नहीं रहे ‘नाश्ते में नेताओं को खाने वाले’ पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन

90 के दशक में अक्सर ये कहा जाता था कि नेता या तो भगवान से डरते हैं या फिर टीएन शेषन से.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. इस लोकतंत्र को बनाए रखने में एक खास भूमिका निभाता है चुनाव आयोग. इसी चुनाव आयोग के 1990 में मुखिया रहे थे टीएन शेषन. जिनका 86 साल की उम्र में रविवार देर रात निधन हो गया. शेषन को चुनाव आयोग को शक्तिशाल बनाने के लिए पहचाना जाता है.

चुनाव आयोग को ये शक्तियां दिलाने के लिए उन्होंने चुनाव कराने पर ही रोक लगा दी थी. ये बात है 2 अगस्त, 1993 की. जब शेषन ने 17 पेज का आदेश पारित करते हुए लिखा की जब तक चुनाव आयोग की संविधान निहित शक्तियों को सरकार मान्यता नहीं दे देती, तब तक देश में किसी भी तरह के चुनाव का आयोजन नहीं किया जाएगा.

उन्होने अपने आदेश में लिखा था कि इन जरूरी शक्तियों के बिना चुनाव आयोगा अपने सेवैधानिक कर्तव्यों को निभा नहीं सकता है. ऐसे में चुनाव आयोग उन तमाम चुनावों को रद्द करता है, जिनकी घोषणा की जा चुकी है और जो आगे होने हैं. शेषन के इस फैसले के चलते केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को पश्चिम बंगाल में राज्यसभा चुनाव न हो पाने के कारण इस्तीफा देना पड़ा था.

अपने इस ईमानदार स्वभाव के चलते हमेशा राजनेताओं के निशाने पर रहने वाले शेषन से तमाम दलों के नेता खौफ खाते थे. उस समय में कहा जाता था कि नेता या तो भगवान से डरते हैं या फिर टीएन शेषन से. खुद शेषन को भी इस बात का इल्म था. इसलिए ही तो उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेकफास्ट,’ मतलब, मैं ‘नाश्ते में नेता’ खाता हूं.

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