बद्रीनाथ की आरती बदरुद्दीन ने लिखी या बर्थवाल ने, BJP सरकार के इस फैसले से छिड़ी बहस

भाजपा सरकार की घोषणा से पहले ऐसा माना जाता था कि फखरुद्दीन सिद्दीकी नाम के एक पोस्टमैन ने यह आरती लिखी थी.

नई दिल्ली: उत्तराखंड के बद्रीनाथ में इन दिनों इस बात पर चर्चा छिड़ी हुई है कि ‘पवन मंद सुगंध शीतल’ आरती किसने लिखी है. आरती को लिखे 100 साल से अधिक का समय बीत चुका है. बद्रीनाथ धाम के पुजारी और यहां के स्थानीय निवासी भी इसी चर्चा में व्यस्त हैं. दरअसल, पिछले महीने उत्तराखंड सरकार द्वारा की गई एक घोषणा से मामले ने तुल पकड़ लिया है. भाजपा सरकार ने कहा है कि बद्रीनाथ आरती धान सिंह बर्थवाल नाम के एक स्थानीय निवासी ने लिखी है.

भाजपा सरकार की इस घोषणा से पहले ऐसा माना जाता था कि फखरुद्दीन सिद्दीकी नाम के एक पोस्टमैन ने यह आरती लिखी थी. बताते हैं कि चमौली जिले के नंदप्रयाग के रहने वाले सिद्धिकी ने 1860 में यह आरती लिखी थी. सिद्दीकी भगवान बद्री के भक्त थे, बाद में लोग उन्हें ‘बदरुद्दीन’ कहने लगे थे.

‘बदरुद्दीन के परिवार के पास नहीं है सबूत’
धान सिंह बर्थवाल के परपोते महेंद्र सिंह बर्थवाल प्रशासन के पास आरती की हस्तलिपि के साथ पहुंचे. इस हस्तलिपी का कार्बन डेटिंग टेस्ट किया गया. इसके बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ऐलान किया कि यह हस्तलिपि 1881 की है, जब यह आरती चलन में आई थी. बदरुद्दीन का परिवार ऐसा कोई सबूत दे नहीं सका, इसलिए बर्थवाल परिवार के दावों को सच माना गया है.

1889 में प्रकाशित एक किताब में यह आरती छपी है. बदरुद्दीन के रिश्तेदार को इस किताब का संरक्षक बताया गया है. किताब अल्मोड़ा के एक संग्रहालय में रखी हुई है. संग्रहालय के मालिक जुगल किशोर पेठशाली का कहना है, ‘अल-मुश्तहर मुंसी नसीरुद्दीन को किताब का संरक्षक बताया गया है जो हिंदू धर्म शास्त्र स्कंद पुराण का अनुवाद है और इसके आखिरी पन्ने में आरती लिखी है.’

‘प्रकाशित किताब के दावों को किया जा रहा नजरअंदाज’
इसे देखते हुए विशेषज्ञों ने राज्य सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं. इनका कहना है कि सरकार एक प्रकाशित किताब के दावों को नजरअंदाज करते हुए कार्नब डेटिंग पर विश्वास कर रही है. आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर एएस मौर्या का कहते हैं कि डेटिंग टेस्ट में मिले नतीजों से असली उम्र 80 साल तक आगे-पीछे हो सकती है. यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि बर्थवाल हस्तलिपि 1881 में ही लिखी गई थी.

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