सांसदों के व्यवहार से भावुक हुए हरिवंश, राष्ट्रपति को पत्र में लिखा ‘मैं सो नहीं पाया-रखूंगा उपवास’

राज्यसभा (Rajya Sabha) के उपसभापति हरिवंश नारायण ने सांसदों के व्यवहार से नाखुश होकर चिठ्ठी लिखी है. उन्होंने लिखा 20 सितंबर 2020 को राज्य सभा में जो कुछ हुआ, उससे पिछले दो दिनों से गहरी आत्मपीड़ा, आत्मतनाव और मानसिक वेदना में हूं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने संसद भवन में धरना प्रदर्शन करने वाले सांसदों से चाय पर चर्चा करने पर उपसभापति हरिवंश नारायण (Harivansh Narayan) की तारीफ की. पीएम मोदी ने ट्वीट किया, सदियों से बिहार की महान भूमि हमें लोकतंत्र के मूल्यों को सिखा रही है. उस अद्भुत लोक आचरण के अनुरूप बिहार के सांसद और राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश जी का प्रेरणादायक आचरण हर लोकतंत्र प्रेमी को गौरवान्वित करेगा.

व्यक्तिगत रूप से उन लोगों को चाय परोसना जिन लोगों ने उन पर हमला किया, कुछ दिन पहले उनका अपमान किया, धरने पर बैठे. हरिवंश जी का ये आचरण उनकी विनम्रता और महानता को दर्शाता है. मैं हरिवंश जी को बधाई देता हूं.

हरिवंश नारायण की चिट्ठी

वहीं राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने सांसदों के व्यवहार से नाखुश होकर चिठ्ठी भी लिखी है. राज्यसभा के सभापति को लिखे गए पत्र में उन्होंने कहा है कि 20 सितंबर 2020 को राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उससे पिछले दो दिनों से गहरी आत्मपीड़ा, आत्मतनाव और मानसिक वेदना में हूं. मैं पूरी तरह से सो नहीं पाया. जेपी के गांव में पैदा हुआ, सिर्फ पैदा नहीं हुआ, उनके परिवार और हम गांव वालों के बीच पीढ़ियों का रिश्ता रहा है. गांधी का बचपन से गहरा असर पड़ा. गांधी, जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर जैसे लोगों के सार्वजनिक जीवन ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है.

लोकतंत्र के नाम पर हिंसक व्यवहार

उन्होंने लिखा कि मेरे सामने 20 सितंबर को उच्च सदन में जो हुआ, उससे सदन, आसन की मर्यादा को अकल्पनीय क्षति पहुंची है. सदन के माननीय सदस्यों द्वारा लोकतंत्र के नाम पर हिंसक व्यवहार हुआ. आसन पर बैठे व्यक्ति को भयभीत करने की कोशिश हुई. उच्च सदन की हर मर्यादा और व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई गईं. सदन में माननीय सदस्यों ने नियम पुस्तिका फाड़ी, मेरे ऊपर फेंका. सदन के जिस टेबल पर बैठकर सदन के अधिकारी, सदन की महान परंपराओं को शुरू से आगे बढ़ाने में मूक नायक की भूमिका अदा करते हैं, उनकी टेबल पर चढ़कर सदन के महत्वपूर्ण कागज़ात-दस्तावेज़ों को पलटने, फेंकने व फाड़ने की घटनाएं हुईं. नीचे से रोल बनाकर कागज़ को आसन की तरफ फेंका गया. नितांत आक्रामक व्यवहार, भद्दे और असंसदीय नारे लगाए गए. ह्रदय और मानस को बेचैन करने वाला लोकतंत्र के चीरहरण का दृश्य पूरी रात मेरे मस्तिष्क में छाया गया. सो नहीं सका. स्वभाव से अंतर्मुखी हूं. गांव का आदमी हूं.

इसलिए मुझे एक दिन का उपवास करना चाहिए

सर मुझसे गलतियां हो सकती हैं, पर मुझमें इतना नैतिक साहस है कि सार्वजनिक जीवन में खुले रूप से स्वीकार करूं, जीवन में शायद ही कभी कटु शब्द इस्तेमाल किया हो. मुझे लगा कि उच्च सदन की मर्यादित पीठ पर मेरे साथ जो अपमानजनक व्यवहार हुआ है उसके लिए मुझे उपवास करना चाहिए. शायद मेरे इस उपवास से सदन में इस तरह के आचरण करने वाले माननीय सदस्यों के अंदर आत्मशुद्धि का भाव जागृत हो. यह उपवास इसी भावना से प्ररित है.

उन्होंने अपने इस पत्र में रामधारी सिंह दिनकर की कविता का उल्लेख भी किया. उन्होंने लिखा.

वैशाली! इतिहास-पृष्ठ पर अंकन अंगारों का।
वैशाली! अतीत गहवार में गुंजन तलवारों का।
वैशाली! जन का प्रतिपालक, गण का आदि विधानता,
जिसे ढूंढ़ता देश आज उस प्रजातंत्र की माता।
रुको, एक क्षण पथिक! यहां मिट्टी को शीश नवाओ,
राजसिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ।

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