आखिर कब दूर होगी बेसब्री…जस्टिस मुरलीधर पर ‘हिट विकेट’ हो गई कांग्रेस?

राजनीति में विरोध की इजाजत होती है. कांग्रेस को भी इस बात का अधिकार है. लेकिन विरोध के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राजनीतिक पार्टियों को संस्थाओं की गरिमा का भी ख्याल रखना होता है.
Justice Muralidhar controversy, आखिर कब दूर होगी बेसब्री…जस्टिस मुरलीधर पर ‘हिट विकेट’ हो गई कांग्रेस?

दिल्ली को किसने जलाया? दिल्ली की हिंसा के लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं? कहां-कहां चूक हुई, जिनकी वजह से दिल्ली जलने लगी? ऐसे सारे सवालों का जवाब हमारी जांच एजेंसियां और दिल्ली पुलिस तलाश रही हैं. इन सवालों पर दिल्ली हाईकोर्ट की भी नजर है. देर-सबेर पूरा सच सामने आना ही है. लेकिन कांग्रेस की बेसब्री एक बार फिर उनकी फजीहत करा गई.

मामला था जस्टिस एस मुरलीधर के ट्रांसफर का. दिल्ली हाईकोर्ट में दिल्ली हिंसा की सुनवाई कर रहे जस्टिस का ट्रांसफर क्या हुआ, राहुल से लेकर प्रियंका तक सियासत के मैदान में कूद पड़े. कुछ इस तरह से जैसे उनके हाथ कितना बड़ा मुद्दा लग गया हो. बगैर ये देखे हुए कि आखिर इस ट्रांसफर की पृष्ठभूमि क्या है?

Justice Muralidhar controversy, आखिर कब दूर होगी बेसब्री…जस्टिस मुरलीधर पर ‘हिट विकेट’ हो गई कांग्रेस?

कांग्रेस ने 12 फरवरी की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को देखने, समझने और पढ़ने की जरूरत ही नहीं समझी. जबकि उसमें सिर्फ जस्टिस एस मुरलीधर के पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में ट्रांसफर की बात ही नहीं है, बल्कि दो और जजों के ट्रांसफर की भी सिफारिश है. जस्टिस रंजीत वी मोरे को बॉम्बे हाईकोर्ट से मेघालय और जस्टिस रवि विजयकुमार को कर्नाटक हाईकोर्ट से उत्तराखंड हाईकोर्ट में ट्रांसफर की सिफारिश है.

दो हफ्ते पहले ही लिया जा चुका था फैसला

सबसे खास बात ये कि जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर का फैसला न सिर्फ दो हफ्ते पूर्व लिया जा चुका था, बल्कि ये ट्रांसफर कंसेंटेड यानी सहमति से हुआ था.
लेकिन कांग्रेस ने ट्रांसफर की अगली सुबह को अपने लिए राजनीति की नई सुबह मान ली. राहुल और प्रियंका गांधी ने इसके लिए केंद्र सरकार को लपक कर घेरा. पार्टी के प्रधान प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी बड़ी तेजी दिखाई.

प्रियंका ने सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के फैसले को नजरअंदाज कर मुरलीधर के ट्रांसफर पर कहा, “मौजूदा हालात को देखते हुए जस्टिस मुरलीधर का आधी रात में किया गया ट्रांसफर चौंकाने वाला तो नहीं है लेकिन ये दुखद और शर्मनाक है.”

प्रियंका ने इसके साथ ही न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे की दुहाई भी दी. लेकिन उनसे भी बहुत आगे राहुल गांधी निकल गए. राहुल ने ट्वीट में लिखे तो 10 शब्द भी नहीं, लेकिन जज लोया की बात कर बेहद विवादित और गंभीर इशारे जरूर कर दिए. राहुल शायद भूल गए कि जज लोया की मौत को लेकर जो आरोप लगे थे वे सारे बेबुनियाद निकले. ऐसे में उन्होंने जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर पर सरकार को घेरने के लिए जिस तरह से लोया का इस्तेमाल किया उस पर सवाल जरूर रहेंगे.

इससे पहले कांग्रेस के प्रधान प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने तो सुबह-सबेरे ही बगैर देर किए ट्वीट किया. सुरजेवाला ने लिखा, “26 फरवरी की सुबह दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस मुरलीधर की खंडपीठ ने हिंसा फैलाने के जिम्मेदार बीजेपी नेताओं पर FIR ना दर्ज करने के लिए फटकार लगाई. इसके साथ ही जस्टिस मुरलीधर के दिल्ली हाईकोर्ट से तबादले के आदेश जारी हो गए. काश, इसी मुस्तैदी से दंगाइयों को पकड़ा होता.”

इतने से भी काम पूरा नहीं हुआ, तो कांग्रेस के प्रधान प्रवक्ता मीडिया के सामने आए और केंद्र सरकार को खूब खरी-खरी सुनाई. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के फैसले को सुरजेवाला ने पूरी तरह से राजनीति के रंग में रंग दिया. सुबह-सुबह पहली बार सुरजेवाला के ये सवाल पहली नजर में जायज भी लगे. क्योंकि उन्होंने दो बड़े तथ्यों को छुपा लिया या फिर जिन पर वे ध्यान देने से चूक गए. ये दो तथ्य थे-

  1. जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर का फैसला पुराना और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का था.
  2. जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर का फैसला सहमति से लिया गया था.

यानी कांग्रेस का ये कहना न सिर्फ सरासर हास्यास्पद लगता है बल्कि झूठ भी कि जस्टिस मुरलीधर को रातों-रात दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में भेज दिया गया.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 12 फरवरी को ही उनके ट्रांसफर की सिफारिश की थी. उसी सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने सीजीआई बोबडे की सलाह पर जस्टिस एस मुरलीधर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में प्रभार संभालने का निर्देश दिया. 12 फरवरी की सिफारिश के आधार पर ही इसकी अधिसूचना कल जारी की गई. लेकिन राजनेताओं की यही जल्दबाजी कई बार खुद उनका मजाक बना देती है.

केस पर ट्रांसफर का असर नहीं

अब रही बात केस पर मुरलीधर के ट्रांसफर के असर की तो जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर के बाद उनकी पीठ से संबंधित सभी मामले खुद-ब-खुद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हाईकोर्ट को रेफर हो गए हैं. ऐसी स्थिति में दिल्ली पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल की अध्यक्षता वाली पीठ ही आगे सुनवाई के लिए भेजेगी.

कॉलेजियम के फैसले के बाद केंद्र का रोल ही क्या?

इसके बाद दूसरा सवाल केंद्र की भूमिका पर उठ रहे सवालों को लेकर है. तो सच यही है कि हाईकोर्ट के जजों के ट्रांसफर के मामले में केंद्र सरकार की भूमिका सीमित ही रहती है. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सिफारिश करता है, तो केंद्र सरकार या कानून मंत्रालय के पास सीमित विकल्प ही होते हैं. सरकार सिर्फ एक बार उस ट्रांसफर की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को वापस भेज सकती है. अगर कॉलेजियम उस जज के ट्रांसफर की दोबारा सिफारिश करता है, तो सरकार उसे फिर से वापस नहीं भेज सकती.

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के फैसले पर सवाल उठे, तो केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जवाब दिया. अपने ट्वीट में रविशंकर प्रसाद ने न्यायपालिका में दखल के कांग्रेस के इतिहास की भी याद दिलाई.

राजनीति अपनी जगह है. लेकिन इतना तो तय है कि जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर की सिफारिश 12 फरवरी को ही हो गई थी और सहमति से हुई थी. ऐसे में कुछ सवाल कांग्रेस के लिए बनते जरूर हैं…

  • क्या सवाल उठाते हुए प्रियंका गांधी आधे तथ्यों को नजरअंदाज कर रही हैं?
  • क्या प्रियंका को 12 फरवरी की कॉलेजियम की सिफारिश के बारे में नहीं पता?
  • क्या जज लोया की ओर इशारा कर राहुल न्यायपालिका पर सवाल नहीं उठा रहे?
  • क्या राहुल को नहीं पता कि जज लोया केस में लगाए गए आरोप बेबुनियाद निकले थे?
  • जस्टिस मुरलीधर के ट्रांसफर पर सवाल उठाकर क्या हम सुप्रीम कोर्ट पर सवाल नहीं उठा रहे?
  • अपनी राजनीति के लिए न्यायपालिका पर सवाल उठाना क्या देशहित में है?

राजनीति में विरोध की इजाजत होती है. कांग्रेस को भी इस बात का अधिकार है. लेकिन विरोध के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राजनीतिक पार्टियों को संस्थाओं की गरिमा का भी ख्याल रखना होता है. कांग्रेस जल्दबाजी में इस बात को भूल गई. शायद यही वजह रही कि जिस मुद्दे को पार्टी ने सुबह-सबेरे जोर-शोर से उठाया, शाम होते-होते उस पर अपने सुर मंद कर लिए.

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