JNU में पढ़ाना जारी रखेंगी इतिहासकार रोमिला थापर, प्रशासन ने मंगवायी थी CV; जानिए क्या है विवाद

सोशल मीडिया पर एक वर्ग यूनिवर्सिटी प्रशासन के फैसले को नियमों के मुताबिक बता रहा है, जबकि एक धड़ा इसमें राजनीतिक साजिश देख रहा है.

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर से सीवी जमा करने को कहा है. प्रशासन के मुताबिक सीवी देखने के बाद तय किया जाएगा कि एमेरिटा प्रोफेसर के रूप में रोमिला थापर की सेवा कब तक जारी रखी जा सकती है. हालांकि उच्च शिक्षा सचिव आर सुब्रमण्यम ने स्पष्ट किया है कि किसी भी एमेरिटस प्रोफेसर की जेएनयू में स्थिति नहीं बदली जाएगी और वो पढ़ाना जारी रखेंगे.

आर सुब्रमण्यम ने ट्विटर पर लिखा, ‘जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के उप कुलपति से प्रोफेसर एमेरिटस के विवाद को लेकर चर्चा हुई है. किसी भी प्रोफेसर एमेरिटस खासकर सम्मानित अकादमिकों की अकादमिक स्थिति में बदलाव नहीं किए जाएंगे.’

बता दें कि जेएनयू के रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने पिछले महीने थापर को पत्र लिखकर उनसे सीवी जमा करने को कहा गया था. पत्र में लिखा था कि विश्वविद्यालय एक समिति का गठन करेगी जो थापर के कामों का आकलन करेगी और फैसला करेगी कि थापर को प्रोफेसर एमेरिटस के तौर पर जारी रखना चाहिए या नहीं.

प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर इमेरिटस प्रोफेसर के तौर पर जेएनयू से साल 1993 से ही जुड़ी हैं. प्राचीन इतिहास के क्षेत्र में अहम योगदान देने वालीं रोमिला थापर का कहना है कि वह इमेरिटस के तौर पर जुड़े रहने के लिए यूनिवर्सिटी को बायोडेटा नहीं देना चाहतीं. उन्होंने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा, ‘यह स्टेटस जीवन भर के लिए दिया गया है. जेएनयू प्रशासन मुझसे सीवी मांगने के लिए बेसिक्स के खिलाफ जा रहा है.’

इस मामले पर जवाहरलाल नेहरू शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन का रोमिला थापर से सीवी मांगने का फैसला राजनीतिक रूप से प्रेरित है. ज़ाहिर है कि इतिहासकार रोमिला थापर पर केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करने का आरोप लगता रहा है.

जेएनयू के कई वरिष्ठ शिक्षकों ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा कि कभी भी किसी एमेरिटस प्रोफेसर से सीवी जमा करने को नहीं कहा गया है. वहीं कुछ शिक्षकों ने कहा कि एक बार चुने जाने के बाद इस पद पर शैक्षिक जीवनभर बना रहता है.

अध्यादेश के मुताबिक, विश्वविद्यालय के लिए यह जरूरी है कि वह उन सभी को पत्र लिखे जो 75 साल की उम्र पार कर चुके हैं ताकि उनकी उपलब्धता और विश्वविद्यालय के साथ उनके संबंध को जारी रखने की उनकी इच्छा का पता चल सके. पत्र सिर्फ उन प्रोफेसर एमेरिटस को लिखे गए हैं जो इस श्रेणी में आते हैं.

विश्वविद्यालय ने कहा है कि पत्र उनकी सेवा को खत्म करने के लिए नहीं जारी किया गया है.

थापर ने भी इस बात की पुष्टि की कि उन्हें जुलाई में पत्र मिला था और उन्होंने इसका जवाब दिया है, “यह जीवन भर का सम्मान है.” उन्होंने और जानकारी नहीं दी.

जेएनयूटीए ने कहा कि रोमिला थापर से सीवी मांगना जानबूझकर उन लोगों को बेइज्जत करने का प्रयास है जो वर्तमान प्रशासन के आलोचक हैं. जेएनयूटीए ने इस मुद्दे को लेकर थापर के लिए व्यक्तिगत माफी जारी करने की भी मांग उठाई. साथ ही कहा कि प्रोफेसर थापर का अपमान राजनीतिक रूप से प्रेरित एक और कदम है.

रोमिला थापर से सीवी मांगे जाने की सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा हो रही है. यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस फैसले पर तंज कसते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा, ‘मैं जानता हूं कि जसप्रीत बुमराह एक अच्छे गेंदबाज हैं. लेकिन अब तक उनका सीवी नहीं देखा है.’

क्या है नियम
जेएनयू के अकैडमिक रूल्स ऐंड रेगुलेशंस के नियम संख्या 32 (G) के मुताबिक, ‘इमेरिट्स प्रफेसर की 75 वर्ष की आयु पूर्ण होने के बाद उनकी नियुक्ति करने वाली अथॉरिटी एग्जिक्युटिव काउंसिल यह रिव्यू करेगी कि क्या उन्हें आगे सेवा विस्तार देना चाहिए या नहीं. यह संबंधित प्रफेसर के स्वास्थ्य, इच्छा, उपलब्धता और यूनिवर्सिटी की जरूरतों के आधार पर तय होगा. एग्जिक्युटिव काउंसिल को एक एक सब-कमिटी का गठन करना होगा, जो हर प्रफेसर इमेरिट्स से बात करेगी. हर केस का वह बातचीत, नया सीवी मंगाकर और समकक्षों की राय आदि से परीक्षण करेगी. यह कमिटी अपनी सिफारिशें काउंसिल को भेजेगी जो प्रफेसर के सेवा विस्तार पर फैसला लेगी.’