जब पर्रिकर ने सुनाई पाकिस्‍तान पर पहली सर्जिकल स्‍ट्राइक की कहानी

पर्रिकर ने कहा था, "मुझे यह कहने में बड़ा गर्व होता है कि मैंने उरी और वास्तविक (सर्जिकल) स्ट्राइक के बीच करीब 18-19 बैंठकें की होंगी, जिनमें सेना के शीर्ष अधिकारी, रक्षा मंत्रालय के अधिकारी भी शामिल थे. लेकिन कुछ लीक नहीं हुआ."

नई दिल्ली: गोवा के मुख्‍यमंत्री मनोहर पर्रिकर का रविवार देर शाम निधन हो गया. वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे. मनोहर पर्रिकर ने मोदी सरकार में रक्षामंत्री का पद भी संभाला. उनके ही कार्यकाल में पाकिस्‍तान पर पहली सर्जिकल स्‍ट्राइक की गई थी. पर्रिकर ने इस बारे में कई चौंकाने वाले खुलासे किए थे.

भारतीय सेना ने 28 और 29 सितंबर 2016 की दरम्यानी रात पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की थी. इसके जरिए पाक के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के लांच पैड को ध्वस्त किया गया था. इस कार्रवाई में कई आतंकवादी मारे गए थे. साथ ही आतंकी शिविरों को भारी नुकसान हुआ था.

सर्जिकल स्ट्राइक के समय मनोहर पर्रिकर भारत के रक्षामंत्री थे. भारत द्वारा पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ की गई इस सख्त कार्रवाई में पर्रिकर की अहम भूमिका मानी जाती है. जानकार यह भी कहते हैं कि पर्रिकर नहीं होते तो शायद सर्जिकल स्ट्राइक इतनी आसानी से नहीं हो पाती.

15 महीने पहले ही बनी थी योजना
पर्रिकर ने बताया था कि सर्जिकल स्ट्राइक की योजना जून 2015 में मणिपुर में सेना के काफिले पर उग्रवादी संगठन एनएससीएन द्वारा घात लगाकर किए गए हमले के बाद ही बनाई गई थी. इस हमले में 18 जवान शहीद हुए थे.

पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा था, “पश्चिमी सीमा पर 29 सितंबर (2016) के सर्जिकल स्ट्राइक के तैयारी की शुरुआत 9 जून 2015 को हुई थी. हमने इसकी योजना 15 महीने पहले ही बनाई थी. इसके लिए अतिरिक्त सैनिकों को प्रशिक्षित किया गया. प्राथमिकता के आधार पर उपकरण खरीदे गए थे.”

उन्होंने बताया कि डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वाथी वैपन लोकेटिंग रडार का पाकिस्तानी सेना की फायरिंग यूनिट्स का पता लगाने में पहली बार सितंबर 2016 में प्रयोग किया गया. हालांकि लगभग तीन महीने बाद आधिकारिक रूप से इसे सेना में शामिल किया गया.

रक्षा मंत्रालय की ‘बैकरूम’ भूमिका
पर्रिकर का कहना था कि रक्षा मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सफलता में ‘बैकरूम’ की भूमिका निभाता है. रक्षा मंत्रालय असल (क्रियान्वयन) काम करता है जो किया जाना चाहिए.

शीर्ष अधिकारियों के साथ की 18-19 मीटिंग
पर्रिकर ने कहा था, “मुझे यह कहने में बड़ा गर्व होता है कि मैंने उरी (आतंकवादी हमले) और वास्तविक (सर्जिकल) स्ट्राइक के बीच करीब 18-19 बैंठकें की होंगी, जिनमें सेना के शीर्ष अधिकारी, रक्षा मंत्रालय के अधिकारी भी शामिल थे. लेकिन कुछ लीक नहीं हुआ.”

उन्होंने कहा, “जब आप किसी को कुछ नहीं बताते हैं तो आपके अंदर दबाव बढ़ने लगता है. सामान्यत: दबाव किसी दोस्त से चर्चा कर हल्का हो जाता है. लेकिन रक्षामंत्री के रूप में आप ऐसी स्थिति में नहीं होते हैं कि किसी मुद्दे पर किसी से बात कर सकें. चाहे म्यांमार का सर्जिकल स्ट्राइक हो या पीओके का. मैं दबाव के कारण करीब-करीब सो नहीं पाया था.”

मोबाइल कर दिए गए स्विच ऑफ
उनका कहना था कि सर्जिकल स्ट्राइक की योजना बनाने के दौरान मोबाइल फोन स्विच ऑफ करके 20 मीटर दूर रख गये थे. ऐसा गोपनीयता बनाए रखने के लिए किया गया था. अगर ऐसा न किया जाता तो योजना के लीक होने का खतरा बना रहता.

‘संघ की कॉमन शिक्षा आई काम’
पर्रिकर ने सर्जिकल स्ट्राइक में अपनी भूमिका का जिक्र करते हुए कहा था कि पीएम मोदी और वह अलग-अलग राज्यों से आते हैं और सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला लेने के पीछे संघ की शिक्षा ही कॉमन है.

उन्होंने कहा था, “मुझे इस मेल को लेकर हैरानी होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी के गृह राज्य से आते हैं और रक्षा मंत्री के रूप में मैं गोवा से हूं जहां कोई मार्शल रेस और सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई. यह हो सकता है कि आरएसएस की शिक्षा इसके मूल में थी, लेकिन यह बिलकुल अलग तरह का मेल था.”