शिक्षा नीति का ड्राफ्ट बदलकर हिंदी की अनिवार्यता खत्म, पहले भी हो चुका है भाषा पर बवाल

नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट सामने आया तो हिंदी पर हंगामा मच गया. अब सरकार बैकफुट पर आ गई है. पहले भी ऐसा हो चुका है जब सरकारों को हिंदी के मामले में घुटने टेकने पड़े हैं.

शिक्षा नीति पर देश में चर्चा ज़ोरों पर है. अगर नई शिक्षा नीति लागू हुई तो हिंदी नहीं बोलनेवाले राज्यों को भी अपनी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेज़ी के साथ हिंदी को शामिल करना पड़ेगा. वैसे अभी सिर्फ मसौदा सामने आया था लेकिन दक्षिण में इतने भर से हिंदी का विरोध शुरू हो गया. सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग लिस्ट में देखते ही देखते #StopHindiImposition हैशटैग शामिल हो गया, जिसका मतलब है- हिंदी को थोपना बंद करो.

पिछली एनडीए सरकार में प्रकाश जावडेकर ने बतौर मानव संसाधन विकास मंत्री कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन की अगुवाई में एक पैनल गठित किया था. अब उसी ने नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट सरकार को सौंपा है. कई बातों के अलावा इसमें तीन भाषाओं वाला फॉर्मूला भी है जो 1960 से ही विचार-विमर्श का केंद्र रहा है. सरकार की सोच इस फॉर्मूले के पीछे यही रही कि बच्चों को यदि हिंदी पढ़ाई जाएगी तो एक दिन अंग्रेज़ी की जगह उसे ही लिंक भाषा बनाया जा सकेगा. हालांकि अब सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है और वो कह चुकी है कि उसका इरादा वैसा नहीं जैसा अनुमान लगाया जा रहा है.

दरअसल ये फॉर्मूला हमेशा ही मतभेदों को बढ़ाता रहा है. तमिलनाडु में तो इसका ज़ोरदार विरोध होता ही है. हर राज्य सरकार ने हमेशा तर्क रखा है कि संविधान के अनुसार शिक्षा राज्यसूची का विषय है और दो भाषा नीति (अंग्रेज़ी और तमिल) छात्रों को इस बात की आज़ादी देती है कि वो तीसरी भाषा सीखना चाहता है या नहीं.

भाषा को लेकर विवाद देश में पुराना है. इसकी शुरूआत तब हुई थी जब देश की संविधान सभा ने साल 1949 में हिंदी को देश की राजभाषा का दर्जा दिया था. जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ उसी दिन हिंदी को भी लागू होना था लेकिन आज़ादी से पहले सारा सरकारी कामकाज अंग्रेज़ी में हो रहा था. ऐसे में हिंदी को लाकर अंग्रेज़ी को तुरंत हटाना व्यवहारिक नहीं माना गया. इसका तोड़ निकला कि पंद्रह साल का ग्रेस पीरियड दिया जाए और अंतत: 26 जनवरी 1965 को हिंदी को राजभाषा के तौर पर लागू किया जाए.

हिंदी भाषी राज्यों को इससे खास समस्या नहीं थी लेकिन असली संकट तमिलनाडु जैसे राज्यों का था जो या तो तमिल बोलता था या फिर अंग्रेज़ी में काम करता था. ऐसे में हिंदी भी सीखना उन्हें तमिल भाषा को रिप्लेस करने जैसा लगा. दक्षिण भारत में बहुत सारे नेता साफ-साफ इसके खिलाफ थे कि हिंदी राजभाषा बने. प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब भारत-नेहरू के बाद में लिखते हैं कि 1965 में एकेडमी ऑफ तमिल कल्चर ने एक प्रस्ताव पास किया. इसमे मांग रखी गई कि केंद्र और राज्यों के बीच और एक राज्य से दूसरे राज्यों के बीच होनेवाले पत्राचार में अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रखना चाहिए. इस प्रस्ताव पर सी एन अन्नादुरई, ई वी रामास्वामी पेरियार और सी राजगोपालाचारी ने दस्तखत किए. अभियान को फैलाने का ज़िम्मा डीएमके ने संभाला.

डीएमके के सर्वोच्च नेता अन्नादुरई का मानना था कि हिंदी किसी भी दूसरी भाषा की तरह एक क्षेत्रीय भाषा ही है. इसकी कोई खास विशेषता नहीं थी बल्कि यह कई भारतीय भाषाओं में से भी पिछड़ी हुई थी. जब उनके सामने तर्क रखा गया कि हिंदी देश में सबसे ज़्यादा बोली जाती है तो अन्ना ने जवाबी दलील दी कि अगर संख्याबल ही पैमाना है तो मोर की जगह कौए को देश का राष्ट्रीय पक्षी बना देना चाहिए.

1965 का गणतंत्र दिवस आने से पहले ही पीएम नेहरू का निधन हो गया और हिंदी प्रेमी शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने. उधर 15 अगस्त 1965 से दस दिन पहले ही अन्नादुरई ने शास्त्री को खत लिखकर कहा कि उनका दल हिंदी को लागू किए जाने का दिन शोक दिवस के तौर पर मनाएगी. उधर केंद्र सरकार हिंदी लागू करने पर अड़ी थी. डीएमके भड़क गई. राज्यभर में बंद हुआ. हिंदी के पुतले जलाने की होड़ लग गई. हिंदी किताबों की होली जली. हिंदी से संबंधित संविधान के पन्ने तक जले. सरकारी इमारतों से हिंदी में लिखे बोर्ड काले पोत डाले गए. लोग भी घरों से निकले और जुलूस, धरना, हड़ताल तक सब कुछ हुआ. स्थिति इतनी गंभीर बनी कि पुलिस के सामने गुस्साए छात्र आ गए.

मद्रास में दो लोगों ने गणतंत्र दिवस पर खुद को आग लगाकर जान दे दी. 3 दिन बार तिरुची में बीस साल के युवक ने कीटनाशक खाकर जान दे दी. इन सभी ने सुसाइड नोट में वजहें साफ लिखी थीं.

तमिलनाडु में उत्तेजना फैल गई. हड़तालों और बहिष्कार के कार्यक्रमों ने ज़ोर पकड़ लिया. आम लोगों की पुलिस से भिड़ंत और पुलिस के शक्तिप्रदर्शन ने मौत का आंकड़ा और बढ़ाया. शास्त्री सरकार को अंदाज़ा नहीं था कि हिंदी विरोध इतना व्यापक और गंभीर है. खुद कांग्रेस में एक तरफ पार्टी के अध्यक्ष कामराज से लेकर संजीवा रेड्डी तक हिंदी को इस तरह लागू करने के खिलाफ थे तो मोरारजी देसाई एकदम उलट पक्ष में खड़े थे.

हिंदी के ज़ोरदार पक्षधर लेकिन देश में शांति स्थापित करने के मुख्य ज़िम्मेदार पीएम शास्त्री को फैसला करना था. उन्होंने समझ लिया कि दूसरे पक्ष को भी सुनना चाहिए. इस बीच मद्रास से उनके ही दो केंद्रीय मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया. 11 फरवरी को इन इस्तीफों के बाद वो ऑल इंडिया रेडियो के ज़रिए लोगों को समझा रहे थे कि पंडित नेहरू के उस वादे का वो सम्मान करते हैं जिन्होंने अंग्रेज़ी की निरंतरता की बात कही थी. उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी तब तक जारी रहेगी जब तक लोग चाहेंगे. इस मौके पर देश को पांच आश्वासन दिए गए-

पहला- हर प्रांत को हक होगा कि वो अपनी पसंद की क्षेत्रीय भाषा ये अंग्रेज़ी में कामकाज कर सकता है.

दूसरा- एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच पत्राचार या तो अंग्रेज़ी में होगा या किसी क्षेत्रीय भाषा के साथ उसका प्रामाणिक हिंदी अनुवाद किया जाएगा.

तीसरा- गैर-हिंदीभाषी राज्य स्वतंत्र होंगे कि वो केंद्र के साथ अपना पत्राचार अंग्रेज़ी में जारी रखें. इसमें कोई बदलाव तब तक नहीं होगा जब तक गैर-हिंदीभाषी राज्यों से सहमति ना ले ली जाए.

चौथा- केंद्र सरकार के स्तर पर कामकाज की भाषा अंग्रेज़ी ही रहेगी.

पांचवां- अखिल भारतीय स्तर पर सिविल सेवा परीक्षाएं सिर्फ हिंदी में ना होकर अंग्रेज़ी में ही जारी रहेंगी.

घोषणाओं के बावजूद देश में बहस जारी रही. हफ्ते भर बाद संसद बैठी तो पूरे मुल्क ने वो तर्क सुने जो हिंदी प्रेमी और हिंदी विरोधी दे रहे थे. हिंदी लागू करने के हिमायती दूसरों को संविधान विरोधी ठहरा रहे थे. उनका कहना था कि हिंसा के डर से सरकारें पीछे हटती रहीं तो ऐसी मांगें विकराल रूप धारण कर लेंगी. हिंदी विरोधी कह रहे थे कि ‘हिंदी दैत्य’ के सामने पहले ही तमिल जनता बहुत कुर्बानियां दे चुकी है.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि पंडित नेहरू भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के खिलाफ थे जबकि शास्त्री इस बात के कायल थे कि संघ की एकमात्र राजभाषा हिंदी हो, लेकिन जब बड़े पैमाने पर इसका विरोध शुरू हुआ और लोग अपनी जान देने पर उतारू हो गए तो दोनों प्रधानमंत्री पुनर्विचार करने पर मजबूर हो गए. सन 1953 में पोट्टी श्रीरामलू और 1965 में करीब दर्जनभर तमिल युवाओं के जान देने की घटना कुछ ऐसी ही बातें थीं. ताज्जुब की बात ये थी कि दोनों ही मामलों में कांग्रेस संगठन, अपने सरकार की तुलना में विपक्ष के साथ ज़्यादा खड़ा दिख रहा था.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *