जम्मू कश्मीर में किन्हें मिलेगा आरक्षण का लाभ

धारा-370 और अनुच्छेद 35-ए को लेकर चल रहे विवादों के बीच मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर के लिए अहम फैसला लिया है. इस फैसले से राज्य की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाली आबादी का 24 साल का इंतजार खत्म हो गया है.

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में अब अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले लोगों को भी अब आरक्षण का लाभ मिलेगा. मोदी कैबिनेट ने गुरुवार को जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन अध्यादेश 2019 को मंजूरी दे दी. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये पूरे प्रदेश में लागू हो जाएगा. इस अध्यादेश के अमल में आने के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रहने वाले लोगों को भी आरक्षण का लाभ मिल सकेगा, इससे पहले लाइन ऑफ कंट्रोल के पास रहने वाले लोगों को ही ये सुविधा मिलती थी. इस फैसले से देशभर की तरह जम्मू कश्मीर में भी आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10फीसदी आरक्षण का लाभ मिल सकेगा.

अध्यादेश से किन लोगों को होगा फ़ायदा

धारा- 370 के एक उपबंध में संशोधन के जरिए जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन अध्यादेश 2019 को केंद्रीय कैबिनेट ने अपनी मंजूरी दी है. यह अध्यादेश संविधान के (77वां संशोधन) अधिनियम 1995 के प्रावधानों को जम्मू कश्मीर में लागू करने में मदद करेगा. इसके साथ ही संविधान के 103 वें संशोधन का प्रावधान भी जम्मू कश्मीर में लागू हो जाएगा. इससे जम्मू-कश्मीर में मौजूदा आरक्षण के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोगों को शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण मिल सकेगा. केंद्रीय कैबिनेट के फैसले से सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रमोशन में आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा। इसमें गुज्जर और बक्करवाल जाति भी शामिल है.

अध्यादेश की अहम बातें

–    देशभर की तरह जम्मू कश्मीर में भी आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को मिलेगा 10 फीसदी आरक्षण का लाभ.

 –    अंतरराष्ट्रीय सीमा के लोगों को भी एलओसी की तरह 3 फीसदी आरक्षण का प्रावधान.

–    अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर रहने वाले तकरीबन 350 गांवों के लोगों को इस आरक्षण का लाभ मिलेगा. इन गांवों में लगभग 3 लाख आबादी रहती है.

–    2004 से अब तक केवल नियंत्रण रेखा के पास रहने वाले लोगों को ही आरक्षण का लाभ मिलता था.

–    इससे अनुसूचित जाति-जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण मिलेगा.

हालांकि सरकार ने ये साफ किया है कि इस संशोधन से जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासियों के अधिकारों में किसी प्रकार की कटौती नहीं होगी. रिफ्यूजियों को इसका लाभ नहीं मिलेगा. सीमा पर रहने वाले वैसे लोगों को ही आरक्षण का लाभ मिलेगा जो यहां के स्थाई निवासी होंगे.

अंतरराष्ट्रीय सीमा, लाइन ऑफ कंट्रोल और जीरो प्वाइंट में फर्क

भारत-पाकिस्तान के बीच तकरीबन 2900 किलोमीटर का बॉर्डर है. अक्सर अंतरराष्ट्रीय सीमा या आईबी और लाइन ऑफ कंट्रोल या LOC जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं. लेकिन दोनों शब्दों में फर्क है.

अंतरराष्ट्रीय सीमा या इंटरनेशनल बॉर्डर उस लाइन को कहते हैं, जो दोनों देशों को अलग करती है और जिसे दुनिया ने भी स्वीकृति दी है. यह सीमा रेडक्लिफ लाइन पर स्थित है. भारत और पाकिस्तान के चार प्रांतों के बीच यह अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर है. इंटरनेशनल बॉर्डर कश्मीर, बाघा, पाकिस्तान के पंजाब और भारत के पंजाब रीजन को अलग करती है. गौरतलब है एक जीरो प्वाइंट भी है. जो भारत के गुजरात और राजस्थान सीमा पर है और ये प्वाइंट पाकिस्तान के सिंध को अलग करता है. भारत का इंटरनेशनल बॉर्डर पाकिस्तान के अलावा म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान के साथ भी है.

LOC – इसे लाइन ऑफ कंट्रोल भी कहा जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय नहीं मानता है. लेकिन भारत और पाकिस्तान इसे स्वीकारते हैं. 1947 में विभाजन के बाद एलओसी अस्तित्व में आई. एक साल बाद 1948 में इसे अमल में लाया गया. इसके बावजूद 1971 में दोनों देशों के बीच युद्ध हो गया. इसके बाद 1972 में दोनों देशों के बीच शिमला समझौता हुआ. इसी समझौते के तहत दोनों देशों ने एलओसी को औपचारिक रूप से मान्यता दी. ये कोई आधिकारिक सीमा नहीं है. लेकिन ये सीमा दोनों देशों के सैन्य नियंत्रण वाले हिस्से को अलग करती है.