“मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे… “, पढ़ें राहत इंदौरी के मशहूर शेर

जाने माने शायर राहत इंदौरी (Rahat Indori) अब हमारे बीच नहीं रहे. उनके शेर जितने मशहूर थे, उतना ही शेर कहना का उनका अंदाज. ज्यादतर लोग तो उनका अंदाज देख कर ही खुश हो जाया करते थे.

Famous Shayari of Rahat Indori, “मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे… “, पढ़ें राहत इंदौरी के मशहूर शेर

देश के जाने माने शायर राहत इंदौरी (Rahat Indori) अब हमारे बीच नहीं रहे. सोमवार को वे कोरोना (Coronavirus) से संक्रमित पाए गए थे और उनका इलाज ऑरबिंदो हॉस्पिटल में चल रहा था.

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राहत इंदौरी का जन्म सोनकछ देवास में 1 जनवरी 1950 को हुआ था. कहा जाता है कि राहत इंदौरी वो शायर थे, जो अवाम के दिल का हाल अवाम की जबान में ही कहते थे. राहत इंदौरी के शेर जितने मशहूर थे, उतना ही शेर कहना का उनका अंदाज. ज्यादतर लोग तो उनका अंदाज देख कर ही खुश हो जाया करते थे.

राहत इंदौरी की कुछ मशहूर शायरी… 

  • “हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
    कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते”

 

  • “अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे​
    फिर भी मशहूर है शहरों में फ़साने मेरे​
    ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे​
    अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे” 

 

  • “मैं मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
    लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना।
    शाख़ों से टूट जाएँ, वो पत्ते नहीं हैं हम
    आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे”

 

  • मेरे हुजरे में नहीं , और कहीं पर रख दो,
    आसमां लाये हो ले आओ , जमीं पर रख दो !
    अब कहाँ ढूड़ने जाओगे , हमारे कातिल ,
    आप तो क़त्ल का इल्जाम , हमी पर रख दो !
    उसने जिस ताक पर , कुछ टूटे दिये रखे हैं ,
    चाँद तारों को ले जाकर , वहीँ पर रख दो !
    दो गज ही सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है,
    ऐ मौत तूने मुझको ज़मींदार कर दिया !
    नयी हवाओं को सौहबत बिगाड़ देती है,
    कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है !
    वो जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते,
    सज़ा न देकर अदालत बिगाड़ देती है !मिलाना चाहा है जब भी इंसा को इंसा से
    तो सारे काम सियासत बिगाड़ देती है !
    सियासत में जरुरी है रवादारी समझता है ,
    वो रोज़ा तो नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है !अन्दर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गये ,
    जितने शरीफ़ लोग थे सब खुलके आ गये !
    सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवकूफ ,
    सारे सिपाही मोम के थे सब घुल के आ गये !!

 

  • “अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है
    जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगेजुबां तो खोल,
    नजर तो मिला, जवाब तो दे
    मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे
    फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
    इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो”

 

  • “आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
    ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो
    उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है
    बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूं
    बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
    जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं”

 

  • “किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है
    आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन हैये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था
    मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला थामेरा नसीब, मेरे हाथ कट गए वरना
    मैं तेरी माँग में सिन्दूर भरने वाला था”

 

  • “रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
    चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता हैएक दीवाना मुसाफ़िर है मिरी आँखों में
    वक़्त-बे-वक़्त ठहर जाता है चल पड़ता हैअपनी ताबीर के चक्कर में मिरा जागता ख़्वाब
    रोज़ सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है

    रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं
    रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है

    उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
    धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है”

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