकरण बनारस की आत्मा पर चोट है. जिस बनारस में कोई डेढ़ सौ साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने यह ऐलान किया हो कि “इन मुसलमान हरिजनन पे कोटिन हिंदुन वारिए”, वहाँ फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने का विरोध हमारी सांस्कृतिक दरिद्रता है?

भारतेंदु परम वैष्णव थे, फिर भी उन्होंने रहीम, रसखान और दारा शिकोह जैसे मुसलमानों के कृतित्व पर करोड़ों हिंदू न्योछावर करने की बात की. आखिर क्यों? ऐसी महान् सांस्कृतिक विरासत वाले बनारस में एक फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने से हिंदू कर्मकांड या धर्म खतरे में पड़ रहा है? संस्कृति नष्ट हुई जा रही है? आखिर कौन हैं ये बनारस की तसवीर बिगाड़ने वाले लोग? महादेव की नगरी के खाँटी समरस चरित्र पर सवालिया निशान लगाने वाले? संस्कृति को चोट पहुँचाने वाले? संस्कृति को नष्ट करने वाले? क्या इस जघन्य अपराध का प्रायश्चित्त हो सकेगा?

भाषा की ऐसी धार्मिक बाड़ेबंदी कुछ शोहदों की हिंदुत्व के नाम पर एक बेईमान चाल है. कायदे से तो संस्कृत के ऐसे विद्वान मुसलमान का सार्वजनिक तौर पर सम्मान किया जाना चाहिए. देवभाषा में निष्णात ऐसे मुसलमान को लोकगर्व के ‘शो केस’ में सजाकर रखा जाना चाहिए. पर इसके उलट बीएचयू में धर्म के नाम पर जो कुछ भी घट रहा है, वह पाप है, अनीति है, अन्याय है. मैं शर्मिंदा हूं बीएचयू की अपनी दस बरस की पढ़ाई पर.

औरंगजेब के जमाने में भी दिखी थी ऐसी ही कट्टर सोच 

संस्कृत के बहाने निजी खुन्नस निकालने की ऐसी ही कट्टर सोच बनारस में साल 1655 के आसपास दिखी थी. उस दौर में जब औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का फरमान सिर्फ इसलिए जारी किया था कि उसका सगा भाई दाराशिकोह वहां संस्कृत पढ़ता था. उस घटना के साढ़े चार सौ साल बाद एक बार फिर उसी मानसिकता ने आचार्य फिरोज खान पर हमला किया है. यह चोट फिरोज खान पर नहीं है, यह चोट संस्कृति पर है. वह भाषा जिसे हिंदू समाज ने रोजमर्रा के व्यवहार से कब का बहिष्कृत कर दिया है. उसके बचे-खुचे अवशेषों को भी इस तरह से मिटाने की यह साजिश है. ये वक्त संभलने का है. जागने का है. फिरोज खान के बहाने संस्कृत और संस्कृति दोनों की ही ‘अस्मिता’ के साथ खड़े होने का है.

आखिर यह कैसा दोहरा रवैया है कि एक तरफ तो हम संस्कृत विद्वान् और पुरावेत्ता के.के. मोहम्मद को राष्ट्रवाद का आइकॉन मानते हैं, क्योंकि उन्होंने सच बोलकर रामलला के लिए इनसाफ की राह प्रशस्त की और दूसरी ओर बनारस में ये भेदभाव? आखिर संस्कृत विद्वान आचार्य फिरोज खान (बीएचयू में प्रोफेसर को आचार्य कहते हैं) अपनी ज्ञान-संपदा से किसे सींचने जा रहे हैं? उनके ज्ञान की खाद पाकर जो नई पौध उर्वर होगी, वह किस सभ्यता या फिर किस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करेगी?

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आचार्य फिरोज खान संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन के जरिए उसी सनातन संस्कृति के उन्नयन का जरिया बनेंगे, जिसके नाम पर भेदभाव की ये विषबेल तैयार की जा रही है. कोई इस बात पर गौर करने को तैयार नहीं है. फिरोज खान के विरोध में जैसी मुहिम चलाई गई. वह घोर अवमूल्यन के खतरनाक संकेत दे रही है. जिस बनारस के लिए गालिब ‘चराग-ए-दैर’ यानी मंदिर का चिराग लिख गए. उसी बनारस में फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने का विरोध यही साबित करता है कि गंगा सचमुच प्रदूषित हो चुकी है. गंगा से ही हमारी सभ्यता और संस्कृति बनती थी. जिस संस्कृित की स्मृतियों में ‘जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते’ का उद्घोष कर मानव जाति को जन्म के आधार पर समानता और कर्म के आधार पर उच्चता का पाठ पढ़ाया गया हो, वहाँ विद्यार्थियों का यह शैक्षिक खोखलापन चिंताजनक है. जिस काशी में नजीर बनारसी ने गंगा के पानी में वजू करते हुए उम्र गुजार दी, उस शहर में फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने के विरोध से बड़ी समाजिकता की भयावह तसवीर और क्या होगी!

जिस बनारस में एक चांडाल ने खोल दी थी शंकराचार्य की आंखें, वहां ऐसा विरोध दुख की बात   

दुर्भाग्य की बात है कि ये सब उस बनारस में हो रहा है, जहाँ एक चांडाल ने आदि शंकराचार्य की आँखें खोल दी थीं. भेदभाव और छुआछूत की रस्सियों में जकड़े आचार्य शंकर को अद्वैत का असली पाठ समझा दिया था. इसी काशी में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने सनातनी कर्मकांड के भस्मासुर के सिर पर हाथ रखने का साहस किया था. उसे जड़ता से निकालकर चेतन की पवित्रता की ओर अग्रसर किया था. ऐसी काशी में संस्कृत को धार्मिक कट्टरता की विषबेल से जोड़ने वाली ये बंजर पैदावारें पहली नजर में ही विजातीय लगती हैं. कबीर की ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’ का संचार करने वाली इस काशी में ऐसे विजातीय तत्त्व कहाँ से आ गए? समस्या की मूल जड़ तो यही है. एक स्थानीय उम्मीदवार के सेलेक्ट न होने से समूची समरसता की संस्कृति पर हमला. यह महामना की सर्वविद्या की राजधानी की अवधारणा के खिलाफ है.

फिरोज खान ने संस्कृत के अध्ययन में जीवन दिया है. शास्त्री, आचार्य, नेट, जेआरएफ, पी.एच-डी. संस्कृत में एक के बाद दूसरी उपलब्धि हासिल करके वे इस पद पर पहुँचे हैं. फिरोज खान की नियुक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के तहत वाइस चांसलर की देख-रेख में बनी चयन कमेटी ने किया है. यह सही है कि वह संस्कृत विभाग नहीं है. प्राच्य विद्या धर्म संकाय है, पर उसमें भी जो आठ विषय पढ़ाए जाते हैं. उसमें उन्हें संस्कृत ही पढ़ाना है.

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फिरोज खान को कर्मकांड नहीं सिखाना है

आंदोलनकारी कहते हैं कि कोई गैर हिंदू कर्मकांड नहीं सिखा सकता है. फिरोज खान को कर्मकांड नहीं सिखाना है, संस्कृत पढ़ाना है. वे बीएचयू के प्राच्य विद्या धर्म संकाय का गौरव हैं.

सोचिए, उस दौर में जब संस्कृत दिनोदिन हाशिए पर ढकेली जा रही हो. जब संस्कृत और हिंदी के संस्कारों से निकली पीढ़ियाँ कर्ता और कर्म की बात तो दूर, मात्रा-पाई तक का फर्क समझ पाने में असफल सिद्ध हो रही हों. ऐसे वक्त में एक मुस्लिम व्यक्ति का संस्कृत के प्रति ऐसा अनुराग हमारी सभ्यता और संस्कृति दोनों के लिए वरदान है. मैं बात संस्कृत की कर रहा हूं, पर यह बात संस्कृति की भी है. फिरोज खान के अध्ययन के तार देखने में संस्कृत से जुड़े हैं, मगर असलियत में वह हमारी संस्कृति विरासत का हिस्सा हैं.

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अच्छा होता कि काशी में फिरोज खान के नाम के जयकारे लगाए जाते!

क्या ये अच्छा होता कि इसी काशी में फिरोज खान के नाम के जयकारे लगाए जाते! उनका सम्मान किया जाता! उनसे सीखा जाता! उनकी प्रेरणा देकर हम अपने परिवार के सदस्यों को संस्कृत की ओर उन्मुख करते! इस भाषा का प्रचार-प्रसार करते! इसे एक निश्चित घेरे से बाहर ले जाते, मगर हम तो उलटा ही इसे मारने पर तुले हुए हैं. जिस देश में रसखान ने श्रीकृष्ण की भक्ति में सवैये लिखे हों. उनका रचा हुआ, ‘मानुस हौं’ तो वही रसखान, ‘बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन’ सदियों से हमारी चेतना में गूँजता आ रहा है. जहाँ मोहम्मद रफी की आवाज में सबसे अधिक भजन सुने जाते हो. जहाँ मंगलागौरी मंदिर के नौबतखाने में बैठकर बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई पर महारत हासिल की हों, जहाँ अमीर खुसरो के पद घर-घर गाए जाते रहे हों. ऐसी काशी को उसके सनातन धर्मपथ से विमुख करने की हर चेष्टा पतित और दुराग्रहपूर्ण है.

भारतीय संस्‍कृति हमेशा से बाहरी लोगों को आकर्षित करती आई है 

ये भारतीय संस्कृति की खासियत है कि वह हमेशा से बाहरी परिवेश के लोगों को अपनी ओर खींचती आई है. दाराशिकोह मुगल बादशाहों में सबसे काबिल और विद्वान् शहजादा था. वह शहंशाह शाहजहाँ का सबसे बड़ा बेटा था. संस्कृत, फारसी, लातीनी, सुरियानी और अरबी भाषाओं का ज्ञाता और लेखक था. दाराशिकोह ने ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘उपनिषदों’ का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया. दाराशिकोह ने काशी के ही एक विद्वान् पंडितराज जगन्नाथ से संस्कृत सीखी. 1657 में जब दाराशिकोह ने 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था, तब पंडितराज ही उसके मार्गदर्शक थे. दाराशिकोह ने उपनिषदों का अध्ययन किया और उनका फारसी भाषा में ‘सिर्र-ए-अकबर’ नाम से अनुवाद कराया, जिसका अर्थ होता है—‘ईश्वरीय’ शब्द.

भारत की प्राच्य विद्या, धर्म और संस्कारों में डूबे गैर हिंदू लोगों की ये सूची इतिहास के गौरवशाली नक्षत्रों का हिस्सा है. भारत आने वाले प्रमुख अरब यात्रियों में अलबरूनी उर्फ अबूरेहान भी था. वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था. भारत रहते हुए इसने खगोल विद्या, संस्कृत तथा रसायनशास्त्र आदि का विस्तृत अध्ययन किया. अलबरूनी प्रथम ज्ञात मुसलमान था, जिसने संस्कृत पढ़ी. गहन अध्ययन करके उसने पुराणों की विवेचना भी की थी. उसने मत्स्य, आदित्य, विष्णु और वायु पुराण का अध्ययन किया. अलबरूनी ने ज्योतिष के अनेक संस्कृत ग्रंथों का अरबी अनुवाद किया. ‘किताब-उल-हिंद’ (तहकीक-ए-हिंद) उसकी प्रसिद्ध रचना है.

संस्कृत के साथ मुसलमानों के जुड़ाव की बड़ी समृद्ध परंपरा है

संस्कृत के साथ मुसलमानों की इस संगति की एक बेहद समृद्ध परंपरा है. आज के दौर के इन उन्मादी अज्ञानियों ने अगर वाकई कुछ पढ़ा-लिखा होता तो वे ऐसी सोच कतई नहीं रखते. अकबरशाह आंध्र प्रदेश के सूफी संत और संस्कृत विद्वान् गेसूदराज के वंशज थे. इन्होंने संस्कृत में नायिका भेद पर ‘शृंगारमञ्जरी’ नामक ग्रंथ लिखा. अब्दुलर्रहीम खानखाना यानी रहीम भी संस्कृत के विद्वान् थे. ‘खानखाना’ रहीम की उपाधि थी, जिसे अकबर ने दिया था. रहीम अकबर के नवरत्नों में से एक थे. वे बहुभाषाविद् थे और हिंदी, तुर्की, फारसी, संस्कृत, अवधी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली पर उन्हें दक्षता थी. अब्दुर्रहीम खानखाना ने अरबी, फारसी के साथ ब्रज तथा संस्कृत में भी रचना की.

कश्‍मीर में कई संस्‍कृतप्रेमी शासक हुए 

कश्मीर में सुल्तान जैनुल आबदीन (14वीं सदी) जैसे अनेक संस्कृतप्रेमी शासक हुए. उनकी प्रेरणा से महाभारत एवं राजतरंगिणी का संस्कृत से फारसी में तथा कई अरबी और फारसी पुस्तकों का हिंदी भाषा में अनुवाद हुआ. बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय (1500-1627 ई.) ने फारसी भाषा में ‘किताब-ए-नवरस’ नामक ग्रंथ लिखा, जिसमें संस्कृत के शब्दों का प्रयोग है. यह संगीत और कला पर लिखित ग्रंथ है. अकबर के ही शासनकाल में हाजी इब्राहिम ने शेखभवन की सहायता से अथर्ववेद का फारसी में अनुवाद ‘अथरबन’ शीर्षक से किया. शेख अबु अल फैज मध्यकालीन भारत के फारसी कवि थे. फैज ने भगवतगीता का फारसी में अनुवाद, राजे-ए-मगफिरत के नाम से किया. अकबर के आदेश पर फैजी ने बीजगणित के संस्कृतग्रंथ लीलावती का फारसी अनुवाद किया. बदायूँ के अब्दुल कादिर बदायूँनी ने सन् 1590 ई. में रामायण का फारसी भाषा में अनुवाद किया. नाकिब खान और थानेश्वर के शेखसुलतान ने भी रामायण का फारसी अनुवाद किया.

इतिहास की ही बात नहीं, वर्तमान भी ऐसे कई अप्रतिम उदाहरणों से भरा पड़ा है. संस्कृत की विद्वान् नाहिद आबिदी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की रहनेवाली हैं. बनारस में रहती है. महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पीएचडी की डिग्री हासिल करने के बाद. साल 2005 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इन्होंने संस्कृत पढ़ाया. साल 2014 में इन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

पंडित गुलाम दस्तगीर को भी था संस्‍कृत भाषा से बेहद प्‍यार 

संस्कृत भाषा से कुछ ऐसा ही प्रेम मुंबई के पंडित गुलाम दस्तगीर को भी है. पंडित दस्तगीर बीते कई दशक से संस्कृत भाषा की सेवा में लगे हुए हैं. महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पैदा हुए पंडित दस्तगीर लंबे समय तक मुंबई के वर्ली हाई स्कूल में संस्कृत की शिक्षा देते रहे. भगवद भक्ति में डूबे संगीत से भक्तों को मंत्र -मुग्ध करने वाले जयपुर के पास बगरू के प्रख्यात संगीतज्ञ रमजान खान का अतीत ऐसा ही है. वे फिरोजके पिता हैं. रमजान खान का पूरा परिवार ही संस्कृत से जुड़ा रहा है. रमजान के घर की दीवारों पर भगवान् कृष्ण की तसवीरें लगी हैं. रमजान 15 वर्षों से गोशाला चलाते हैं और रोज कई घंटे गोसेवा में गुजारते हैं. उन्हें सुंदरकांड, हनुमान चालीसा व कई भजन कंठस्थ हैं. रमजान ने अपने चार पुत्रों वकील, शकील, फिरोज व वारिस को भी संस्कृत विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कराई है. रमजान ने अपनी छोटी बेटी का जन्म दीपावली पर होने से उसका नाम लक्ष्मी रखा, जबकि उनकी बड़ी बेटी का नाम अनीता है.

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अब सोचिए कि अगर फिरोज खान का विरोध करने वाले सोच के लोग ऐसी विभूतियों को भी मिले होते, तो उन पर क्या बीतती? ये विचार ही हृदय हिलाने के लिए काफी है कि धर्मांधता का ये विकृत तांडव उस महान् नगरी में हो रहा है, जिसका नाम काशी है. संस्कृत की महानता उसके विस्तार में है. उसके व्यापक स्वरूप में है. उसकी निरंतर स्वीकार्यता में है. संस्कृत को तालाब मत बनाइए, नहीं तो पानी सड़ जाएगा. हमें उसे सतत प्रवाहिनी सलिला का रूप देना है. कबीर बहुत पहले ही चेता गए हैं कि ‘संसकीरत है कूप जल, भाखा बहता नीर’. इस दौर में भी कुएँ का पानी फिर भी पेय होता है, मगर तालाब के पानी में यह संभावनाएँ भी खत्म हो जाती हैं. ये जिम्मेदारी उनकी भी है, जो आज ये सब होता हुआ देखकर भी खामोश हैं. काशी में संस्कृत के नाम पर हठवादिता और धर्मांधता के इस खेल को जड़ से उखाड़ने के लिए काशी को ही आगे आना होगा. ये काशी का उत्तरदायित्व भी है, संस्कार भी और धर्म भी.

महामना मालवीय इसे सर्वविद्या की राजधानी बनाना चाहते थे, ताकि देश और दुनिया की सारी भाषाएं यहां फलती-फूलती रहे. भाषा की जाति और धर्म मत तय कीजिए. ऐसा कर आप संस्कृत की तौहीन करेंगे. संस्कृत का विस्तार होने दीजिए. फिरोज खान का स्वागत कीजिए. हमारे यहाँ मंडन मिश्र का तोता भी संस्कृत बोलता था. कथाओं में मुर्गा और कौवा , संस्कृत बोलते और समझते रहे हैं. फिरोज खान तो इनसान है.

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