भुट्टे का रियलिटी टेस्ट… जानिए क्या है APMC मंडियों और MSP का गणित

आज आपको हम उन बिचौलियों की लूट बताएंगे जिन्हें किसानों पर अपना कब्जा कमजोर होता नजर आ रहा है. जिसकी वजह से प्रधानमंत्री तक को सामने आना पड़ा है.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 11:57 pm, Tue, 29 September 20
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कृषि कानून के खिलाफ जारी है किसानों का प्रदर्शन

हम सदियों से सुनते आए हैं कि किसान जो सामान 2 रुपये में बेचता है.. वो हमें 20 रुपये में मिलता है लेकिन इस गलती को सुधारने की कोशिश किसी सरकार ने नहीं की.अब सरकार ने इनकी सुध ली है. तो कुछ लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया है.

जबकि ये नहीं बता रहे कि जो सामान आपको सस्ते में जो मिलना था वो क्यों नहीं मिल रहा. आज की देश की ये सबसे बड़ी फिक्र है कि अगर केंद्र सरकार के तीन कानूनों से हमें फायदा होता है और आपको फायदा होता है तो आखिर इससे परेशानी किसको है?

आज आपको हम उन बिचौलियों की लूट बताएंगे जिन्हें किसानों पर अपना कब्जा कमजोर होता नजर आ रहा है. जिसकी वजह से प्रधानमंत्री तक को सामने आना पड़ा है. जिस कानून को देश में सबसे लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी ने अपने मुख्यमंत्रियों को लागू ना करने को कहा है.

ये सबकी फिक्र है

आज देश में 6 दिन से किसानों का प्रदर्शन चल रहा है. किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के रेल रोको आह्वान पर अमृतसर में प्रदर्शन हो रहा है लेकिन ये बहुत व्यापक स्तर पर नहीं दिख रहा है. क्योंकि इसकी वजह ये है कि देश की APMC मंडियों से सिर्फ 6 फीसदी किसानों को फायदा होता है, और वो भी बड़े किसानों को. लेकिन ये बात समझनी जरूरी है कि इस वक्त देश का हर नागरिक या तो किसान और कंज्यूमर दोनों है या फिर सिर्फ कंज्यूमर है.

यानी ये सिर्फ 58 परसेंट किसानों की फिक्र नहीं है. सिर्फ खेत और खलिहान की फिक्र नहीं है. सिर्फ ट्रैक्टर और धान की फिक्र नहीं है.बल्कि ये देश की हर जनता की फिक्र है, आपकी-हमारी सबकी फिक्र है.

किसानों की फिक्र बड़ी इसलिए हो जाती है, क्योंकि वो अपने खेतों में अन्न तो उगाता है.लेकिन एक तरफ तो वो उसी अन्न का अपने खाने में इस्तेमाल करता है. और उसे ही बेचकर अपना परिवार चलाता है खेती करता है.

जबकि दूसरी तरफ वो वर्ग है जो किसी दूसरे माध्यम से पैसे कमाता है,और पेट भरने के लिए रसोई का सामान खरीदकर घर ले आता है. लेकिन आपके दिल को ये जानकर तगड़ी चोट लगेगी कि कंज्यूमर और किसान दोनों की ही जमापूंजी पर डाका डाला जा रहा है.

भारत में अगर कोई 100 रुपये का आटा खरीदता है तो किसान को इसमें से सिर्फ 10 रुपये ही पाता है. जबकि अमेरिका में किसान को 80 रुपये जाता है. हिंदुस्तान में बिचौलिए 90 रुपये तक खा जाते हैं.

जबकि अमेरिका में 19 रुपये से 36 रुपये का मुनाफा कमाते हैं. इसीलिए यूरोप के किसान ज्यादा खुशहाल हैं.क्योंकि भारत में तो 90 रुपये का फायदा बिचौलिए ही खा जाते हैं.. मान लीजिए कि आपके और किसान के बीच से बिचौलिये को हटा दिया जाए और आप किसान को 50 रुपये भी दे दें तो आपका 100 में से सीधा 50 रुपये बच जाता है.किसान को चार गुना ज्यादा दाम मिल जाता है.

मंडी किसान के लिए भ्रम

NSSO डाटा के जरिए हमने आपको मोटा-मोटी एक गणित समझाया है. इसी गणित को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो वो तीसरा आदमी भी नजर आ जाएगा जो किसी भी कानून के बनने या किसानों के मजबूत होने से घबराता है.

इसकी सामान्य सी वजह ये है कि बिचौलिये का 90 रुपये हाथ से चला जाता है. ये वो लोग हैं जो मंडी को मंदिर की तरह और MSP को प्रसाद की तरह मानते हैं.ऐसे लोगों का किसानों के मजबूत होने से नाखुश होना बहुत ही स्वाभाविक सी बात है. क्योंकि मंडी एक मंदिर नहीं बल्कि एक साजिश है. जिस मंडी को मंदिर कहा जा रहा है वो एक आम किसान के लिए भ्रम साबित होता है.

भुट्टे का रियलिटी टेस्ट

अब पंजाब में भुट्टा बेचने वाले किसानों का उदाहरण ले लीजिए.सरकार ने भुट्टे की MSP 1850 रुपये प्रति क्विंटल तय की है. हर किसान इसी कीमत की उम्मीद लेकर घर से निकलता है.

लेकिन इस देश में मंडिया इतनी कम हैं कि 496 वर्ग किलोमीटर के दायरे में लाखों किसानों के हिस्से में सिर्फ एक मंडी आती है.मंडी दूर है इसलिए किसान करीब में ही फसल बेचने पर मजबूर हो जाता है.

इसी मजबूरी के बीच में एक मोटे व्यापारी की एंट्री होती है जो ट्रक लेकर छोटे-छोटे व्यापारियों के बीच घूमता है. खुद को किसानों की मजबूरी का हल बताता है, लेकिन हकीकत क्या है ये किसान को बहुत अच्छी तरह से समझ में आता है.

किसान को अपनी फसल एमएसपी से काफी नीचे बेचनी पड़ती है जैसा कि पंजाब के छोटे किसान भी कर रहे हैं. वो अपना भुट्टा 1200 रुपये प्रति क्विंटल बेच रहे हैं. कई जगहों पर इससे भी कम दाम पर बेच रहे हैं.

अब सवाल उठता है कि MSP कहां चली गई? MSP से फायदा तो कोई और लूट ले गया. सवाल ये भी उठता है कि मंडियां किसानों के करीब क्यों नहीं आतीं. वो भी तब जबकि सरकार की ही एक रिपोर्ट कहती है कि किसान को मंडी तक जाने के लिए 5 किमी से ज़्यादा की दूरी तय ना करनी पड़े यानि मंडियों को 80 वर्ग किलोमीटर के दायरे में होना चाहिए.

पंजाब की मंडियों मे एमएसपी बढ़ा दी है, लेकिन मंडी मंदिर नहीं है, मंडी में बैठे लोग एमएसपी के पुजारी जरूर हैं. इन APMC मंडियों को देश के किसानों की तकदीर बदलने के लिए बनाया गया था.लेकिन मंडियों में बैठे कारोबारियों ने इसी को किसानों की मजबूरी का गढ़ बना दिया है.

”मंडी करीब 25 किलोमीटर दूर है हमारे गांव से, वहां तो बहुत ही बेकार स्थिति है, किसानों को रेट तो मिलते ही नहीं है, यहां तो बहुत ही किसानों से लूटमार चल रही है, विशेषकर मंडियों में” -मिश्रीलाल राजपूत, किसान, भोपाल

ये भोपाल के एक किसान की आपबीती है, जो बता रही है कि अगर मंडी ही किसानों का मंदिर है.तो उस मंदिर ने एक किसान को ठग लिया है, और वो किसान अपने चारों ओर इसी ठगी को देख रहा है, जो मक्के की फसल उगाकर न्यूनतम समर्थन मूल्य की आस लगाए बैठे हैं.

इन किसानों ने अपने खेतों में मक्के की फसल उगाई थी. जिसका सरकार ने MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है 1850 रुपए प्रति क्विंटल लेकिन इन्हें मिलता क्या है.

”MSP पर वहां कोई खरीदार ही नहीं होता, अगर मंडी में जाएं, तो वही 1000-1100 रुपए क्विंटल से ज्यादा पर कोई खरीदार ही नहीं होता, औने-पौने दामों में किसान बिचौलियों को बेचकर आता है…यही परेशानी है हमारी” –कृपाल सिंह राजपूत, किसान, भोपाल

यानी पहले किसान ने मंडियों के जो हालात बताए उसपर इस किसान ने मुहर लगा दी जो कहती है कि- सरकार ने मक्के की MSP 1850 रुपये प्रति क्विंटल तय की है. लेकिन भोपाल के किसान को 1000 रुपये में अपनी फसल बेचनी पड़ी यानी सरकार ने जितनी कीमत तय की उसका 60 फीसदी से भी कम.

लेकिन ये तो सिर्फ एक बानगी है.टीवी9 भारतवर्ष ने किसानों से सिर्फ दो ही बातें पूछी थीं.पहली बात ये कि उनकी फसल किस कीमत पर खरीदी गई और मंडी में अपनी फसल बेच सके या मंडी बहुत दूर है. इन दो सवालों में ही बिचौलियों की हकीकत सामने आ गई.

साढ़े 18 सौ मंडी का भाव है, हम लोग इसीलिए लेकर गए, जब बिचौलियों को पता चला, तो 12 सौ का भाव पकड़ा दिया, कभी-कभी 900 भी पकड़ा देते हैं…बिचौलियों के जरिए बेची, उसी से वहां बिकती है.— राम प्रकाश, किसान, कन्नौज

हमारी पड़ताल आगे बढ़ती गई और हर किसान की जुबान पर एक ही किस्सा मिला. हम तरस गए ये सुनने के लिए कि इस देश में एक मंडी ऐसी भी है जहां किसान को उसकी मेहनत का फल मिलता है. फसल की कीमत मिलती है और कोई मंडी ऐसी भी है जहां बिचौलिये नहीं होते हर किसान बिचौलिए के आगे सरेंडर करने को मजबूर था.

”मंडी में भाड़ा देना पड़ता है किसान को, कटौती भी कटौती है, वहां तो सभी झंझट लगते हैं, दिन में गायों से बचाओ और रात में नील गाय से”-किसान, कन्नौज

”कम रेट में बेचनी पड़ती है, क्योंकि फसल खराब हो जाएगी, इसलिए बेचनी पड़ती है”-किसान, कन्नौज

”मक्का बेचने गए थे साहब, ७००-८०० रुपए क्विंटल बिक रही है, क्या करे मजबूरी में बेचना पड़ा 25 किलोमीटर दूर है मंडी”– मोबिन खान, किसान, भोपाल

ये दिक्कत नहीं बल्कि एक साजिश है

दरअसल ये दिक्कत नहीं बल्कि एक साजिश है. देश में दशकों तक शासन करने वालों ने मंडी को किसानों से दूर रखा. इतने कायदे कानून बना दिए कि मंडी पहंचकर भी किसान बिचौलियों के आगे गिर जाए. किसी तरह अनाज बेचकर घर वापस भाग जाए.वर्ना जिस मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपए प्रति क्विंटल है उसे किसान आठ सौ या हजार रुपए में बेचने को मजबूर ना होते.

”हड़ताल के नाम पर खाली हड़ताल कर रहे हैं, किसान के नाम पर हड़ताल है, लेकिन किसान का माल नहीं खरीद रहे हैं, बाकी व्यापारी स्टॉक का माल भरवा रहे हैं, काम करा रहे हैं, बस किसान के लिए हड़ताल है, किसान भटक रहा है” –भगवान सिंह परमार, किसान, भोपाल

94 परसेंट किसानों को इस एमएसपी का कोई फायदा नहीं

ये पड़ताल बता रही थी कि किसान कानून के विरोध में हड़ताल कौन कर सकता है, ये प्रदर्शन कौन कर सकता है.इस देश में न्यूनतम मूल्य का एक तरह से कोई अस्तित्व ही नहीं है. 94 परसेंट किसानों को इस एमएसपी का कोई फायदा नहीं मिलता. जो 6 परसेंट मंडी में पहुंच भी जाते हैं उनमें से भी बहुतों को कोई ना कोई साजिश रचकर बिचौलियों के पास पहुंचा दिया जाता है.जब MSP ही नहीं रही तो फिर APMC का क्या मतलब रह जाता है.

किसानों के लिए तीन कानून

फिलहाल केंद्र सरकार ने किसानों के लिए तीन कानून बनाए हैं. जिनमें से पहला आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020.. जिसके मुताबिक अब सरकार अनाज, दलहन, आलू, प्याज जैसी वस्तुओं पर बहुत संकट में ही नियंत्रण लगाएगी.यानी इनकी जमाखोरी अपराध नहीं रह जाएगा, किसान इन्हें जमा कर सकेंगे और बाजार के हिसाब से बेच सकेंगे.

दूसरा है, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून इसमें किसानों को मंडियों से बाहर भी अपनी फसल बेचने की छूट दी गई है. यहां तक कि वो दूसरे राज्यों की मंडियों में भी फसल बेच सकेंगे यानी जो व्यापार बिचौलियों के पास था वो सीधे किसानों के पास चला जाएगा.

और तीसरा मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा बिल, 2020- जो मूल रूप से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए माना जा रहा है.. और इसका मकसद है वस्तु की कीमत तय कराना.यानी कितनी लागत हो और कितना मुनाफा.

बिचौलिये किसान और कंज्यूमर दोनों को ही लूट रहे

हम नहीं कह रहे कि इन कानूनों से किसानों की किस्मत एक दिन में चमक जाएगी. क्योंकि अभी एग्रीकल्चर सेक्टर में बहुत ही सुधार की जरूरत है. हम आपको ये बता रहे थे कि जिस बिल से हमें और आपको फायदा है उससे चिढ़ किसे है. नए कानून के प्रावधान बता रहे हैं कि इससे वो तबका नाराज है जो ना तो फसल उगाता है ना बेचता है.

लेकिन फसल की कीमत का 90 परसेंट उड़ा ले जाता है. इस कानून से परेशान वो है जो फसल कटते ही अनाज को कौड़ी के भाव खरीद लेता है और उसे मंडी मे महंगे दामों पर बेच देता है. या फिर वो लोग हैं जो अनाज को बड़े पैमाने पर जमा करते हैं.

बाजार में अनाज की कमी पैदा करते हैं और भाव चढ़ते ही बेचकर मुनाफा लूट लेते हैं. ऐसे बिचौलियों से हमें भी नुकसान है और आपको भी नुकसान है क्योंकि ये बिचौलिये किसान और कंज्यूमर दोनों को ही लूट रहे हैं.