बंगाल में राष्ट्रपति शासन की आहट, जानें पहले कब-कब हुई ये कार्रवाई?

पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगने के कयास जारी हैं. हर किसी के पास अपने तर्क हैं. इस मौके पर आपको बताते हैं कि पहले कब-कब पश्चिम बंगाल ने राष्ट्रपति शासन देखा है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी और टीएमसी के बीच तनातनी चरम पर है. कार्यकर्ताओं के बीच झड़प, नेताओं के बीच शब्दों के युद्ध और अब सड़क पर बीजेपी प्रदर्शनकारियों पर बंगाल पुलिस का लाठीचार्ज बता रहा है कि मामला गंभीर हो चला है. नौबत यहां तक आ पहुंची है कि राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ज़रूरत पड़ने पर आपातकाल की बात खुलकर कह रहे हैं. त्रिपाठी ने तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से बाकायदा मुलाकात की और राज्य के हालात की जानकारी साझा की.

उधर गृहमंत्रालय ने भी ममता सरकार को एडवाइज़री जारी की है. उसमें लिखा है कि – राज्य सरकार कानून व्यवस्था, शांति और सार्वजनिक अमन बनाए रखे. पिछले कुछ सप्ताहों में जारी हिंसा राज्य में कानून व्यवस्था बनाये रखने और जनता में विश्वास कायम करने में राज्य के कानून प्रवर्तन तंत्र की नाकामी लगती है.

हालांकि राज्यपाल ने कहा है कि उन्होंने पीएम और गृहमंत्री से राष्ट्रपति शासन को लेकर बात नहीं की लेकिन चर्चा तेज़ हो चली है कि क्या बंगाल में पांचवीं बार राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा?

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पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी अचानक सक्रिय हो गए हैं

पहली बार बंगाल में राष्ट्रपति शासन तब लगा जब 1 जुलाई 1962 को सूबे के मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय का निधन हो गया. रॉय बंगाल के दूसरे सीएम थे और पेशे से चिकित्सक थे. उनकी याद में आज भी राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है. वो भारत रत्न से सम्मानित थे. अस्सी साल की उम्र में उनके निधन के बाद एक हफ्ते तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा जब तक कि प्रफुल्ल चंद्र सेन ने पदभार नहीं संभाल लिया.

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बिधानचंद्र रॉय बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और बेहद प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे

दूसरी बार राष्ट्रपति शासन 20 फरवरी 1968 से लेकर एक साल तक  चला. दरअसल 1967 में बंगाल में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनना तब संभव हो सका जब कई दलों के गठबंधन ने उसे सत्ता से दूर करने में कामयाबी पाई. अजय कुमार मुखर्जी एक साल और फिर कांग्रेस के समर्थन से प्रफुल्ल चंद्र घोष तीन महीने तक मुख्यमंत्री रहे जिसके बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया. एक साल बाद 1969 में चुनाव कराए गए. सीपीएम बड़ी ताकत बनके उभरी लेकिन अजय कुमार मुखर्जी ने बांग्ला कांग्रेस और सीपीआई की मदद से फिर सीएम पद हासिल कर लिया. साल भर बाद मुखर्जी ने इस्तीफा दे दिया और मार्च 1970 से फिर एक साल के लिए राज्य को तीसरी बार राष्ट्रपति शासन देखना पड़ा.

राष्ट्रपति शासन के बाद 2 अप्रैल 1971 को अजय कुमार मुखर्जी ने फिर से मुख्यमंत्री पद संभाला लेकिन इस बार करीब ढाई महीने के लिए वो कुर्सी पर रहे जिसके बाद 9 महीने के लिए फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. ये सूबे में लगा चौथा राष्ट्रपति शासन था.

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अजय कुमार मुखर्जी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी कई बार संभाली

1972 के बंगाल विधानसभा चुनाव में ज़बरदस्त जीत हासिल करके कांग्रेस सत्ता में लौटी. 280 सीटों में से 216 सीटें जीतकर सिद्धार्थ शंकर रे बंगाल के मुख्यमंत्री बने. इस दौरान देशभर में इंदिरा सरकार की लगाई इमरजेंसी भी जारी रही.

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सिद्धार्थ शंकर रे राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान सीएम थे. कहा जाता है कि इंदिरा उनकी सलाह पर काफी निर्भर रहती थीं

राष्ट्रीय आपातकाल खत्म होने के बाद जनता पार्टी ने कांग्रेस को बुरी तरह हराया. ऐसे में सत्तारूढ़ जनता पार्टी ने उन 9 राज्यों में विधानसभाएं भंग कर दीं जहां कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में नुकसान पहुंचा था.  पश्चिम बंगाल उन्हीं राज्यों में से एक था. तत्कालीन बंगाल सरकार सुप्रीम कोर्ट भी पहुंची लेकिन उसे राहत नहीं मिली. नतीजतन 30 अप्रैल 1977 से 20 जून 1977 तक राष्ट्रपति शासन लागू हो गया जिसके बाद बंगाल ने 23 साल से ज़्यादा वक्त का ज्योति बसु शासन देखा. इस तरह ये पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास का पांचवां राष्ट्रपति शासन था.

आज बंगाल का राजनीतिक माहौल जिस तरह खराब हुआ है उसके बाद सियासी हलचल तेज़ हो गई हैं. बीजेपी ने अपना अगला लक्ष्य बंगाल को बनाया है जहां उसने लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत हासिल की है. बीजेपी जानती है कि अपनी बढ़त को वो विधानसभा चुनाव में भी जारी रख सकती है. दूसरी तरफ उम्मीद के विपरीत खराब प्रदर्शन करनेवाली ममता बनर्जी के भीतर एक बेचैनी देखी जा रही है.