रूसी राष्ट्रपति को डांटने वाले नेता ने सोनिया को दिया था क्या गुरूमंत्र?

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साल 1999 का वो दौर सोनिया गांधी के लिए बड़ा ही मुश्किल था. पार्टी के बाहर और भीतर दोनों जगह उनके विदेशी मूल का मुद्दा सरगर्म था. शरद पवार और पीए संगमा ने कांग्रेस पर वर्चस्व स्थापित करने के फेर में सोनिया को चुनौती दे दी थी. ऐसे में सोनिया गांधी पार्टी के भीतर और बाहर हमदर्दी रखनेवाले चेहरों को पहचान रही थीं.

इसी दौर का एक किस्सा रशीद किदवई की किताब ‘सोनिया’ में पढ़ने को मिला. सोनिया गांधी सीपीएम के वयोवृद्ध नेता हरकिशन सिंह सुरजीत से मिलने उनके घर पहुंची थीं. ये वही सुरजीत थे जिन्होंने रूस के राष्ट्रपति गोर्बाच्योव तक को मुंह पर कह डाला था कि जिस हिसाब से आप वामपंथ चला रहे हैं ये कुछ ही दिनों का मेहमान है. कुछ ही वक्त बाद गोर्बाच्योव ही सोवियत की टूट के गवाह भी बने थे.

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15 साल की उम्र में झंडा फहराते हुए उन पर ब्रिटिश पुलिस ने दो गोलियां दाग दी थीं

दबदबा सुरजीत का ऐसा था कि जब सोवियत यूनियन टूट गया और उस पर निर्भर क्यूबा को अनाज के संकट ने घेरा, तो उन्होंने मदद के लिए अनाज भरा जहाज झटपट भिजवाकर क्यूबा की जनता की भूख शांत की.

खैर, एक दिन सुरजीत के दिल्ली वाले तीन मूर्ति लेन के घर में सोनिया गांधी की कार पहुंची. ड्रॉइंग रूम में बैठकर दोनों नेता चर्चा कर रहे थे. सुरजीत ने अपने ड्रॉइंगरूम में एयर कंडीशनर नहीं लगवा रखा था. नतीजतन थोड़ी ही देर में सोनिया गांधी पसीने से तरबतर हो गईं. उनकी हालत देखकर सुरजीत ने बेहद विनम्रता से सफाई पेश की- ‘मेरे पास सिर्फ एक एयर कंडीशनर है और वो भी मेरे बेडरूम में. आप मेरी बेटी की तरह हैं, अगर आपको बुरा ना लगे तो हम वहां बैठ सकते हैं.’

सोनिया और सुरजीत ने कमरा बदल लिया लेकिन अब सोनिया बेंत से बनी कुर्सी पर बैठकर असहज हो रही थीं. परेशान हाल सोनिया धीमे से गद्दे पर बैठ गईं और उधर सुरजीत तब तक इंदिरा के 1969 वाले दौर को याद करना शुरू कर चुके थे. उन्होंने सोनिया को बताया कि कैसे उनकी सास इंदिरा को कांग्रेस के पुराने खुर्राट नेताओं ने परेशान करके रख दिया था. बाद में इंदिरा ने सबका अपने ढंग से इंतज़ाम बांधा था. सुरजीत ने सोनिया से कहा कि वो उन्हें दो ऐसे मंत्र देने चाहते हैं जो राजनीतिक संकट में उनकी मदद करेंगे.

सुरजीत ने कहा- ‘बेटी, याद रखना कि भारत एक गरीब देश है, इसलिए कभी भी आर्थिक सुधारों के छलावे में मत आना. कांग्रेस हमेशा गरीबों के पक्ष में खड़ी रही है इसलिए आज तक बची रही. देश के भले के लिए कभी भी गरीबों का पक्ष लेना मत छोड़ना.’

इसके बाद भारत के सबसे तजुर्बेकार नेताओं में एक सुरजीत ने दूसरा मंत्र सोनिया को सौंपते हुए कहा, ‘सत्ता पाने के लिए कभी मन ललचा भी सकता है. हमेशा इससे खुद को दूर रखना. हमारा 1989 का अनुभव (जब लेफ्ट ने गैर कांग्रेसी सरकार बनाने के लिए वीपी सिंह को बाहर से समर्थन दिया था और बीजेपी भी इसमें शामिल थी) बहुत बुरा रहा, इसलिए कभी भी सांप्रदायिक ताकतों के साथ हाथ मत मिलाना. आखिर भारत बिना गरीबों और धर्मनिरपेक्षता के है ही क्या?   

हरकिशन सिंह सुरजीत के इन दो गुरूमंत्रों को सोनिया गांधी ने साध लिया. आखिर वो आज़ादी की लड़ाई में पगे ऐसे बुजुर्ग नेता थे जिन्होंने कांग्रेस-बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए नब्बे के दशक में अपनी पार्टी संग मिलकर कई प्रयास किए थे जिनमें से कुछ सफल भी हुए.

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