गणित से नफरत के बावजूद विदेश में पढ़ने के लालच ने करा दी यूनिवर्सिटी टॉप, ऐसे थे गिरीश कर्नाड

गिरीश कर्नाड को हमने मालगुडी डेज़ में स्वामी के पिता के तौर पर देखा, कभी वो मंथन में डॉक्टर बने, इकबाल में खड़ूस क्रिकेट कोच लेकिन असल में वो क्या थे.. जानिए.

देश-दुनिया में विख्यात रंगकर्मी, अभिनेता, निर्देशक, सामाजिक कार्यकर्ता गिरीश रघुनाथ कर्नाड का लंबी बीमारी के बाद 81 साल की उम्र में निधन हो गया. वो लंबे समय से बीमार थे और कुछ महीनों से उनका इलाज लगातार जारी था.

गिरीश कर्नाड को चालीस दशकों तक साहित्य सेवा के लिए 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उनके लिखे गए नाटकों का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. विभिन्न नाटकों का निर्देशन इब्राहीम अल्काज़ी, बी वी कारंथ और एलिक पद्मसी जैसे दिग्गजों ने किया. इसके अलावा भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण से भी नवाज़ा. 4 फिल्मफेयर अवॉर्ड भी उनके खाते में आए थे. सिनेमा से लेकर टीवी धारावाहिकों तक लगातार उनकी उपस्थिति थी.

अंधेरे में डूबे गांव में पढ़े पुराण और समझी नाटक की दुनिया
गिरीश का जन्म ब्रिटिश भारत के माथेरान में 19 मई 1938 को हुआ था जो आज महाराष्ट्र में है. गिरीश की मां एक बाल विधवा थीं जिनको एक बेटा भी था. बाद में उन्होंने नर्स का काम करते हुए डॉ रघुनाथ कर्नाड से शादी की लेकिन विधवा पुनर्विवाह के खिलाफ माहौल के चलते ऐसा काफी संघर्ष के बाद ही हो सका. शादी के बाद पैदा हुई चार संतानों में गिरीश तीसरे नंबर पर थे.

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अपनी मां के साथ नन्हें गिरीश कर्नाड जिनसे उन्होंने संघर्ष सीखा

1942-43 में गिरीश कर्नाड के पिता सरकारी नौकरी से रिटायर हो गए लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध की वजह से उन्हें एक्सटेंशन दे दिया गया. डॉ रघुनाथ कर्नाड का ट्रांसफर कर्नाटक के सिरसी हो गया. ये इलाका अंधकार और बीमारी में डूबा था. पूरा परिवार सिरसी में ही रहने लगा. इसी दौरान गिरीश का संपर्क वहां फैली लोककथाओं और नाटकों से हुआ. रुचि बढ़ी तो उन्होंने स्थानीय हव्यक समुदाय से रंगकर्म के टिप्स लेने शुरू किए. पुराण और इतिहास का अध्ययन भी गिरीश ने डूबकर किया.

इसके अलावा गिरीश कर्नाड अपने अथाह ज्ञान का बहुत सारा श्रेय धारवाड़ की मनोहर ग्रंथ माला पब्लिकेशन को भी देते हैं. तीस के दशक में जब कन्नड़ साहित्य कम छप रहा था तब इसी पब्लिकेशन ने जमकर कन्नड़ और संस्कृत साहित्य जमकर छापा.

गणित से नफरत थी लेकिन टॉप की यूनिवर्सिटी
पढ़ाई-लिखाई में तेज़ गिरीश ने कर्नाटक विश्वविद्यालय से गणित और सांख्यिकी में ग्रेजुएशन किया. ये अलग बात है कि गणित से उन्हें नफरत थी लेकिन उस ज़माने में हर कोई विदेश में जाकर पढ़ना चाहता था और कर्नाड परिवार के पास उतने संसाधन नहीं थे कि गिरीश देश से बाहर जा सकें. ऐसे में सिर्फ एक ही रास्ता था कि गिरीश कर्नाड प्रथम श्रेणी से ग्रेजुएशन करें. उन्होंने इसके लिए मजबूरन गणित को चुना. कड़े परिश्रम का फल आया और गिरीश ने पूरी यूनिवर्सिटी टॉप की. उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए प्रतिष्ठित रोड्स स्कॉलरशिप मिल गई. इसके बाद वो दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए इंग्लैंड चले गए. 1963 में वो ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष भी चुने गए.

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प्रतिष्ठित रोड्स स्कॉलरशिप पाकर गिरीश ने ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई की

परिवार से खींचतान से उपजा पहला नाटक
गिरीश कर्नाड के जीवन में ये सब इतना आसान नहीं था. उनके इंग्लैंड जाने से पहले ही परिवार वालों के मन में शंकाओं के बादल उमड़ने-घुमड़ने शुरू हो गए. परिवार डरता था कि कहीं गिरीश इंग्लैंड में ही ना रह जाएं या फिर किसी गोरी लड़की से शादी ना कर लें. स्वाभाविक है कि गिरीश एक ऊहापोह में थे और उन्हें अपने हालात ययाति और पुरू जैसे लगे. ययाति अपनी वृद्धावस्था देकर पुत्रों से यौवन लेकर जीना चाहते थे लेकिन पुरू के अलावा कोई बेटा इसके लिए तैयार नहीं था. इसी मानसिक संघर्ष से एक कन्नड़ नाटक की रचना हो गई जिसे उन्होंने मनोहर ग्रंथमाला प्रकाशन को सौंप दिया और इंग्लैंड चले गए.

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ये अजीब बात थी कि गिरीश खुद को एक अंग्रेज़ी भाषा का कवि बनते देखना चाहते थे लेकिन उनकी पहली रचना कन्नड़ नाटक थी.

इंग्लैंड प्रवास के तीन सालों ने गिरीश को बहुत कुछ दिया. उन्होंने समझा कि बाहरी दुनिया भारत को कैसे देखती है. वहीं रहने के दौरान उन्हें खबर मिली कि उनका नाटक ययाति छपने जा रहा है. एक बार उसके छपते ही चारों तरफ से ज़बरदस्त प्रतिक्रियाएं मिलने लगीं. इन प्रतिक्रियाओं ने गिरीश का हौसला बढ़ा दिया और उन्होंने अंग्रेज़ी का कवि बनने का इरादा त्याग कर भारत लौटने का फैसला लिया. 23 साल की उम्र में पहला नाटक छपना एक बड़ी उपलब्धि थी.

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इतिहास को आज से जोड़ने की ललक से निकला ‘तुगलक’
गिरीश कर्नाड एक दिन कीर्तिनाथ कुर्तकोटि नाम के प्रसिद्ध कन्नड़ साहित्यकार के साथ बैठे थे. कुर्तकोटि ने कहा कि हमारे पास ऐसा कोई नाटक नहीं जिसमें इतिहास को प्रासंगिकता की पटरी पर बैठाया गया हो. गिरीश व्यग्र हो गए. उन्होंने इतिहास की किताबें उठा लीं. वो कोई नाटक लिखना चाहते थे जो इतिहास कहता हो. हड़प्पा सभ्यता से लेकर वो धीरे-धीरे गुप्त और मौर्य से होकर 13वीं सदी तक पहुंचे. यहां उन्हें तुगलक मिले. बस उनकी यात्रा का ये अहम पड़ाव साबित हुआ. उन्होंने ऑक्सफोर्ड से लौटते हुए एक नाटक तुगलक लिखा जिसे सनकी सुल्तान कहा जाता था. मुहम्मद बिन तुगलक पर लिखे इस नाटक को भारत की सभी प्रमुख भाषाओं के दिग्गज निर्देशकों ने अपने निर्देशन के साथ लोगों के सामने रखा.

इसके बाद हयवदन और नागमंडल ने भी तत्कलीन प्रबुद्ध समाज में अथाह चर्चाएं बटोरीं.

भारत ही नहीं विदेशों तक मची कर्नाड के नाटकों की धूम
भारत लौटकर उन्होंने चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के लिए सात सालों तक काम किया, जिसके बाद वो पूरी तरह लेखन को समर्पित हो गए. वहीं उनका संपर्क द मद्रास प्लेयर्स नाम के थिएटर ग्रुप से हुआ. फिर गिरीश को शिकागो विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे पद्मश्री और साहित्य अकादमी विजेता ए के रामानुजन से न्यौता मिला. रामानुजन चाहते थे कि गिरीश फुलब्राइट स्कॉलर के तौर पर वहां आएं लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि पहले गिरीश को विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए एक नाटक लिखना पड़ेगा. उसी सिलसिले में नागमंडल लिखा भी गया और मशहूर भी हुआ.

किताबों से निकलकर सुनहरे पर्दे का सफर
1970 में गिरीश कर्नाड ने कन्नड फिल्म संस्कार से पटकथा और अभिनय की दुनिया में शुरूआत की. उन्होंने हिंदी दर्शकों के बीच 1986-87 के दौरान दूरदर्शन पर आए धारावाहिक मालगुडी डेज़ से पहचान बनाई जिसमें वो स्वामी के पिता थे. फिल्म मंथन कोई नहीं भूल सकता जिसे बनाने के लिए 5 लाख किसानों ने दो-दो रुपए का दान दिया था. 1976 में आई इस फिल्म को श्याम बेनेगल ने निर्देशित किया था और ये श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज़ कुरियन से प्रेरित थी.

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भारतीय सिनेमा की एक शानदार फिल्म मंथन का दृश्य

दूरदर्शन पर ही टर्निंग पॉइंट नाम के विज्ञान आधारित प्रोग्राम को वो होस्ट भी करते थे. कन्नड़ फिल्मों के अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों गोधूलि और उत्सव का निर्देशन किया. डॉक्यूमेंट्री निर्माण में भी उनका दखल था. फिल्मों निशांत, स्वामी, पुकार, इकबाल, डोर, आशाएं, एक था टाइगर, टाइगर ज़िंदा है में उन्हें करोड़ों हिंदी दर्शकों ने देखा और सराहा.

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गिरीश कर्नाड ने दूरदर्शन पर आए मालगुडी डेज़ में स्वामी के पिता का किरदार निभाया था

सिनेमा की दुनिया में उन्होंने दस नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते जो साहित्य की दुनिया में सेवा ने उन्हें राज्योत्सव अवॉर्ड, कालीदास सम्मान, ज्ञानपीठ अवॉर्ड, साहित्य अकादमी अवॉर्ड, कन्नड साहित्य परिषद अवॉर्ड, पद्मभूषण, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी दिलाए.

स्केच बनाने का था शौक लेकिन एक खत ने बदल दी दिशा
गिरीश कर्नाड को मशहूर हस्तियों के स्केच बनाने का बड़ा शौक था. उन्होंने खुद बताया था कि वो स्केच बनाकर उन्हीं विख्यात लोगों को भेजा करते थे और निवेदन करते थे कि स्केच के नीचे हस्ताक्षर करके वापस भेज दें. फिर एक दिन 17 साल की उम्र में उन्होंने आयरिश नाटककार सीन ओ केसी को भी वैसा ही स्केच हस्ताक्षर करने की प्रार्थना के साथ भेजा. केसी ने उन्हें जवाब में खत लिखा और नसीहत दी कि वक्त खराब मत करो और कोई ऐसा काम करो कि लोग तुम्हारे ऑटोग्राफ चाहें. इसके बाद स्केच भेजने का सिलसिला बंद हो गया.

सत्ता से टकराए लेकिन सत्ता ने किया नमन
हाल के सालों में गिरीश कर्नाड सत्ता से अपने विरोध को लेकर चर्चा में थे. साल 2014 में वो मोदी की प्रधानमंत्री दावेदारी के खिलाफ नज़र आए. उन्होंने अभिव्यक्ति और सहिष्णुता के मुद्दे पर खुलकर अपनी बातें कहीं. सांप्रदायिकता का विरोध करने पर वो विरोध प्रदर्शनों का निशाना भी बने. बाबरी विध्वंस की उन्होंने खुलेआम निंदा की थी. गिरीश कार्नाड तब भी चर्चा में आए जब अर्बन नक्सल का जुमला उछलने पर उन्होंने खुद को अर्बन नक्सल घोषित करते हुए गले में तख्ती पहन ली.

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गिरीश कर्नाड ने कभी भी उन बातों को खुलकर कहने-लिखने में संकोच नहीं किया जिसे सही माना. खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कार्नाड के निधन पर किए गए ट्वीट में ये बात लिखी.

गिरीश कर्नाड की अंतिम इच्छा थी कि उनका शवयात्रा ना निकले. ना कोई वीआईपी उनके दर्शन के लिए आए. उन्होंने अपने पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ाने से भी मना किया. गिरीश जीवन भर दिखावे, आडंबर और बंधी हुई परिपाटी से दूर रहे, ऐसे में उनकी ये इच्छा किसी को हैरान नहीं करती.