तीन दिन में 3 मासूमों ने जान दे दी, हमारे बच्‍चों को ये क्‍या हो गया

बच्‍चों के भीतर कैसी मानसिकता घर कर जा रही है कि वे आत्‍महत्‍या जैसा कदम उठा रहे हैं.
तीन दिन, तीन दिन में 3 मासूमों ने जान दे दी, हमारे बच्‍चों को ये क्‍या हो गया

नई दिल्‍ली: वर्चुअल गेम्‍स किस तरह बालमन पर असर डालते हैं, पिछले तीन दिनों में हुई तीन घटनाएं इसकी बानगी है. गेम्‍स की लत को चिकित्‍सा विज्ञान अभी किसी डिसऑर्डर के रूप में नहीं देखता, मगर इसे लेकर बात शुरू होने लगी है. तीन दिन में 3 बच्‍चों ने अपनी जान ले ली.

सवाल यह उठता है कि बच्चों के भीतर आत्महत्या करने जैसी मानसिकता क्यों पनप रही है? क्या इन सबकी वजह गेम्‍स या एप्‍स ही है.

हालांकि सभी केस पर अगर गौर किया जाए तो पाएंगे कि बच्चों के अंदर सुसाइडल टेडेंसी बढ़ने के पीछे पेरेंट्स की लापरवाही भी है. शहर की भाग-दौड़ वाली ज़िंदगी में मां-बाप के पास बच्चों से बात-चीत करने का अवसर कम ही मिल पाता है. इसलिए बच्चों का अधिकतम समय मोबाइल पर बीतता है. बच्चे मोबाइल पर क्या कर रहे हैं ज़्यादातर मां-बाप इन बातों से अनभिज्ञ रहते हैं. नतीज़ा यह होता है कि मां-बाप बच्चे की मनोदशा समझ ही नहीं पाते.

तीन दिन, तीन मासूमों ने जान गंवाई

  • झारखंड के धनबाद में 8 साल के बच्‍चे ने खुद को कमरे में बंद कर फांसी लगा ली. मां खाना बना रही थी, पिता घर पर थे मगर किसी को ऐसे कदम का अंदाजा नहीं था. बच्‍चे ने अपने छोटे भाई को कमरे से भगाया, दरवाजा बंद कर टेबल पर कुर्सी रखी. मां के दुपट्टे को फंदा बनाया और पंखे से लटक गया. पिता अब बताते हैं कि बच्‍चे को मोबाइल की लत थी. घर आते ही मोबाइल ले लेता था. फांसी लगाने वाले दिन भी उसने सुबह गेम्‍स खेले थे.
  • Tik Tok और PUBG, इन दो एप्‍स ने पिछले कुछ महीनों में दर्जन भर लोगों की जान ली है. राजस्‍थान के कोटा में 12 साल के एक लड़के ने Tik Tok चैलेंज को पूरा करने के लिए फांसी का फंदा लगाकर अपनी जान दे दी. खुद को फंदे पर लटकाने से पहले लड़के ने मंगलसूत्र और चूड़ियां पहनीं. इसके बाद उसने एक मेटल चैन गले में डाली और खुद को बाथरूम में किसी कुंडी के सहारे फांसी लगा ली. बच्‍चे का पिता मीडिया से कहता है कि वह पूरी रात टिक टॉक का इस्तेमाल करताा रहता था. उन्‍होंने कहा ‘अगर Tik Tok न होता तो आज मेरा बच्चा जिंदा होता.’
  • पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में 21 जून को 10वीं की एक छात्रा की लाश मिली है. उसकी कलाई की नस कटी हुई थी. पास ही खून से सना ब्लेड, एक पेन और सुसाइड नोट बरामद हुआ है. लड़की के मुंह पर प्लास्टिक के पैकेट भी बंधे हुए मिले. पुलिस के मुताबिक, लगता है कि नस काटने पर निकलने वाली चीख को रोकने के लिए उसने मुंह पर प्लास्टिक का पैकेट बांध लिया था. सुसाइड नोट में लिखा है कि बच्ची मानसिक दबाव में थी. साथ पढ़ने वाले बच्‍चों ने कहा कि उन्‍होंने कुछ भी असामान्‍य महसूस नहीं किया.

तीन दिन में हुईं ये तीन घटनाएं यह बताने को काफी हैं कि बच्‍चों पर इन गेम्‍स, एप्‍स का कैसा असर पड़ रहा है.

मोबाइल गेम्‍स इतने खतरनाक क्‍यों?

वीडियो गेम्‍स ऐसे बनाए ही जाते हैं कि उनके यूजर का इंटरेस्‍ट बना रहे. डिजाइनर्स की यही कोशिश होती है कि आप बार-बार गेम खेलने लौटते रहें. इसकी लत बहुत कुछ जुए की लत जैसी है, जिसे दुनिया एक डिसऑर्डर के रूप में देखती है. आमतौर पर दो तरह के गेम्‍स होते हैं.

सिंगल प्‍लेयर जिनमें कोई मिशन या लक्ष्‍य होता है, उसे हासिल करना रहता है. ऐसे गेम्‍स में रोमांच उतना नहीं होता और इनका अंत तय होता है. दूसरे होते हैं मल्‍टीप्‍लेयर गेम्‍स जैसे- PUBG. इनमें आप ऑनलाइन रहकर बहुत सारे लोगों संग गेम खेल सकते हैं. ऐसे गेम्‍स की लत पड़ जाती है क्‍योंकि इनका कोई अंत नहीं होता. जैसे-जैसे खिलाड़ी वास्‍तविकता से दूर होते हैं, वे अपने साथी प्‍लेयर्स संग रिश्‍ते बनाने लगते हैं.

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