इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और सरकार आमने-सामने

सरकार ने चुनाव आयोग की चिंता को किया दरकिनार, आयोग के पक्ष से जतायी असहमति

नई दिल्ली: राजनीतिक चंदे के लिए केंद्र की तरफ से लायी गयी इलेक्टोरल बॉन्ड्स योजना को लेकर चुनाव आयोग और सरकार मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में आमने-सामने आ गए.

आयोग ने सर्वोच्च अदालत से कहा कि इस योजना से राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जबकि सरकार ने इस कदम को कालेधन के खिलाफ अस्त्र और पारदर्शिता को सबसे बेहतर करने वाला बताया. सरकार ने कहा कि भारत दुनिया भर के देशों के बीच तय होने वाली भ्रष्टाचार सूची में 2012 में 94वें स्थान पर था. 2018 में जब यह सूची जारी की गई तो भारत की स्थिति में सुधार आया और वह 78वें स्थान पर पहुंच गया.

इलेक्टोरल बॉन्ड लाए जाने के बाद महज 2000 रुपये तक की राशि ही बिना आधिकारिक सूचना दर्ज कराए किसी राजनीतिक दल को मुहैया कराई जा सकती है. वित्त विधेयक 2017 में संशोधन किया गया और प्रावधान किया गया कि दो हजार से ऊपर की राशि का भुगतान बैंक चेक या डिमांड ड्राफ्ट के जरिए या फिर इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए किया जाएगा.

चंदे का रिकॉर्ड भी
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि राजनीतिक दलों को इन प्रावधानों के तहत चंदे का रिकॉर्ड भी तैयार करना होता है. कोई भी व्यक्ति, जो राजनीतिक दल को चंदा देना चाहता है, वह इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सिस्टम, डिमांड ड्राफ्ट और चेक के जरिए खरीद सकता है. राजनीतिक दलों को बीस हजार से ज्यादा का चंदा स्वीकार करने के साथ देयकर्ता का नाम, पता और पैनकार्ड दर्ज करना पड़ता है.

राजनीतिक चंदे के नाम पर न हो उगाही
हलफनामे में केंद्र ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड से यह भी सुनिश्चित किया गया कि कोई भी फर्जी दल राजनीतिक चंदे के नाम पर उगाही न कर सके. साथ ही राजनीतिक दल प्राप्त करने वाले चंदे और इलेक्टोरल बॉन्ड की राशि का खुलासा करे, इसकी व्यवस्था की गई. इस योजना के जरिए राजनीतिक दलों और चंदा देने वालों की जवाबदेही तथा पारदर्शिता को सही दिशा देने का कदम उठाया गया. इसके जरिए चुनावी भ्रष्टाचार से निपटने का प्रभावी तंत्र विकसित किया गया.

पारदर्शिता पर पड़ता है प्रभाव
सरकार चुनाव आयोग की ओर से इस मुद्दे पर जतायी गई चिंता से पूरी तरह असहमत है. गत सप्ताह आयोग ने सरकार से असहमति जताते हुए कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड योजना से राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है. आयोग ने तब हलफनामे में कहा था कि आयोग ने मई 2017 में ही इस मामले को लेकर चिंता व्यक्त की थी. उसने कहा था कि विदेशी योगदान नियमन कानून‘ में संशोधन के केंद्र के फैसले पर चुनाव आयोग ने कहा कि इससे भारत में राजनीतिक दलों को अनियंत्रित विदेशी फंडिंग की अनुमति मिलेगी. इससे भारतीय नीतियां विदेशी कंपनियों से प्रभावित हो सकती हैं.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट गैर-सरकारी संगठनों और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) द्वारा दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई करने की प्रक्रिया में है. याचिकाकर्ताओं ने राजनैतिक दलों को मिलने वाले चंदे संबंधित कानूनों में सरकार द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर किए गए संशोधन की वैधता को चुनौती दी है.