CJI पर आरोप लगाने वाली शिकायतकर्ता महिला बोलीं, मैं किसी षडयंत्र का हिस्सा नहीं

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की आंतरिक समिति ने क्लीन चिट देते हुये कहा है कि उसे उनके खिलाफ कोई ‘‘ठोस आधार’’ नहीं मिला. 
CJI case, CJI पर आरोप लगाने वाली शिकायतकर्ता महिला बोलीं, मैं किसी षडयंत्र का हिस्सा नहीं

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश पर कथित यौन शोषण के आरोप लगाने वाली पूर्व सुप्रीम कोर्ट स्टाफ ने क्लीन चिट दिए जाने के बाद पहली बार स्पष्ट किया है कि उसने सर्वोच्च अदालत की गरिमा को धूमिल करने के लिए यह सब नहीं किया था. वो इस तरह की किसी भी षडयंत्र का हिस्सा नहीं है.

आरोप लगाने वाली महिला ने अपनी वकील वृंदा ग्रोवर से बात करते हुए कहा, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ किसी षडयंत्र का हिस्सा नहीं हूं. मेरा इस सर्वोच्च संस्था के लिए काफी सम्मान है. शीर्ष अदालत के सम्मान को बरकरार रखने के लिए ज़रूरी है कि ग़लत कार्यों में संलिप्त किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जाना चाहिए और उनके ख़िलाफ़ सख़्ता कार्रवाई होनी चाहिए. फिर चाहे वो भ्रष्टाचार का केस हो या यौन उत्पीड़न का.’

दरअसल पूर्व कर्मचारी ने अपने हलफनामे में दो घटनाओं का जिक्र किया था. दोनों ही घटनाएं कथित तौर पर अक्टूबर 2018 में हुईं. 36 वर्षीय इस महिला ने 19 अप्रैल को 22 जजों को यह शिकायत भेजी थी. 30 अप्रैल को जब तीन जजों की पैनल इस मामले की जांच कर रही थी तो शिकायतकर्ता सुनवाई से भाग गईं. जिसके बाद 6 मई को सीजेआई को क्लीन चिट दे दिया गया.

शिकायतकर्ता ने कहा, ‘हलफ़नामे में मैनें जो कुछ लिखा है वो मेरे जीवन का सच है कोई षडयंत्र नहीं. मैं षडयंत्र जैसे कई अफ़वाह सुन रही हूं. मैं इस तरह के आरोप से बहुत परेशान और असहज महसूस कर रही हूं. मेरे लिए डर की कोई बात नहीं है क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं किसी भी षडयंत्र का हिस्सा नहीं हूं. इस तरह की जो भी अफ़वाह है वो जान-बूझकर सुप्रीम कोर्ट की साख को गिराने की कोशिश का हिस्सा है.’

यौन उत्पीड़न के आरोपों से प्रधान न्यायाधीश को न्यायालय की आंतरिक समिति ने दी क्लीन चिट

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की आंतरिक समिति ने क्लीन चिट देते हुये कहा है कि उसे उनके खिलाफ कोई ‘‘ठोस आधार’’ नहीं मिला.

उच्चतम न्यायालय के सेक्रेटरी जनरल के कार्यालय की एक नोटिस में कहा गया है कि न्यायमूर्ति एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट ‘सार्वजनिक नहीं की जायेगी.’ समिति में दो महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी भी शामिल थीं.

समिति ने एकपक्षीय रिपोर्ट दी क्योंकि इस महिला ने तीन दिन जांच कार्यवाही में शामिल होने के बाद 30 अप्रैल को इससे अलग होने का फैसला कर लिया था. महिला ने इसके साथ ही एक विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी करके समिति के वातावरण को ‘‘बहुत ही भयभीत करने वाला’’ बताया था और अपना वकील ले जाने की अनुमति नहीं दिये जाने सहित कुछ आपत्तियां भी उठायी थीं.

इसके बाद, प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई भी एक मई को समिति के समक्ष पेश हुये थे और उन्होंने अपना बयान दर्ज कराया था.

नोटिस में कहा गया है कि आंतरिक समिति को शीर्ष अदालत के पूर्व कर्मचारी की 19 अप्रैल, 2019 की शिकायत में लगाये गये आरोपों में कोई आधार नहीं मिला.

इन्दिरा जयसिंह बनाम शीर्ष अदालत और अन्य के मामले में यह व्यवस्था दी गयी थी कि आंतरिक प्रक्रिया के रूप में गठित समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जायेगी. आंतरिक प्रक्रिया के अनुसार ही दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश ने यह रिपोर्ट स्वीकार की और इसकी एक प्रति संबंधित न्यायाधीश, प्रधान न्यायाधीश को भी भेजी गयी.

इस बीच, एक सरकारी सूत्र ने बताया कि न्यायमूर्ति एन वी रमण न्यायमूर्ति बोबडे के बाद वरिष्ठतम न्यायाधीश थे लेकिन रिपोर्ट उन्हें नहीं सौंपी गयी क्योंकि शुरू में वह भी इस समिति के सदस्य थे परंतु बाद में शिकायतकर्ता महिला की कुछ आपत्तियों के मद्देनजर वह इससे अलग हो गये थे.

सूत्रों ने बताया कि आंतरिक समिति की रिपोर्ट न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा को सौंपी गयी क्योंकि वह इस रिपोर्ट को प्राप्त करने के लिये सक्षम थे.

शीर्ष अदालत ने न्यायमूर्ति एस ए बोबडे की अध्यक्षता में 23 अप्रैल, 2019 को आंतरिक जांच समिति गठित की थी. न्यायमूर्ति रमण के इससे हटने के बाद समिति में न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी को शामिल किया गया था.

शीर्ष अदालत की एक पूर्व कर्मचारी ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुये उच्चतम न्यायालय के 22 न्यायाधीशों के आवास पर अपना हलफनामा भेजा था. इसके साथ ही इस हलफनामे के आधार पर 20 अप्रैल को कुछ समाचार पोर्टल ने खबर भी प्रसारित की थी.

ये आरोप सार्वजनिक होने के कुछ घंटों के भीतर ही प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने अप्रत्याशित रूप से इस मामले की सुनवाई की. इस पीठ में न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना भी शामिल थे.

प्रधान न्यायाधीश ने यौन उत्पीड़न के आरोपों को अविश्वसनीय बताया था और वह बीच में ही इस सुनवाई से अलग हो गये थे. उन्होंने कहा था कि इसके पीछे एक बड़ी साजिश है और वह इन आरोपों का खंडन करने के लिये भी इतना नीचे नहीं उतरेंगे.

न्यायमूर्ति बोबडे ने इस मामले पर 23 अप्रैल को पीटीआई से बातचीत में कहा था, ‘‘यह एक आंतरिक प्रक्रिया होगी, जिसमें पक्षों की तरफ से वकील की दलीलों पर विचार नहीं किया जाएगा। यह कोई औपचारिक न्यायिक कार्यवाही नहीं है.’’

सीजेआई के खिलाफ ये आरोप तब सामने आए थे जब 20 अप्रैल को कुछ न्यूज वेब पोर्टलों ने इस बाबत खबरें प्रकाशित की थी.

महिला ने कथित यौन उत्पीड़न के बारे में उच्चतम न्यायालय के 22 न्यायाधीशों को अपना हलफनामा भेजा था.

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