समंदर का बादशाह बनने का ख्वाब देख रहे चीन की राह में दीवार बना भारत

चीन में राजशाही हो, गणतंत्र हो या साम्यावदी शासन, हर काल में उसने ताकत और हथियार के बल पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 12:29 am, Wed, 30 September 20
प्रतीकात्मक
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चीन के बारे में नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था, वहां एक दैत्य पड़ा सो रहा है, उसे सोने दो, क्योंकि जब वो उठेगा तो आतंक पैदा कर देगा. नेपोलियन की ये भविष्यवाणी दो सौ साल बाद सच साबित हो रही है. चीन में राजशाही हो, गणतंत्र हो या साम्यावदी शासन, हर काल में उसने ताकत और हथियार के बल पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया है. चीन के कई राजवंशों ने देश की सीमा को कोरिया, वियतनाम, मंगोलिया और मध्य एशिया तक बढ़ाया.

1949 में जब माओ के नेतृत्व में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई तो ये विस्तारवादी नीति और उग्र हो गई. माओ का मानना था कि – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. माओ ने अपने देशवासियों को भरोसा भी दिलाया था कि प्राचीन काल में चीन की सीमाएं जहां तक थीं. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी उसे जरूर हासिल करेगी. चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी माओ जैसा ही दर्जा मिला हुआ और माओ जैसी विस्तारवादी सोच अब शी जिनपिंग की भी है.

चीन अपनी विस्तारवादी नीति के लिए युद्ध को जरूरी मानता है. वो ये भी जानता है कि दुनिया का सुपरपावर बनने के लिए समंदर पर राज करना जरूरी है. इसलिए जिनपिंग आतंक, कपट, हिंसा और आक्रमण से अपनी सीमा का विस्तार जमीन के साथ ही समंदर तक करने लगा है. वो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लगातार अपनी दखल बढ़ा रहा है और विस्तारवादी एजेंडे को पूरा करने के लिए वॉर एक्सरसाइज वाली पैंतरेबाजी भी कर रहा है. समंदर पर अपनी सत्ता कायम करने के लिए चीन एक साथ चार-चार समुद्रों में अभ्यास कर रहा है.

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चीन दो सैन्य अभ्यास साउथ चीन सी में पैराकेल द्वीप के पास,  एक ईस्ट चीन सी में और दो येलो सी में कर रहा है. इनमे से एक उत्तर में बोहाई सागर भी शामिल है. PLA की नेवी इन इलाकों में लगातार लाइव-फायर ड्रिल कर रही है. चीन ने इस युद्ध अभ्यास के दौरान सभी इलाके में समुद्री जहाज के आने पर पाबंदी लगा दी है. यही समंदर में चीन का विस्तारवादी एजेंडा है.

हर देश अपनी सेना को ट्रैनिंग देने के लिए समय-समय पर सैन्य अभ्यास करता है, लेकिन दूसरे देशों पर कभी पाबंदी नहीं लगाता और एक साथ समंदर में चार जगहों पर सैन्य अभ्यास भी नहीं करता. यहां तक की ऐसा देखने को कम ही मिला है जब चीन ने भी एक साथ कई अभ्यास किए हों. जाहिर है चीन की मंशा हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर कब्जे की है. वो समंदर के रास्ते दुनिया पर आर्थिक और सामरिक दबदबा बढ़ाना चाहता है. साथ ही सी रूट से चीन का सामान और हथियार दुनिया के दूसरे देशों तक पहुंचाना चाहता हैं.

भारत और ऑस्ट्रेलिया ही हैं चीन की राह में रोड़ा

हालांकि चीन के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट भारत और ऑस्ट्रेलिया है. ऑस्ट्रेलिया ही समंदर में चीन की चालबाजी से सबसे ज्यादा प्रभावित है. वो भारत के साथ मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ड्रैगन को चित करना चाहता है. ऑस्ट्रेलिया जानता है कि चीन को रोकने के लिए उसे भारत जैसे दोस्त की जरूरत है और भारत के सहयोग से ही ऑस्ट्रेलिया हिंद प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षित और मुक्त व्यापार भी कर सकता है. यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया भारत से हर क्षेत्र में सहयोग तेजी से बढ़ा रहा है.

ड्रैगन एक साथ चार-चार समंदर में वार एक्सरसाइज कर रहा है. बम-गोला-बारूद बरसा रहा है. वो हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक चक्रव्यूह तैयार कर रहा है, ताकी आने वाले समय में दुनिया का हर देश इस जल क्षेत्र में ड्रैगन की इजाजत से दाखिल हो और ड्रैगन की इजाजत से ही बाहर भी निकले. बदले में हर देश चीन को उसकी कीमत भी अदा करे. दरअसल चीन अपने दमखम के जरिए इस व्यापारिक क्षेत्र में अपना दबदबा कायम करने की फिराक में है, लेकिन भारत और ऑस्ट्रेलिया ऐसा होने नहीं देंगे.

समंदर में चीन की दादागीरी को चुनौती देने के लिए ही ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में भारतीय नौसेना के साथ युद्ध अभ्यास किया और हिंद महासागर में चीन को अलर्ट भी कर दिया की अगर ड्रैगन आगे भी खुराफात करता रहा तो जरूरी जवाब दिया जाएगा और उसके मंसूबे समंदर में ही दफ्न होंगे. यही वजह है कि ये युद्ध अभ्यास भारत और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं का सबसे बड़ा और पहला वॉर एक्सरसाइज बना.

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इसमें दोनों देशों ने अपने हथियारों का जमकर परीक्षण किया. इस वॉर एक्सरसाइज में फाइटर जेट और हेलिकॉप्टर भी शामिल हुए. ये अभ्यास दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने को लेकर हुए करार का हिस्सा था. जून में ही भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 7 समझौते किए थे, जिसमे दोनों देशों के लिए एक दूसरे के सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को भी मंजूरी दी गई थी. चीन को ये डील उस वक्त भी चुभी थी.

चीन को अंदाजा लग गया था कि साउथ चीन सी रूट पर अब भारत और ऑस्ट्रेलिया दमदार चुनौती देंगे. जिस रूट से हर साल चीन का करीब 105 लाख करोड़ का सामान गुजरता है. जो चीन के कुल समुद्री व्यापार का करीब 40 फीसदी है. ऐसे में चीन की युद्धअभ्यास वाली पैंतरेबाजी भारत भी समझता है और ऑस्ट्रेलिया भी, लेकिन अब भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ ही अमेरिका, जापान समेत कई सुपरवार भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने के लिए तैयार है.

चीन ने किया हमला तो सबसे पहले भारत काटेगा सप्लाई चेन

अब आपको बता दें कि लद्दाख से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक हेकड़ी दिखा रहे ड्रैगन को भारत भी तीन-तीन मोर्चे पर घेर रहा है. चीन को भी आशंका है कि अगर उसने एक साथ भारत, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ युद्ध छेड़ा तो सबसे पहले सप्लाई लाइन पर अटैक होगा और यही चीन की कमजोर नस भी है. जिसपर भारत की नजर है. आइए हम आपको बताते हैं कि ये तीन मोर्चे कौन-कौन हैं.

पहला है मलक्का की खाड़ी. मलक्का की खाड़ी ही हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है. यहां से करीब 80 हजार जहाज हर साल गुजरते हैं और ये समंदर से होने वाले व्यापार का 30 फीसदी है. चीन का 80 फीसदी तेल आयात इसी रूट से होता है. चीन की इस कमजोर नस पर हमला कर भारत भारी नुकसान पहुंचा सकता है.

दूसरा है करा कैनाल प्राजेक्ट. चीन थाइलैंड को अपना मोहरा बनाकर करा कैनाल को विकल्प के तौर पर तैयार करना चाहता है, लेकिन भारत समेत क्वाड देशों के दबाव के बाद थाइलैंड ने भी यूटर्न ले लिया है और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है. यहां भी चीन को भारी झटका लगा है.

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तीसरा है CPEC. CPEC के जरिए ही बीजिंग सड़क और हाई वे के रास्ते ग्वादर पोर्ट से जुड़ा है, लेकिन ये रूट PoK से होकर गुजरता है. भारत हमेशा से इसका विरोध करता रहा है. अगर भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तो इस रूट पर भी हमला होगा. इस बीच चीन को जवाब देने के लिए ‘एशियाई नाटो’ की रूपरेखा भी जल्द ही तैयार होने वाली है.

ड्रैगन की चुनौती का सामना कर रहे दुनिया के चार बेहद शक्तिशाली देश अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री 6 अक्टूबर को टोक्यो में मिलेंगे. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी इस बैठक में शामिल होंगे. चारों देशों के नेताओं की ये मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब चीन महासागर से लेकर लद्दाख तक अपनी दादागीरी दिखा रहा है. ऐसे में ये मीटिंग बेहद अहम है और चीन के लिए सख्त संदेश भी.