Article 370: केंद्र ने SC में दाखिल किया हलफनामा, कहा- 3 गुना ज्यादा खर्च करने पर भी नहीं बदले हालात

हलफनामे में कहा गया है कि साल 2004 से 2019 तक सरकार ने जम्मू-कश्मीर 277000 करोड़ रुपये खर्च किए. गौर करने वाली बात है कि 2011 और 2012 के दौरान देश के शेष भाग में प्रति व्यक्ति केवल 3,683 रुपये खर्च किए गए.

अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने और जम्मू एवं कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के जवाब में अब केंद्र सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए जवाबी हलफनामा दाखिल किया है.

सरकार ने कहा है कि वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान देश के अन्य हिस्सों में प्रति व्यक्ति पर औसतन 8,227 रुपये की राशि खर्च की गई, जबकि जम्मू और कश्मीर में प्रति व्यक्ति पर 27,358 रुपये खर्च किए गए. इसके बावजूद यह देखा गया था कि विकास नहीं हो रहा और अत्यधिक खर्च के बावजूद कोई लाभ नहीं मिल रहा.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में गृह मंत्रालय ने अनुच्छेद 370 और 35A को हटाने के फैसले पर जोर देते हुए कहा कि वास्तव में भारत के साथ जम्मू और कश्मीर के विकास के लिए पूर्ण एकीकरण किया गया, क्योंकि केंद्र के बड़े मौद्रिक समर्थन के बावजूद समग्र विकास में अनुच्छेद 370 और 35A ने बाधाओं के रूप में काम किया.

हलफनामे में कहा गया है कि साल 2004 से 2019 तक सरकार ने जम्मू-कश्मीर 277000 करोड़ रुपये खर्च किए. गौर करने वाली बात है कि 2011 और 2012 के दौरान देश के शेष भाग में प्रति व्यक्ति केवल 3,683 रुपये खर्च किए गए. जबकि घाटी के लिए 14,255 रुपये प्रति व्यक्ति दिए गए थे. अनुच्छेद 370 और 35A के तहत इस शासन ने राज्य की खुद को नुकसान पहुंचाने का काम किया. इसकी वजह से आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद की गंभीर समस्याओं को बल मिला.

राज्य का समग्र आर्थिक विकास इनके कारण गंभीर रूप से बाधित हुआ किया. इसके परिणामस्वरूप राज्य अपनी पूर्ण विकास क्षमता के साथ रहने में विफल रहा है. हलफनामे में कहा गया है कि पूर्ववर्ती राज्य की महिलाओं के साथ भी भेदभाव किया जाता था, यदि उन्होंने गैर-स्थायी निवासी से शादी करना चुना था.

केंद्र ने कहा कि इस क्षेत्र के हित में साथ देश के बड़े हित में एक सुधारात्मक संवैधानिक उपाय है, ताकि क्षेत्र में शांति और समृद्धि बहाल हो सके. उन्होंने कहा, ” देश के बाकी हिस्सों के साथ जम्मू और कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के लिए कुछ तत्वों द्वारा वर्षों से बनाई जा रही बाधाओं को हटाया जाना चाहिए. हलफनामे में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति के प्रभाव को नकारने के लिए अनुच्छेद 370 के तहत विशेष शक्ति के उपयोग में कोई अवैधता नहीं थी.

पूर्व में कम से कम तीन मौके आए हैं जब राष्ट्रपति ने आदेश जारी करने के लिए इस शक्ति का उपयोग किया था. सरकार ने इसके बाद के सभी प्रस्तावों और संसद में पारित कानून का बचाव किया और तत्कालीन राज्य को विभाजित करने का निर्णय लिया. न्यायमूर्ति एनवी रमना की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ 14 नवंबर को मामलों की सुनवाई करने वाली है, जिसमें विशेष दर्जा को रद्द करने को चुनौती दी गई है.