100 साल से दहक रही आग पर बैठे लोगों ने इसबार वोट न डालने का फैसला किया है

स्थानीय लोगों का कहना है कि लोग कोयले में लगी आग से उठने वाले धुएं के कारण कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.
बोकारो, 100 साल से दहक रही आग पर बैठे लोगों ने इसबार वोट न डालने का फैसला किया है

रांची: झारखंड का बोकारो शहर स्टील सिटी के नाम से मशहूर है. यह शहर एक बार फिर सुर्खियों में आया है लेकिन इसबार स्टील को लेकर नहीं. बल्कि लोकसभा चुनावों को लेकर. दरअसल बोकारो के लोगों ने इस बार लोकसभा चुनाव में वोट न डालने का फैसला किया है. उनका कहना है कि बोकारो के कोयला खदानों में लगने वाली आग पर काबू पाने के लिए सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि लोग कोयले में लगी आग से उठने वाले धुएं के कारण कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. लोगों का कहना है कि अगर सरकार इस समस्या का कोई हल नहीं निकाल सकती तो हम वोट ही क्यों डालें. बोकारो धनबाद लोकसभा सीट का हिस्सा है.

मालूम हो कि धनबाद में भारत का सबसे बड़ा कोयला भंडार है. इसी धनबाद में झरिया की कोयला खदान भी आती है जो पिछले 100 सालों से लगातार जल रही है. ऐसे में यह भी कहा जाता है कि झरिया और इसके आस-पास के इलाकों में लोग एक ऐसे ज्वालामुखी पर बैठे हैं जिसमें कभी भी भीषण विस्फोट हो सकता है.

जलते कोयले से निकलने वाली गैस इतनी घातक और जहरीली हैं कि इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां लगभग हर व्यक्ति ही बीमार है. भारत की विकास की गाथा गढ़ने में कोयले का बहुत बड़ा हाथ है और वह उच्च कोटि का कोयला आता है इन्हीं खदानों से. यह कोयला ही लोहा और स्टील के उद्योगों को चलाने में मुख्य भूमिका निभाता है.

झरिया की जमीन में वर्षों से धधक रही है आग

झरिया में कोयले का खनन 1894 में शुरू हुआ. यहां पहली बार खदान में आग लगने का मामला साल 1916 में सामने आया. उसके बाद अब इस इलाके में जमीन के नीचे लगभग 70 जगहों पर आग लगे होने की खबर है. यह आग बुझने की जगह दिनो-दिन और खतरनाक होती जा रही है. और उतना ही खतरनाक होती जा रही हैं इससे निकलने वाली जहरीली गैस.

इस इलाके में कोयला ही मुख्य आय और रोजगार का श्रोत है. लाखों लोगों का जीवन इस पर टिका है. ऐसे में यहां से पलायन कर के जाना भी कोई उपाय नहीं है. जबकि सरकारें जमीन के नीचे सुलग रही इस आग को शांत करने में कोई खास रुची भी नहीं दिखा रही है. यही कारण है कि गांव के लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल न करने का इरादा कर लिया है.

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