जिन विद्यासागर की मूर्ति टूटी, उन्होंने अंग्रेज़ का रोल कर रहे एक्टर को फेंककर मारी थी चप्पल!

राजनीति में महापुरुषों का इस्तेमाल पुराना चलन है. ईश्वरचंद्र विद्यासागर इस चलन के नए शिकार हैं. आइए आपको बताते हैं उस महापुरुष के बारे में जिसे मुंहतोड़ जवाब भी देना आता था और दूसरों के लिए जीवन समर्पित करना भी.

पिछले कुछ सालों में सियासत ने महापुरुषों को भी जंग के मैदान में खींच लिया है. कभी शिवाजी, कभी अंबेडकर तो कभी पटेल पर राजनीति किस हद तक गिरी ये बताने की ज़रूरत नहीं और इन्हीं महापुरुषों में ताज़ा नाम जुड़ा है ईश्वरचंद्र विद्यासागर का.

बंगाल के प्रखर चिंतक, विचारक, सुधारक, लेखक, प्रकाशक, शिक्षक ईश्वरचंद्र विद्यासागर वो हस्ती हैं जिन्हें किसी भी विचारधारा का अनुयायी पूजनीय मानता है. ब्रिटिश भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक के सामने बंगाल ही नहीं हिंदुस्तान नत है, लेकिन टीएमसी और बीजेपी की सिर फुटौव्वल में उनकी मूर्ति तक को नहीं छोड़ा गया.

आइए ईश्वरचंद्र विद्यासागर की गहराई के एकाध नमूने से आपका परिचय कराएं. तब आप जानेंगे कि जिस महापुरुष की मूर्ति क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के चलते तोड़ी गई वो आकाश जितना ऊंचा है.

अंग्रेज़ प्रिंसिपल को जब सिखाया शिष्टाचार
ईश्वरचंद्र एक संस्कृत कॉलेज में प्राचार्य थे. एक बार उन्हें किसी दूसरे कॉलेज में काम पड़ा. उस कॉलेज के प्राचार्य एक अंग्रेज़ केअर साहब थे. ईश्वरचंद्र जब उनके कमरे में पहुंचे तो देखा कि अंग्रेज़ प्राचार्य अपनी मेज़ पर दोनों पांव पर रखे बैठे हैं. शिष्टाचार के लिहाज़ से बात आपत्तिजनक थी मगर सभ्य ईश्वरचंद्र ने कुछ ना कह कर अपने काम की बात की और लौट आए.

कुछ दिनों बाद उन्हीं अंग्रेज़ प्राचार्य को ईश्वरचंद्र जी के कॉलेज में काम पड़ा. वो संस्कृत कॉलेज आए. ईश्वरचंद्र जी के पास मौका था. उन्होंने भी प्राचार्य महोदय से उसी अंदाज़ में मुलाकात की जैसे उन्होंने की थी. मेज पर दोनों पांव चढ़ाए ईश्वरचंद्र जी ने उनसे बातचीत करके विदा किया. अपमानित महसूस करते हुए अंग्रेज़ प्राचार्य ने उच्च अधिकारियों को एक शिकायती चिट्ठी लिख दी. ईश्वर चंद्र जी को तलब किया गया. उनके व्यवहार की वजह पूछी गई. ईश्वर चंद्र जी ने कहा- हम भारतीय आप अंग्रेज़ों से ही यूरोपीय शिष्टाचार सीखते हैं. जब केअर साहब से मैं मिलने गया तो ये जिस तरह बैठे थे उसी से मैंने ऐसा व्यवहार सीखा. 
शिकायत करनेवाले प्राचार्य महोदय लज्जित हुए. माफी मांगकर जान छुड़ाई.

छोटे से छोटा काम भी छोटा नहीं
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का नाम काफी फैला तो उनसे मिलनेवालों का भी तांता लगने लगा. एक बार रात के वक्त मनमोहन नाम के सज्जन उनसे मिलने रेलगाड़ी से स्टेशन पहुंचे. मनमोहन रे पास एक सूटकेस था जिसे वो खुद नहीं उठाना चाहते थे. साहब लोग अक्सर अपना सामान उठाने में अपमानित अनुभव करते थे. जब मनमोहन स्टेशन पर कुली को आवाज़ लगा रहे थे तो स्टेशन मास्टर ने उन्हें समझाया कि यहां ये सुविधा उपलब्ध नहीं. तभी एक आदमी वहां पहुंचा और सूटकेस उठाकर चलने का प्रस्ताव दिया. मनमोहन खुश हुए. रास्ते में चलते हुए सामान उठानेवाले ने पूछा कि मनमोहन कहां जाना चाहते हैं. जवाब मिला- एक बेहद खास आदमी ईश्वरचंद्र विद्यासागर के घर.

सामान उठाए व्यक्ति ने उन्हें जल्दी-जल्दी ईश्वरचंद्र विद्यासागर के घर पहुंचा दिया. घर पहुंचकर उस शख्स ने उनका सूटकेस एक तरफ रखा और कुर्सी पर बैठाकर कहा-  जी कहिए क्या काम है.. मैं ही ईश्वरचंद विद्यासागर हूं.

जब मनमोहन ने ये सुना तो वो सन्न रह गया. ईश्वरचंद्र जी के चरणों में गिरकर वो माफी मांगने लगा. स्वावलंबन सिखाने का ये ईश्वरचंद्र विद्यासागर का तरीका था.

कलाकार से खुश होकर मारी चप्पल
एक किस्सा बेहद दिलचस्प है. ये उन दिनों की बात है जब बंगाल में नील की खेती ज़ोरशोर से हो रही थी. अंग्रेज़ अधिकारी स्थानीय किसानों पर ज़ोर-ज़बरदस्ती करते थे. गरीब किसानों की सुननेवाला की नहीं था. फिर धीरे-धीरे जागरुकता फैलने लगी. रंगमंच के कुछ कलाकारों ने इसी विषय पर नाटक करने की सोची. फिर एक दिन जब नाटक खेला गया तो ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी पहुंचे. उस नाटक में अंग्रेज़ अधिकारी का किरदार निभाने वाले युवक ने इतना शानदार अभिनय किया कि बावुक ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने पांव में पहनी चप्पल उसे दे मारी. चारों तरफ हंगामा मच गया. अभिनेता युवक ईश्वरचंद्र जी को पहचानता था. वो कूदकर मंच से उतरा और उनके चरणों में गिर पड़ा. कहने लगा कि आज मेरा अभिनय करना सार्थक हो गया.

जब इंग्लैंड में सफाई के लिए खुद उठाई झाड़ू
एक बार ईश्वरचंद्र किसी सभा की अध्यक्षता करने इंग्लैंड गए. समय के सख्त पाबंद थे इसलिए वक्त पर जा पहुंचे. उन्होंने देखा कि लोग सभा भवन के बाहर घूम रहे हैं. वजह पूछी तो मालूम तला कि सफाईकर्मी पहले आकर भवन साफ करेगा तब सब बैठेंगे. ईश्वरचंद्र जी ने झाड़ू उठा ली और सफाई में जुट गए. उन्हें ऐसा करते देख बाकी लोग भी साथ हो लिए. ये भी एक तरीका था लोगों को स्वावलंबन सिखाने का.

महिलाओं के शोषण के खिलाफ जब ठोकी ताल
ईश्वरचंद्र विद्यासगर बाहर से कठोर लेकिन भीतर से बेहद नरम इंसान थे. ऐसे कई वाकये हैं जब किसी का दुख देखकर वो रोने लगे.  26 सितंबर 1820 को बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर में उनका जन्म बीरसिंघा गांव में हुआ था. पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय और मां का नाम भगवती देवी थी. उनका परिवार इतना गरीब था कि लालटेन खरीदना तक मुश्किल था. गली में लगी लाइट्स के नीचे बैठकर उन्होंने पढ़ाई लिखाई पूरी की थी. 14 साल की उम्र में ईश्वर चंद्र की शादी दीनामनी देवी से कर दी गई थी. नारायण चंद्र बंद्योपाध्याय उनके इकलौते बेटे थे.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर बड़ी मुश्किलों में पढ़े थे और बखूबी जानते थे कि गरीबी और शोषण के खिलाफ शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है. उन्होंने एक के बाद एक स्कूल खोलकर हलचल मचा दी. बंगाल में उन्होंने 20 मॉडल स्कूल खोले जिनमें 1300 छात्रों को प्रवेश मिला. लड़कियों के लिए अलग से 35 स्कूल खोलने का श्रेय भी उन्हें जाता है. उस ज़माने में लड़कियों की शिक्षा पर किसी का ध्यान नहीं था. बचपन में शादी कर देना और विधवा होने पर फिर शादी ना करना आम था. लड़कियों को विधवा होने पर समाज से कट कर जीवन बिताना पड़ता था. ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने देखा कि कैसे विधवा महिलाओं को घर में बंद रखा जाता है. उनसे दिन भर काम लेकर आधा पेट खाना दिया जाता था. और तो और उनके बाल पूरी तरह काट दिए जाते ताकि वो खूबसूरत ना दिखें. नर्क से बदतर जीवन की मुक्ति का कोई रास्ता नहीं था. दोबारा शादी की मनाही थी.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने दो बड़े काम किए. एक तो वो हर घर के दरवाज़े पर खुद पहुंचे और मां-बाप के हाथ जोड़कर उनकी बेटियों को स्कूल तक ले आए. दूसरा उन्होंने विधवाओं के फिर से विवाह पर ज़ोर दिया. एक-एक व्यक्ति सौ शादियां तक कर लेता था. इसे देखकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर बेहद परेशान हुए. वो जितना विरोध करते उतना ही समाज में उनका विरोध हुआ. बस तब ईश्वरचंद्र ने ठान लिया कि वो कानून की शरण लेंगे. 25 हजार लोगों के हस्ताक्षर लेकर वो ब्रिटिश सरकार के पास गए और विधवा पुनर्विवाह की मांग की. सरकार ने इसे खारिज किया तो अगली बार वो 27 हजार हस्ताक्षरों के साथ मौजूद थे. उन्होंने ऐसी दलीलें रखीं कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने आखिरकार 26 जुलाई 1856 को एक क्रांतिकारी कानून हिंदू विधवा पुर्विवाह एक्ट 1856 लाकर विधवा महिलाओं के लिए नारकीय जीवन से आज़ादी का रास्ता खोल  दिया.

ईश्वरचंद्र अपनी विद्वत्ता के दम पर बने विद्यासागर
9 साल की उम्र में ईश्वरचंद्र को उनके पिता ने अपने दोस्त के घर कोलकाता भेज दिया. संस्कृत कॉलेज में दाखिला लेकर ईश्वरचंद्र ने जमकर पढ़ाई की. पैसे की तंगी से बचने के लिए वो पढ़ाने का काम भी करते रहे.  12 सालों तक उन्होंने कॉलेज में किताबों का दामन नहीं छोड़ा. इतनी मेहनत से पढ़े कि संस्कृत ही नहीं कई-कई विषयों में महारत हासिल कर ली. 1841 में संस्कृत व्याकरण, साहित्य, अलंकार शास्त्र, वेदांत, स्मृति और खगोलशास्त्र की परीक्षाएं पास कर लीं.

यहीं ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म हुआ था

19 साल की उम्र में ही उन्होंने लॉ पास कर लिया. वो जिस परीक्षा मे बैठते उसे ही उत्तीर्ण करते. छात्रवृत्तियों का ढेर लग गया. 21 साल की उम्र में ही उन्हें प्रतिष्ठित फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के तौर पर नौकरी ऑफर की गई. पांच साल बाद साल 1846 में ईश्वरचंद उसी संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव बने जहां पढ़े थे मगर सिर्फ ब्राह्मणों को नौकरी देने के रिवाज के खिलाफ उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया. हालांकि काफी मान मनौव्वल के बाद वो लौटे और आगे चलकर प्रिंसिपल और इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स बने.

उन्होंने कई किताबें लिखीं लेकिन सबसे अहम बात ये है कि उन्होंने बांग्ला भाषा में ज़बरदस्त बदलाव किए. उसकी संरचना में सुधार किए. उन्होंने बंगाल इतिहास, वर्ण परिचय जैसी किताबों के अलावा अखबारों में भी खूब लेख लिखे. उनकी विद्वत्ता  से रामकृष्ण परमहंस से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर तक चमत्कृत हुए. समाज ने ही उन्हें विद्यासागर की उपाधि प्रदान की.

झारखंड के जामताड़ा जिले में उन्होंने जीवन के आखिरी दो दशक बिताए. वो अपनी पत्नी के संकीर्ण विचारों से दुखी थे और इसी वजह से उनके बीच कड़वाहट बढ़ गई . आखिरकार उन्होंने घर छोड़ दिया और बीमारी के चलते 70 साल की उम्र में 29 जुलाई 1891 को दुनिया छोड़ दी.

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